जागरूकता और सहमति से होगी जनसंख्या नियंत्रित

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जनसंख्या नियंत्रण कानून का प्रारूप बनकर तैयार है। राज्य विधि आयोग द्वारा तैयार इस प्रस्तावित कानून पर 19 जुलाई तक जनता से राय मांगी गई है, जो प्रकाशन की अवधि से एक साल बाद प्रभावशाली हो जायेगा। इसके लागू होने से केवल दो बच्चों वाले परिवारों को प्रोत्साहन के साथ सरकारी सुविधाएं एवं छूटें मिलेंगी; दूसरी ओर दो से अधिक संतानों वाले अनेक शासकीय योजनाओं के लाभ से वंचित हो जायेंगे। उन्हें सरकारी नौकरियां नहीं मिलेंगीं और वे स्थानीय निकायों चुनाव भी नहीं लड़ सकेंगे। 

बेशक, आबादी की बहुलता अविकसित व विकासशील देशों की एक बड़ी समस्या रही है क्योंकि विकास में वह बाधक है। जनसंख्या के लिहाज से उ.प्र. देश का सबसे बड़ा राज्य है। ऐसे में प्रथम दृष्टया यह कानून जनसंख्या नियंत्रण के लिए लाभप्रद प्रतीत हो सकता है लेकिन यह गुणा-भाग इतना सरल नहीं है। इसमें कई-कई पेंच हैं। उल्लेखनीय है कि राज्य में अगले साल (फरवरी-मार्च) विधानसभा चुनाव हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार कोरोना प्रबंधन, कानून-व्यवस्था, सामाजिक सौहार्द्र सहित अनेक मोर्चों पर बेहद नाकाम रही है। फिर, उनके प्रति पार्टी की राज्य इकाई में असंतोष है और शीर्ष नेतृत्व के साथ उनकी तनातनी जारी है। विरोधी दल, खासकर अल्पसंख्यकों में लोकप्रिय समाजवादी पार्टी ताकतवर हो रही है। ऐसे ऐसे कारण हैं जिनके चलते योगी के पास चुनाव जीतने के लिये सामाजिक धु्रवीकरण के अलावा कोई दूसरा उपाय शेष नहीं रह जाता। ऐसे वक्त में जब उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार का कार्यकाल 5-6 माह का ही रह गया है और यह कानून बन भी गया तो निश्चित ही यह अगले साल लागू होगा, परन्तु इसका तत्काल चुनावी लाभ तो लिया ही जा सकता है।

आबादी पर अंकुश के मुद्दे को भारत में हमेशा से दूसरा एंगल दिया जाता रहा है। अल्पसंख्यकों के विरोध में माहौल बनाने का यह हमेशा से एक हथियार रहा है, वैसे ही जिस प्रकार दलितों, आदिवासियों एवं ओबीसी पर योग्य व प्रतिभाशाली सवर्णों की नौकरियां आरक्षण के जरिये लूट लेने का आरोप लगता रहा है। एक राजनैतिक-सामाजिक नैरेटिव यह गढ़ा गया है कि एक वर्ग विशेष की बढ़ती आबादी के कारण लोगों तक विकास का लाभ नहीं पहुंच रहा है। बहुसंख्यकों को रिझाने के साथ यह कानून एक तरह से कल्याणकारी योजनाएं बन्द करने का भी तरीका है जिसकी जद में सभी वर्गों व सम्प्रदायों के गरीब व वंचित लोग आयेंगे। 

सामाजिक पूर्वाग्रह, राजनैतिक उपयोग और भ्रांतिपूर्ण आर्थिक अवधारणाएं इस कानून के आधार हैं। सच्चाई यह है कि सभी वर्गों-सम्प्रदायों के कुछ परिवारों में बच्चों की संख्या ज्यादा है पर जो समझदार हैं उन्होंने अपने परिवारों को सीमित रखा है। बेहतर शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं, सुपोषित खानपान आदि से ही इस मुद्दे को लेकर जागरूकता आयेगी। इसलिए पहले लोगों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने की आवश्यकता है। आपातकाल में लोगों पर हुए अत्याचारों के कारण परिवार नियोजन का मुद्दा ही बदनाम हो गया। कोई भी राजनैतिक दल इस पर खुलकर बात नहीं करना चाहता। ऐसे में इस विषय में सभी राजनैतिक दलों, समाजशास्त्रियों, वैज्ञानिकों, अर्थशास्त्रियों, योजनाकारों, एनजीओ आदि की राय अधिक महत्वपूर्ण है। इस विषय को राजनीति से दूर ले जाना होगा। क्षुद्र राजनैतिक उद्देश्यों से यह कानून वांछित परिणाम नहीं दे सकेगा। उप्र के इस कानून के सामाजिक एवं आर्थिक लाभ तो पता नहीं कब दिखेंगे, पर अगर योगी को इसका चुनावी लाभ मिलता है तो इससे उत्साहित होकर अन्य प्रदेश भी इसे लागू कर सकते हैं, खासकर जहां अल्पसंख्यकों की आबादी काफी है। आश्चर्य नहीं होगा कि अगर इसके व्यापक राजनैतिक लाभ मिलें तो भारत सरकार एक राष्ट्रव्यापी कानून लाकर इसे देश भर में लागू कर दे। 

सच तो यह है कि जनसंख्या को नियंत्रित करने के व्यावहारिक उपाय अपनाते हुए संसाधन भी बढ़ाये जाने की आवश्यकता है। चोरी, रिसाव और भ्रष्टाचार को रोकते हुए लोगों को मिलने वाली सुविधाओं का दायरा बढ़ाने की ज़रूरत है जो कुछ लोगों की कटौतियों से पूरी नहीं हो सकेंगी। पूंजीवादी शक्तियों के साथ मिलकर काम करने वाली सरकारें गोदामों में अनाज को सड़ा देना मंजूर करती हैं लेकिन गरीबों के पेट भरने में उसका उपयोग नहीं होने देतीं। ये सरकारें जरूरतमंदों को बैंक ऋण नहीं देतीं पर उद्योगपतियों और व्यवसायियों पर खजाने लुटाती हैं। यही जनविरोधी मानसिकता ऐसी योजनाओं व नीतियों को जन्म देती है जो कमजोर वर्गों की सुविधाएं छीनकर ताकतवर राजनैतिक-सामाजिक वर्गों को अधिक आर्थिक सबलता प्रदान करती हैं।

लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा को न मानने वाले राजनैतिक दल ही ऐसे कानूनों के जरिये गरीबों-वंचितों के पास बच रही गिनती की दो-चार सुविधाएं भी समाप्त करती हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में इस कानून को परखा जाना चाहिए। उप्र सरकार एवं सत्तारुढ़ पार्टी की मंशा इस बात से समझी जा सकती है कि खुद इसी पार्टी के नेता बहुसंख्यकों से कई-कई बच्चे पैदा करने की खुलेआम अपील करते रहे हैं। आरक्षण और रियायती या मुफ्त में उपलब्ध शासकीय सुविधाओं को गरीबों से छीन लेने के छिपे एजेंडे को पहचानना भी जरूरी है। 

इस मामले में चीन का उदाहरण बार-बार दिया जाता है, पर सच्चाई यह है कि कानूनी कड़ाई से 70 वर्षों में वहां का सामाजिक समीकरण इस कदर गड़बड़ा गया है कि अब वहां तीसरा बच्चा पैदा करने की अनुमति दी जा रही है। हमें सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक दृष्टिकोण के साथ व्यावहारिक नीति बनानी होगी क्योंकि भारत एक परिवार आधारित जैविक व स्पंदित समाज है जो न पश्चिम देशों की तरह छोटे परिवारों में सिमट सकता है और न ही चीन जैसी कानूनी कड़ाई यहां लागू की जा सकती हैं।

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