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न्यू इंडिया में एयर इंडिया..

By   /  February 23, 2020  /  No Comments

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-चंद्र प्रकाश झा।।


एयर इंडिया को बेचने की कोशिशें कई बार टांय-टांय फिस्स हो चुकी हैं. लेकिन मोदी सरकार ने एक बार फिर उसे बेचने की ठानी है. केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने नवम्बर 2019 में टाईम्स ऑफ इंडिया के साथ भेंटवार्ता में कहा कि सरकार चाहती है कि मार्च 2020 तक इसकी बिक्री पूरी कर ली जाए. केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने भी राज्यसभा में कह दिया कि एयर इंडिया का निजीकरण नहीं होने की स्थिति में इसे बंद करना होगा. सरकर उसमें और पैसे नहीं लगाएगी.
सरकार ने पिछले साल भी एयर इंडिया को बेचने की योजना बनाई थी. लेकिन निवेशकों ने एयर इंडिया को खरीदने में ज्यादा उत्साह नहीं दिखाया. इसलिए इसे बेचा नहीं जा सका. लगातार बढ़ते घाटे और कर्ज में डूबी एयर इंडिया में भारत सरकार की हिस्सेदारी का 76 प्रतिशत विनिवेश करने के लिए मोदीराज की पह्ले की कोशिश नाकाम होने के बाद 2019 के आम चुनाव के पहले सरकार ने मान लिया कि इसे बेचने का सही समय नहीं है.जून 2018 को नई दिल्ली में मोदी सरकार के तत्कालीन वित्त मंत्री पीयूष गोयल, परिवहन मंत्री नितिन गडकरी, तब के नागरिक विमानन मंत्री सुरेश प्रभु और बड़े अधिकारियों के संग पूर्व वित्त्त मंत्री (अब दिवंगत) अरुण जेटली की बैठक में इसे चुनावी साल में न बेचने का निर्णय कर उसे चलाने के लिए धन मुहैया कराने का निश्चय किया गया था. इस मंत्री समूह ने एयर इंडिया के रूपांतरण पर जोर दिया. बताया गया कि सरकार एयर इंडिया में और 3,200 करोड़ रुपये की पूंजी लगा सकती है.
लगातार घाटे में चल रही इस एयरलाइन में सरकार अप्रैल 2012 में घोषित ‘ बेलआउट पैकेज ‘ के तहत पहले ही 26,000 करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी डाल चुकी है. एयर इंडिया में नए सिरे से पूंजी डालना सरकार के लिए तब जरूरी हो गया जब उसके कर्जदाता कंसर्टियम के तीन बैंकों- देना बैंक, स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक और इलाहाबाद बैंक ने इस एयरलाइन को आगे लाइन ऑफ क्रेडिट देने से इनकार कर दिया.लाइन ऑफ क्रेडिट, बैंक और कर्जदार के बीच समझौता होता है जिसके तहत कर्जदार कभी भी तय सीमा के मुताबिक उधारी ले सकता है.
सरकार ने पहले ही स्वीकार किया था कि एयर इंडिया के स्वामित्व की हिस्सेदारी बेचने के प्रस्ताव पर बोली लगाने किसी ने एक्सप्रेशन ऑफ़ इंटरेस्ट (अभिरुची) दाखिल नहीं की. विनिवेश के उक्त विफल प्रयास में एयर इंडिया, उसकी किफायती दरों की सहायक कम्पनी एयर इंडिया एक्सप्रेस और एयर इंडिया स्टैट्स एयरपोर्ट सर्विसेस प्राइवेट लिमिटेड की भी हिस्सेदारी बेचने की बात थी. विनिवेश के लिए निर्धारित समय की समाप्ति तक किसी भी खरीददार की बोली नहीं आयी. विनिवेश की भावी योजना पर इस मंत्री समूह को निर्णय लेना था. इसके सम्मुख कई विकल्प पेश किये गए थे. एयर इंडिया के कर्मचारियों के वेतन भुगतान में देरी तथा विनिवेश योजना में अनिश्चितता के माहौल में तत्कालीन केंद्रीय विमानन राज्य मंत्री जयंत सिन्हा ने कहा था कि मोदी सरकार एयर इंडिया को पर्याप्त नकदी और वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराएगी.
सरकार ने कर्ज में डूबी इस कंपनी को शेयर बाजार में सूचीबद्ध करने के विकल्प पर भी विचार किया. लेकिन यह भी संभव नहीं हो सका. कंपनी को सूचीबद्ध करने से पूंजी की उगाही हो सकती थी.लेकिन इसके लिए भारत के प्रतिभूति एवं शेयर बाजार के नियमन के लिए बनी संस्था, सेबी के मानदंडों के अनुरूप एयर इंडिया को तीन वर्ष तक लाभ की स्थिति में रहना आवश्यक है.एयर इंडिया पर मार्च 2017 तक करीब 50,000 करोड़ रुपये का कर्ज था. एयर इंडिया के विनिवेश प्रस्ताव का कंपनी के कर्मचारियों के विभिन्न यूनियन विरोध कर रहे हैं.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समर्थक स्वदेशी जागरण मंच ने एयर इंडिया कंपनी का प्रारम्भिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) लाने का सुझाव देने के साथ ही कहा था कि इसे बचाने के लिये ‘ सक्षम संचालन ‘ की जरूरत है.आर्थिक मामलों के सचिव के अनुसार एक विकल्प यह भी था कि सरकार इसमें अपनी शत-प्रतिशत हिस्‍सेदारी बेच दे. एयर इंडिया के लिए नियुक्त सलाहकार ईवाई ने कहा कि कंपनी में अल्पांश हिस्सेदारी सरकार के पास रखे जाने का प्रावधान इसकी बिक्री की राह में सबसे बड़ी बाधा है. बिक्री में अड़चन के अन्य आधार एक साल तक कर्मचारियों को कंपनी के साथ बनाए रखने का प्रावधान भी था. भारत की सबसे बड़ी घरेलू एयरलाइंस इंडिगो ने शुरु में एयर इंडिया को खरीदने में रूचि दिखाई थी. लेकिन बाद में उसने अपने हाथ खींच लिए. इसकी बड़ी वजह सरकार द्वारा एयर इंडिया के अंतरराष्‍ट्रीय ऑपरेशंस को अलग से न बेचना था.
एयर इंडिया कई सालों से घाटे में चल रही है. इसे चलाए रखने के लिए कई बेलआउट पैकेज भी दिए गए. लेकिन इसकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ.यह एनडीए सरकार में एयर इंडिया को बेचने की दूसरी कोशिश थी जो सफल नहीं हुई. पिछली बार की कोशिश अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में 2001 में की गई थी.उस सरकार ने तो बाकायदा पहली बार एक विनिवेश मंत्रालय खोल दिया था जिसके मंत्री अरुण शौरी बनाये गए थे.
एयर इंडिया 58,000 करोड़ रुपये के घाटे में है. उसकी 22,000 करोड़ रुपए की देनदारी है. इसके करीब 11000 कर्मचारी है. तेल कंपनियों पर एयर इंडिया का करीब 5000 करोड़ रुपए बकाया है. एयरपोर्ट ऑपरेटर पर भी एयर इंडिया का 5000 करोड़ रुपए बकाया है.
एयर इंडिया भारत की ध्वजवाहक राजकीय विमानयात्रा-सेवा कम्पनी है. इसकी स्थापना जेआरडी टाटा ने देश की आज़ादी से पहले 1932 में टाटा एअरलाइन्स के रूप में की थी. दूसरे विश्व यूद्ध के बाद 1946 में टाटा एअरलाइन्स एयर इंडिया बनी.एयर इंडिया और अलायंस एयर के पास अलग-अलग तरह के कुल 169 यात्री विमान हैं.एयर इंडिया 31 देशों में 43 डेस्टिनेशन पर उड़ान भरती है जबकि डोमेस्टिक यानि देश में ही 55 शहरों के लिए उड़ान भरती है.एयर इंडिया फिलहाल देश मे 55 शहरों के एयर कनेक्टिविटी देती है जिसमें कई तो ऐसे दूर-दराज़ या पहाड़ी शहर है जहां सिर्फ एयर इंडिया ही जाती है. इसके बेड़ा में अभी मुख्यतः एयरबस और बोईंग कम्पनी के 31 विमान है.
एयर इंडिया विदेश में भी 31 देशों के 43 शहरों को अपनी लांग और मीडियम हॉल फ्लाइट से कनेक्ट करती है. कुछ वर्ष पहले भारत की घरेलु राजकीय विमान सेवा कम्पनी इंडियन एयरलाइंस का एयर इंडिया में विलय कर दिया गया था.एयर इंडिया के बंद होने से उसके स्लॉट्स अन्य एयरलाइन को सौंप दिए जाएंगे, वैसे ही जैसा जेट एयरवेज के साथ हुआ.

पुस्तक अंश: न्यु इंडिया में मंदी
किताब के पूर्वालोकन, समीक्षा और खरीद के लिए लिंक: http://NotNul.com/Pages/ViewPort.aspx?ShortCode=q62o4Q8y

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लेखक

सीपी नाम से ज्यादा ज्ञात पत्रकार-लेखक फिलवक्त अपने गांव के आधार केंद्र से विभिन्न समाचारपत्र, पत्रिकाओं के लिए और सोशल मीडिया पर नियमित रूप से लिखते हैं.उन्होंने हाल में न्यू इंडिया में चुनाव, आज़ादी के मायने ,सुमन के किस्से और न्यू इंडिया में मंदी समेत कई ई-बुक लिखी हैं, जो प्रकाशक नोटनल के वेब पोर्टल http://NotNul.com पर उपलध हैं.लेखक से [email protected] पर सम्पर्क किया जा सकता है.

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