जस्टिस चन्द्रचूड़ को ध्यान से सुने सरकार!


सुप्रीम कोर्ट के विद्वान न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने सोमवार को एक बेहद महत्वपूर्ण बयान दिया है, जो न्यायालय के परिसर से बाहर दिये जाने के बावजूद देश भर के लिए, खासकर भारत सरकार द्वारा ध्यान से सुने जाने और उस पर अमल करने योग्य है। इंडिया-यूएस जॉइंट समर कांफ्रेंस में अपनी बात कहते हुए चंद्रचूड़ ने एक तरह से भारत सरकार के कामकाज पर गंभीर टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि असहमति की आवाज को दबाने के लिए नागरिकों का उत्पीड़न नहीं किया जा सकता। उनका बयान ऐसे वक्त में आया है जब देश भर में केन्द्र और कुछ राज्य सरकारें विरोधी विचारधारा के निर्दोष लोगों को बड़ी संख्या में जेलों में ठंूस रही है। हाल ही में 84 वर्षीय फादर स्टेन स्वामी की जेल में मृत्यु हो गई। वे झारखंड के आदिवासियों को अपने जंगल बचाने और उद्योगपतियों द्वारा वहां हो रहे अतिक्रमण का विरोध कर रहे थे। उन्हें लंबे समय तक जेल में रखा गया और बेहद बीमार होने के बावजूद उन्हें जमानत नहीं दी गई। अंतत: उनकी मृत्यु हिरासत में रहते ही हो गई। भीमा कोरेगांव मामले में जिन लोगों को सरकार ने जेल में डाल रखा है, उनमें स्टेन स्वामी भी एक थे।
अब यह भी सामने आने लग गया है कि एक बड़े शासन निर्देशित षड़यंत्र के तहत उन्हें अन्य सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ फंसाया गया था। इस बीच ऐसे भी आंकड़े सामने आये हैं जिनसे पता चलता है कि गैर कानूनी गतिविधियों से संबंधित एंटी टेरर लॉ या यूएपीए के तहत दर्ज किये गये मामलों में 98 फीसदी ऐसे रहे जिनमें या तो पुलिस आरोप पत्र ही दाखिल नहीं कर सकी या उन पर अभियोजन सिद्ध नहीं हो सका है। वैसे तो सारी सरकारें अपने खिलाफ उठने वाली आवाजों को दबाने के लिए कानूनी या गैर कानूनी तरीकों से दबाने की कोशिशें करती हैं, परंतु पिछले 7 वर्षों में यह प्रवृत्ति काफी बढ़ी है। केन्द्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आने के बाद असहमति की आवाजों को खामोश करने का मानो सिलसिला ही चल पड़ा है। दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विवि, उस्मानिया विवि (हैदराबाद), बनारस हिन्दू विवि आदि के छात्रों के हुए दमन से प्रारंभ यह श्रंृखला अब भी जारी है। इन विश्वविद्यालयों में फीस बढ़ोतरी, छात्रवृत्तियों में कटौती, दलित छात्र रोहित वेेमूला की आत्महत्या, नजीब अहमद का गायब होना आदि ऐसे मुद्दे थे, जिनसे छात्रों ने देश भर में आंदोलन किये थे। अनेक छात्रों को देशद्रोह का आरोप लगाकर जेल भेजा गया था परंतु ऐसे अपराध कभी साबित नहीं हो सके। केन्द्र सरकार के इशारे पर उसके द्वारा लाये गये नागरिकता कानूनों का भी देश भर में विरोध हुआ था। इसे भी सरकार द्वारा सभी तरह के हथकंडे अपनाकर कुचल दिया गया। आंदोलनरत लोगों पर लाठी चार्ज, पानी की बौछारें, उन्हें जेल में डालना, पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा पिटवाने जैसे उपाय अपनाये गये। दिल्ली के अलावा उत्तर प्रदेश में भी योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद बड़ी संख्या में सरकार विरोधी लोगों को जेलों में डाला गया है। यहां तक कि सरकार विरोधी एवं प्रशासकीय असफलता की खबरें छापने वाले पत्रकार भी नहीं बख्शे गये। यहां नागरिकता कानून के विरोधियों की संपत्तियां तक जब्त करने का नियम बनाया गया।
भारत में जिस तरह से असहमति भरी आवाजों को बंद करने के शासकीय प्रयास हुए हैं, उससे भारत के लोकतंत्र की बुनियाद हिल गई है। सरकार से असहमति लोकतंत्र का प्रमुख गुण-धर्म है। लोकतांत्रिक प्रणाली में सरकार की आलोचना अंतर्निहित है। विपक्ष चाहे जिस रूप में हो, प्रजातंत्र में सम्मान का पात्र है- चाहे वह प्रतिपक्ष हो अथवा मीडिया या नागरिक। यह उनका मूलभूत अधिकार है जिसकी रक्षा सरकार को करनी होती है। व्यवस्था के तीनों अंगों अर्थात विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का यह प्रमुख कर्तव्य भी है। इन तीनों का औचित्य और सार्थकता नागरिकों के इस अभिव्यक्ति के अधिकार को अक्षुण्ण रखने में है। दुर्भाग्य से भारत इस मोर्चे पर बुरी तरह से विफल रहा है। इसे लेकर जहां एक ओर देश के अंदरूनी हिस्सों में व्यापक छटपटाहट, व्याकुलता और असंतोष है, वहीं पूरी दुनिया में भारत की भद्द पिट रही है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया भारत के लोकतंत्र की इस नाकामी को उजागर कर रहा है, बनिस्बत भारतीय मीडिया के, जो सरकार के हाथों में सिमट कर रह गया है और उसकी गैर लोकतांत्रिक प्रवृत्तियों को बढ़ावा दे रहा है। हाल ही में भारत विभिन्न देशों में लोकतंत्र की रैंकिंग में काफी नीचे उतर आया है तथा मोदी का शुमार उन नेताओं में होने लगा है जो लोकतंत्र का गला घोंटने में अग्रणी हैं।
सोशल मीडिया पर सरकार समर्थित लोगों द्वारा विरोधियों को दबाना भी असहमति की आवाज बंद करने की प्रक्रिया का एक हिस्सा है। फेसबुक, ट्वीटर आदि को भी सरकार ने अपने अधीन कर लिया है। इसके कारण सरकार विरोधी या असहमत विचारों के सामने आने का मार्ग अवरूद्ध हो गया है। लोकतंत्र खुले संवाद के मंच की मांग करता है। आज यह भारत में इतना सिकुड़ गया है कि वह समापन की कगार पर है।
ऐसा नहीं है कि न्यायपालिका ने या उससे जुड़े किसी जस्टिस ने इस तरह की बात पहली बार कही हो। कभी सुप्रीम कोर्ट ने ही कहा था कि ”असंतोष की अभिव्यक्ति प्रेशर कूकर के सेफ्टी वॉल की तरह है। अगर इसे न खोला गया तो कूकर फट सकता है। उम्मीद है कि भारत सरकार और उसके स्वभाव वाली अन्य राज्य सरकारें असहमति या विरोध के दमन से बाज आएंगी और जिस लोकतांत्रिक प्रणाली से चुनकर वे सत्ता में आई हैं, उस व्यवस्था का सम्मान-पालन करेंगी।

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