अदालत ने तय की मीडिया की लक्ष्मण रेखा, तहलका के स्टिंग ने पहुंचाया बंगारू को जेल

-संजय तिवारी-

जिन दिनों बंगारू लक्ष्मण रेल राज्यमंत्री थे ममता बनर्जी उनकी कैबिनेट मिनिस्टर होती थीं. उस वक्त ऐसी चर्चाएं थीं कि ममता बनर्जी ने खुद अटल बिहारी वाजपेयी से कई बार शिकायतें की थी कि बंगारू लक्ष्मण दस पांच हजार की घूसखोरी करके मंत्रालय की गरिमा गिरा रहे हैं इसलिए प्रधानमंत्री जी उन्हें कोई और मंत्रालय दे दें. बंगारू लक्ष्मण बतौर रेल राज्यमंत्री भ्रष्टाचार में लिप्त थे. संभवत: सरकार की छवि चमकाने के लिए ही अटल बिहारी ने उन्हें पार्टी की ओर रवाना कर दिया और बंगारू की आदतों को जानकर ही तहलका ने अपने स्टिंग आपरेशन में बंगारू को निशाना बनाया था. तहलका के रिपोर्टरों को मालूम था कि बंगारू पैसे खाते हैं इसलिए उन्हें एक लाख रूपये की “छोटी” रकम दी गई जिसे बंगारू ने ले ली.

2001 में जब तहलका कांड हुआ था तब बंगारू लक्ष्मण के निजी सचिव एक सत्यमूर्ति नाम के व्यक्ति हुआ करते थे. यह सत्यमूर्ति ही थे जो तहलका के बिचौलियों से उड़ उड़कर बातें कर रहे थे और वे उन फर्जी सौदागरों के सामने बंगारू लक्ष्मण की ऐसी छवि प्रस्तुत कर रहे थे मानों बंगारू बहुत बड़े आर्म्स डीलर हैं. आंध्र प्रदेश से राजनीति में आनेवाले बंगारू लक्ष्मण के बारे में सत्यमूर्ति ने यहां तक कह दिया था कि सुखोई सौदे में भी बंगारू का हाथ है. निश्चित रूप से वह यह सब फर्जी सोदागरों पर विश्वास बढ़ाने के लिए कह रहा था और पैसे पाने का दबाव बढ़ा रहा था. बताते हैं कि यह स्टिंग आपरेशन और आगे बढ़ता और शायद पीएमओ तक पहुंचता लेकिन इसी सत्यमूर्ति की जल्दबाजी के कारण तहलका को आनन फानन में उस वक्त अपना स्टिंग आपरेशन उजागर करना पड़ा था.

खैर, पूरा एक दशक बीत गया. राजनीति ने भी पूरी करवट ले ली. बंगारू लक्ष्मण भाजपा की राजनीति में कभी भी लक्ष्मण रेखा वाले राजनीतिज्ञ नहीं रहे. वे गरीबी से राजनीति की ओर आये थे इसलिए पैसा उनकी राजनीति की परिधि पर नहीं बल्कि मूल में था. लेकिन जरा तमाशा देखिए जिस राजनीति में करोड़ों अरबों खाकर भी नेता डकार नहीं लेता वहां एक लाख रूपये लेकर बंगारू ने अपना पूरा राजनीतिक जीवन चौपट कर लिया. बंगारू राष्ट्रवाद से जातिवाद की ओर जाती भाजपा के नये राजनीतिक समीकरण और विचार में दलित नेता बनाकर जरूर स्थापित किये जा रहे थे लेकिन बेहद गरीबी में पैदा हुए बंगारू लक्ष्मण लाख रूपये का लोभ संवरण नहीं कर पाये और उनकी समूची राजनीति पर पूर्ण विराम लग गया. तहलका स्टिंग के बाद सबसे अधिक नुकसान बंगारू लक्ष्मण को ही हुआ. उन्हें तत्काल भाजपा अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा जिसके बाद वे राजनीतिक जलसों में कभी कभार नजर तो आते रहे लेकिन उनके होने को कभी नोटिस नहीं किया गया.

जब बंगारू लक्ष्ण पर लाख रूपये घूस लेने का तहलका मचा उस वक्त 2001 में बंगारू लक्ष्मण ने कहा था कि “दूध का दूध और पानी का पानी तो एक दिन होना ही है.” वह दिन आ गया. अदालत ने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया. बंगारू लक्ष्मण दोषी करार दे दिये गये. लेकिन कुछ सवाल हैं जो दशक भर बाद भी अनुत्तरित हैं. अदालत ने बंगारू को उनके भाजपा अध्यक्ष के रूप में घूस लेने के लिए दोषी करार नहीं दिया है. वे दोषी करार दिये गये हैं जनसेवक के पद पर (राज्यसभा सदस्य) रहते हुए घूस लेने के आरोप में. इसलिए इस फैसले पर राजनीतिक टीका टिप्पणी करनेवालों को ध्यान रखना चाहिए कि वे कम से कम इस राजनीतिक लक्ष्मण रेखा का ध्यान रखें. बंगारू तो कभी लक्ष्मण रेखा वाले राजनीतिज्ञ नहीं रहे तो क्या विरोधी भी इस फैसले को अपनी अपनी सुविधा अनुसार विश्लेषित करके जनता को भ्रमित करेंगे?

अदालत के इस फैसले से निश्चित रूप से उनको बल मिलेगा जो जनसेवकों पर भ्रष्टाचार के लिए सख्त कानून की दूहाई दे रहे हैं. बंगारू लक्ष्मण पर आये इस फैसले से एक बात साबित हो जाती है कि हमारे कानून में जनसेवकों के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए प्रावधान मौजूद हैं, अगर हम उनका उपयोग करें तो और अधिक कानूनों की जरूरत शायद न पड़े. लेकिन वह तब, जब हम उनका उपयोग करें. एक सवाल अदालत से भी पूछा जा सकता है कि जब सबकुछ इतना साफ था और प्रमाण पूरी दुनिया देख चुकी थी, तब फैसला आने में एक दशक क्यों लग गया? जवाब वही है जिसे सवाल बनाकर पेश किया जा रहा है.

(संजय तिवारी विष्फोट.कॉम के संपादक हैं)

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