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ईवीएम से गिनती में वोटो का अंतर क्यों आया?

By   /  February 17, 2020  /  No Comments

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-संजय कुमार सिंह।।


ईवीएम से शिकायतें कम नहीं हो रही हैं। चुनाव आयोग ने ईवीएम हैक कर दिखाने की जो चुनौती दी थी उसकी शर्तें ऐसी नहीं थीं कि कोई यह सब करने जाए। इसके अलावा, चुनाव आयोग का पिछला रिकार्ड भी ऐसा नहीं है कि उसपर भरोसा किया जाए। इसलिए उस चुनौती या मौके को मैं पूरा नहीं मानता। दिल्ली चुनाव के बाद एक्जिट पोल में जैसे भाजपा की हार का अनुमान बताया गया उसके बाद दिल्ली भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी ने अगर 48 सीट जीतने का दावा नहीं किया होता तो किसी को ईवीएम पर शक नहीं होता। तब शायद स्थिति कुछ और होती। मनोज तिवारी के दावे से लगा कि ईवीएम का खेल तो एक्जिट पोल से नहीं ही मालूम होना है और उनके दावे का आधार वह खेल हो सकता है। अगर उसे सच होना होता तो मनोज तिवारी का दावा करना जरूरी था वरना अगले दिन लोग नतीजे को नहीं मानते और कानून-व्यवस्था की स्थिति पैदा हो सकती थी। इसलिए दावा किया जाना जरूरी था।
अगर भाजपा वाकई जीत जाती और उसे 48 या आस-पास सीटें मिलतीं तो मशीन पर शक होता और हारने वाली पार्टी वीवीपैट की सारी पर्चियां गिनने की मांग करती। अब नहीं कर रही है तो यह उसका मामला है लेकिन भाजपा को जब जीतने का यकीन था तो उसे भी पर्चियां गिनने की मांग करनी चाहिए। पर नहीं करने का मतलब यह क्यों नहीं लगाया जाए कि ईवीएम से छेड़छाड़ कर अपेक्षित परिणाम हासिल करने की उसकी कोशिश कामयाब नहीं रही। उसने इस तथ्य को स्वीकार कर लिया है और ईवीएम पर चुप है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष भले अपने उसे दावे का कोई आधार न दें पर कोई ऐसा दावा बिना आधार क्यों करेगा? वह भी सिर्फ दो या तीन दिन के लिए। दूसरी ओर, टाइम्स ऑफ इंडिया की 13 फरवरी 2020 की एक खबर के अनुसार दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए हुए मतदान के वोटों की गिनती के बाद पता चला कि 38 विधानसभा क्षेत्रों (70 में 38 यानी आधे से ज्यादा) में मतदान करने वालों और गिने गए वोट की संख्या में अंतर है। वैसे तो इन 38 में से 26 विधानसभा क्षेत्रों में मतों का यह अंतर 100 से कम है और बाकी 12 क्षेत्रों में यह अंतर 100 से कुछ ज्यादा से लेकर 1000 से ज्यादा वोट का है।
यह अलग बात है कि इस अंतर से चुनाव जीतने या हारने वाले उम्मीदवारों को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। अखबार के अनुसार एक अधिकारी ने कहा कि यह असामान्य नहीं है और किसी खास ईवीएम के वोट नहीं गिने जाने के कारण ऐसा होता है। अगर कोई ईवीएम मतदान के बाद खराब हो जाए तो उसे कहा जाता है कि तकनीकी कारण से वोट नहीं गिने गए। दिल्ली के मुख्य चुनाव अधिकारी रनबीर सिंह ने कहा कि ऐसी मशीनें अलग रख दी जाती हैं। अखबार और अधिकारी ने यह नहीं बताया है कि अंतर कम हो तो क्या किया जाएगा या क्या करने का नियम है। कुछ चुनाव क्षेत्रों में सिर्फ एक या दो वोट के अंतर के बारे में उन्होंने कहा, ऐसा टाइपिंग की गलती के कारण हो सकता है। श्री सिंह ने कहा कि चुनाव कार्यालय मतदान की संख्या का हिसाब लगाता है। बाद में इसे कंप्यूटर में डाला जाता है और डाटा कंप्यूटर में डालने वाला कुछ गलत कर सकता है। मुझे यह बात समझ में नहीं आई। 10 लाख से एक कम वोट तक वोट छह अंकों में, 9,99,999 में इस तरह लिखे जाएंगे। इसमें गलती पहले अंक में हो तो अंतर लाख में होगा और आखिरी अंक में हो तभी एक-दो वोट का अंतर पड़ेगा हालांकि यह अधिकतम 9 हो सकता है। इसी तरह दूसरे अंक में गलती होने से अंतर 10 से 99 वोट का हो सकता है।
गलती तो गलती है वह पहले ही अंक में होगी इसकी कोई गारंटी कैसे ले सकता है और ऐसी गलती कैसे नजरअंदाज की जा सकती है? पर यह खबर इस बात का पूरा आधार देती है कि कम से कम दिल्ली चुनाव की सभी पर्चियों का मिलान करके यह तय किया जाए कि ईवीएम से कितनी और कैसी गलतियां हो सकती हैं। यह काम आम आदमी पार्टी का नहीं है। सरकार और चुनाव आयोग का है। फिर भी, ना आम आदमी मांग कर रही है और ना चुनाव लड़ने वाली पार्टियों की ऐसी कोई मांग है। ऐसे में क्या समझा जाए? हार का ठीकरा ईवीएम पर फोड़ना फैशन है? मेरे ख्याल से नहीं। अगर ऐसा होता तो वोटों का अंतर क्यों आता? भिन्न सवालों के बावजूद उसे नजरअंदाज क्यों किया जाता? सबसे दिलचस्प यह है कि कुछ लोग कह रहे हैं कि यह मांग आम आदमी पार्टी को करनी चाहिए। भाजपा की (सरकार में होने और ईवीएम का मुद्दा पहले उठाने के बावजूद) कोई जिम्मेदारी नहीं है। आज एक मित्र ने कहा कि हमें कोई भी मांग देशहित में ही करनी चाहिए। उनके अनुसार यह मांग आम आदमी पार्टी को ही करना चाहिए।
मैं ना तो इस देशहित से सहमत हूं और ना आम आदमी पार्टी पर जबरदस्ती थोपी जा रही इस जिम्मेदारी से। यही नहीं उनका कहना है कि पार्टी को ईवीएम पर भरोसा नहीं है तो चुनाव नहीं लड़ना चाहिए और जीत भी स्वीकार नहीं करना चाहिए। मुझे लगता है कि चुनाव का बायकाट कोई राष्ट्रवादी काम नहीं है और जब चुनाव लड़े तो हार भले ना स्वीकार करें पर जीत कैसे स्वीकार नहीं की जाए। और इसमें कहां से राष्ट्रवाद आ सकता है। पर राष्ट्रवाद की जो परिभाषा समझाई गई है उसमें ऐसे ही भ्रम हैं। इसलिए मैं अपने मित्र से तो चर्चा नहीं कर पाया क्योंकि मुझे लगा कि राष्ट्रवाद को लेकर हमलोगों की समझ ही अलग थी और भले इस मुद्दे का राष्ट्रवाद से कोई संबंध नहीं हो पर इसमें राष्ट्रवाद ले आना ही साजिश का संकेत है। और राष्ट्रवाद क्या है यह तय किए बगैर मित्र से इसपर चर्चा का कोई मतलब नहीं निकलेगा। दूसरी ओर, मतदान का प्रतिशत बताने में इस बार (भी) हुई देरी दाल में काला होने का संकेत दे रही है। वोट बढ़ जाना अगर कहीं और वोट डालने का संकेत है तो घट जाना इस बात का संकेत हो सकता है कि कुछ जगह फालतू वोट नहीं डाले जा सके जबकि उन्हें गिन लिया गया था। किसी को पता हो किसी को नहीं – होने पर ऐसी ही स्थिति बनेगी। और पार्टी को इन्हीं सब से जीत का भरोसा हो सकता है। लेकिन यह मुद्दा निपटेगा कैसे? क्या यही स्थिति चलती रहेगी?

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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