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पिछले पाँच सालों में 7 प्रमुख सेक्टर में 3.64 करोड़ लोग बेरोजगार हुए..

By   /  January 27, 2020  /  No Comments

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-विष्णु नागर।।

ये भाजपाई-प्रधानमंत्री तक-मीडिया के खिलाफ बोलते हैं, जबकि मीडिया का 90 प्रतिशत से भी बड़ा हिस्सा इनका ‘विनम्र सेवक’ है। आजादी के बाद से आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ और ऐसा भी कभी नहीं हुआ कि मीडिया पर बड़ी पूँजी का नियंत्रण इतना अधिक हो,जितना आज है।

दैनिक भास्कर’ भी कभी किसी सरकार के विरोध में नहीं रहा। वह मजे से दक्षिणपंथ की ओर झुका हुआ मध्यमार्गी-सा अखबार है, जो एक-दो स्टार किस्म के सरकार विरोधियों को भी छाप देता है,जैसै शशि थरूर आदि। कभी थोड़ी और उदारता भी बरतता है,जितनी व्यवसाय के लिए जरूरी है। खैर।

यह पृष्ठभूमि बताने का कारण यह है कि नीचे जो आंकड़े दे रहा हूँ, उन्हें मेरी कल्पना या किसी वामपंथी अर्थशास्त्री का बयान न मान लिया जाए क्योंकि बेचारी इस सरकार को बहुत शिकायत है कि उसके खिलाड़ी ‘कनफ्यूजन’ फैलाया जा रहा है। खैर ये आंकड़े भास्कर के नई दिल्ली संस्करण में चार कालम में मुख्य खबर के रूप में ऐन गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में छपे थे मगर मैंने जानबूझकर इन्हें कल देना ठीक नहीं समझा बाकी ने शायद फेसबुक पर दिए हों वरना भक्त कहते कि इस आदमी को गणतंत्र दिवस के दिन भी चैन नहीं।

हाँ तो खबर यह है कि ‘पिछले पाँच सालों में 7 प्रमुख सेक्टर में 3.64 करोड़ लोग बेरोजगार हुए। यहाँ बात नयों को रोजगार देने में असफल रहने की नहीं ,लोगों को, जो रोजगार में लगे हुए थे, उनका रोजगार छीनने की है। पहले बात यह होती थी कि नये रोजगार पैदा नहीं हो रहे, अब मोदीजी की महत कृपा से स्थिति यहाँ तक पहुंच गई है कि कितने लोग बेरोजगार हो रहे हैं। सबसे अधिक बेरोजगार (3.5 करोड़) टेक्सटाइल सेक्टर में हुए हैं, जिसकी बेरोजगारी की कोई चर्चा नहीं होती। जेम्स एंड ज्वेलरी (5 लाख) आटो (2.30 लाख) और बैंकिंग में 3.15 लाख। और ये संगठित क्षेत्र के आंकड़े हैं। संगठित क्षेत्र की बेरोजगारी,असंगठित क्षेत्र पर उससे भी गहरा असर डालती है।

अब बताइए सरकार निरंतर हिन्दू- मुसलमान न करे तो क्या करे?रोज कोई नया हव्वा न खड़ा करे तो क्या करे?सीएए, एनपीआर,एनपीए न करे,राममंदिर न करे, बढ़ती जनसंख्या का ठीकरा मुसलमानों के सिर न मढ़े तो क्या करे?बकवास पर बकवास न करती जाए तो फिर क्या करे?उसके सोशल मीडिया’योद्धा’ आपसे लड़ने को सन्नद्ध न रहें,देशद्रोही सिद्ध करने की कोशिश न करें, तो क्या करें?जरा सहानुभूति के साथ मोदी-शाह की मजबूरियाँ भी समझिए।आप तो जब देखो तब डंडा लेकर पिले रहते हैं।वैसे मैं भी आपके समान दोषी हूँ।

मोदीजी हम सबको उसी तरह हृदय से माफ मत करना, जिस तरह प्रज्ञाजी-जो कि अपने नाम के आगे साध्वी लगवाना पसंद करती हैं-आपने कभी ह्दय से माफ नहीं किया और करेंगे भी नहीं।नहीं न! हंड्रेड परसेंट पक्का न!

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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