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मुस्लिम परिवारों की ढाल बना पूरा मोहल्ला..

By   /  February 28, 2020  /  No Comments

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-पंकज चतुर्वेदी।।
बाहर गाड़ियां फूंकी जा रही थीं। हर तरफ चीख-पुकार मची थी। इलाके में दुकानें लूटी जा रही थीं और खौफ से लोग घरों में दुबके बैठे थे। इसी बीच घोंडा गांव स्थित भगतान मोहल्ले में उन्मादी भीड़ ने हिंसा फैलाने का प्रयास किया, लेकिन स्थानीय लोगों ने उनके मंसूबों को नाकाम कर दिया।

भगतान मोहल्ला के लोगों ने सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल कायम की। हिंदू समुदाय के लोगों ने 12 मुस्लिम परिवारों को हिंसा फैलाने वालों से सुरक्षित बचा के रखा। स्थानीय लोग दिन-रात उनकी सुरक्षा के लिए पहरा दे रहे हैं। इस मोहल्ले में तीन मुस्लिम परिवारों के अपने मकान हैं, बाकी सब परिवार किराये के मकान में रहते हैं। इतनी हिंसा होने के बावजूद यहां हिंदू-मुस्लिम समुदाय के लोग एक-दूसरे को गले लगाते दिख रहे हैं। एक ही खाट पर बैठकर बचपन की यादों को ताजा किया जा रहा है। कुछ ऐसी तस्वीर इस मोहल्ले में देखने को मिल रही है।

हिंदू सेवा कर रहे : बुलंदशहर की रहने वाली अली फातिमा ने बताया कि वह इसी मोहल्ले में पिछले 20-22 वर्ष से रह रही हैं। जब बाहर चौक पर हिंसा हो रही थी तो गांव के लोगों ने हमारी हिफाजत की। इस कारण यहां हिंसा फैलाने वाले लोगों की आने की हिम्मत नहीं हुई। हम बेहद खुश हैं कि मोहल्ले के लोग हमारी सेवा में जुटे हैं। फातिमा के पति असगर अली का कहना था कि यहां पर हम पूरी तरह से सुरक्षित हैं। वह बोले कि हमारे मन में किसी प्रकार का कोई भय नहीं है।

आखिरी सांस इसी मोहल्ले में लूंगी : 35 वर्ष से इसी मोहल्ले में किराये पर रहने वाली बुजुर्ग हाजरा का कहना था कि यहां पर मैंने कभी असुरक्षित महसूस नहीं किया। यहां सभी धर्म और जाति के लोग परिवार की तरह रहते हैं। मैंने अपनी सारी बेटियों की शादी यहीं पर की है और आखिरी सांस भी इन्हीं लोगों के बीच में रहकर लेना चाहती हूं।

मुझे अपनों ने बचाया फिर लौटकर आऊंगा

वर्ष1995 से दिल्ली में हूं। इस तरह की घटना पहली बार हुई है। मैं शिवहर चौक पर रहता हूं। मेरे मकान मालिक गुर्जर हैं। उन्होंने मुझसे कहा कि डरो नहीं हम तुम्हारे साथ हैं। हम हर तरह से मदद को तैयार हैं। यहां मुझे अपनों ने (हिंदुओं) बचाया। मुझे यहां डर नहीं लग रहा है, लेकिन अब काम कम है और रोजी रोटी का सवाल है, इसलिए घर जा रहा हूं। इश्याक अहमद ने ये बातें तब कीं, जब वह खूजरी चौक पर बिहार जाने वाली ट्रेन पकड़ने के लिए निकल रहे थे। वह परिवार के चार लोगों के साथ बिहार जा रहे थे। इश्याक कहते हैं कि मैं पेंटिंग का काम करता हूं। लोग मुझे प्यार से मुन्ना पेंटर कहते हैं।

कारीगरों को सुरक्षित घर भिजवाया

खजूरी चौक से करावल नगर तक रास्तों में एक दर्जन से अधिक जली हुईं गाड़ियां मानवता को शर्मसार करने वाली वारदातों की कहानियां बयां कर रही हैं। पास ही करावल नगर पश्चिमी चौक पर खड़े एएन तिवारी इस मंजर से दुखी नजर आए। उन्होंने बताया कि वर्ष 1984 के दंगे के बाद पहली बार इस तरह का मंजर देखा हूं। यह सब शायद उससे भी भयावह है। एमटीएनल से सेवानिवृत्त एनएन तिवारी ने बताया कि मेरी एक फैक्टरी है और वहां पर दो मुस्लिम कारीगर काम करते हैं। जब यहां माहौल बिगड़ा, तब मैंने अपने बेटे को साथ भेजकर मुस्लिम कारीगरों को उनके घर तक सुरक्षित भिजवाया।

मुझे अपनों ने बचाया फिर लौटकर आऊंगा

वर्ष1995 से दिल्ली में हूं। इस तरह की घटना पहली बार हुई है। मैं शिवहर चौक पर रहता हूं। मेरे मकान मालिक गुर्जर हैं। उन्होंने मुझसे कहा कि डरो नहीं हम तुम्हारे साथ हैं। हम हर तरह से मदद को तैयार हैं। यहां मुझे अपनों ने (हिंदुओं) बचाया। मुझे यहां डर नहीं लग रहा है, लेकिन अब काम कम है और रोजी रोटी का सवाल है, इसलिए घर जा रहा हूं। इश्याक अहमद ने ये बातें तब कीं, जब वह खूजरी चौक पर बिहार जाने वाली ट्रेन पकड़ने के लिए निकल रहे थे। वह परिवार के चार लोगों के साथ बिहार जा रहे थे। इश्याक कहते हैं कि मैं पेंटिंग का काम करता हूं। लोग मुझे प्यार से मुन्ना पेंटर कहते हैं।

कारीगरों को सुरक्षित घर भिजवाया

खजूरी चौक से करावल नगर तक रास्तों में एक दर्जन से अधिक जली हुईं गाड़ियां मानवता को शर्मसार करने वाली वारदातों की कहानियां बयां कर रही हैं। पास ही करावल नगर पश्चिमी चौक पर खड़े एएन तिवारी इस मंजर से दुखी नजर आए। उन्होंने बताया कि वर्ष 1984 के दंगे के बाद पहली बार इस तरह का मंजर देखा हूं। यह सब शायद उससे भी भयावह है। एमटीएनल से सेवानिवृत्त एनएन तिवारी ने बताया कि मेरी एक फैक्टरी है और वहां पर दो मुस्लिम कारीगर काम करते हैं। जब यहां माहौल बिगड़ा, तब मैंने अपने बेटे को साथ भेजकर मुस्लिम कारीगरों को उनके घर तक सुरक्षित भिजवाया।

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  • Published: 1 month ago on February 28, 2020
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  • Last Modified: February 28, 2020 @ 3:13 pm
  • Filed Under: देश

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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