साँसों की मॉकड्रिल..

‘फिर मैंने कहा दिमाग मत लगाओ अब वो छांटो जिनकी ऑक्सीजन बंद हो सकती है। एक ट्रायल मार दो। पता चल जाएगा कि कौन मरेगा कौन नहीं। मॉकड्रिल सुबह 7 बजे की। जिरो कर दिए’ 22 मरीज छंट गए, 22 मरीज। नीले पड़ने लगे हाथ-पैर छटपटाने लगे, तुरंत खोल दिए। ये उस कथित वीडियो में हुई बातचीत का एक अंश है, जिसमें डॉ. अरिंजय जैन किसी को बता रहे हैं कि कैसे आक्सीजन की कमी होने पर अस्पताल में मॉकड्रिल की गई। इसी मॉकड्रिल के कारण कथित तौर पर 22 लोगों की जान चली गई। इस बातचीत के आगे हिंदी फिल्मों के क्रूर से क्रूर खलनायक भी पानी भरते नजर आएंगे। जिस अस्पताल में भरोसे के साथ मरीजों को उनके परिजनों ने भर्ती कराया, वहां इस तरह का व्यवहार अगर वाकई हुआ है, तो इसे नरसंहार के अलावा और कुछ नहीं कहा जा सकता। इस चिकित्सीय आतंकवाद की ईमानदारी से पूरी पड़ताल होनी चाहिए। और दोषियों को सख्त से सख्त सजा मिलना चाहिए। लेकिन उसके साथ-साथ सवाल प्रशासन पर भी खड़े होने चाहिए।

आगरा के श्री पारस हास्पिटल में अप्रैल में घटी ये घटना जब वायरल वीडियो के जरिए जनता के सामने आई तो स्वाभाविक तौर पर हंगामा खड़ा हुआ। अस्पताल प्रशासन के साथ-साथ जिला प्रशासन ने भी इस घटना को रफा-दफा करने की भरपूर कोशिश की। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी तो पहले ही दावा कर चुके थे कि आक्सीजन की कोई कमी नहीं है, तो फिर जिला प्रशासन उनकी बात कैसे काटता। लिहाजा यही साबित करने की कोशिश की गई कि आगरा में आक्सीजन की कोई कमी नहीं थी। लेकिन प्रशासन की इस बचाव मुद्रा के बाद भी यह सवाल तो उठता ही है कि जब इसी पारस अस्पताल को पिछले साल कोरोना संक्रमण के दौरान लापरवाही बरतने के कारण सील किया गया था, तो दूसरी लहर के दौरान उसे कोविड अस्पताल किसने और क्यों बनाने दिया। गौरतलब है कि अप्रैल 2020 में पारस अस्पताल के संचालक डॉ. अरिंजय जैन और प्रबंधक के विरुद्ध डीएम प्रभु एन सिंह ने महामारी फैलाने के आरोप में मुक़दमा दर्ज कराया था।

आरोप था कि अस्पताल ने बिना प्रशासन को सूचित किए कोरोना मरीज भर्ती किए। फिर उन्हें डिस्चार्ज कर दिया। इससे 10 जिलों में संक्रमण फैला था। इसके बाद अस्पताल में दस महीने तक कोविड मरीज भर्ती पर रोक लगी रही। लेकिन अप्रैल, 2021 में दोबारा पारस अस्पताल को कोविड मरीज भर्ती करने की अनुमति मिल गई। जाहिर है यह काम बिना राजनैतिक रसूख के संभव नहीं हुआ होगा। एक सवाल ये भी है कि अगर आक्सीजन की कमी न भी हुई हो, तब भी 22 मरीजों की मौत तो एक ही दिन हुई है। क्या यह अपने आप में संगीन मामला नहीं है।

बहरहाल, अब बात जनता तक पहुंच गई और प्रियंका गांधी जैसे नेताओं ने इस मुद्दे पर योगी सरकार को घेरा तो फिलहाल अस्पताल को सीज करने के साथ-साथ उसका और उसके संचालक डॉक्टर का लाइसेंस निलंबित किया गया है। इस मामले को महज एक अस्पताल और उसके संचालक की मनमानी तक सीमित कर देखेंगे तो निजी अस्पतालों की लूट जैसे शीर्षकों से आगे ही नहीं बढ़ पाएंगे और मौत का ऐसा खेल एक जगह से दूसरी जगह तक फैलता जाएगा।

दरअसल ऐसे मामलों के साथ राजनैतिक अनदेखी को भी याद रखना चाहिए और सरकार से इसका हिसाब मांगना चाहिए। याद कीजिए, इसी उत्तरप्रदेश के गोरखपुर में अगस्त 2017 में बीआरडी अस्पताल में आक्सीजन खत्म हो जाने की वजह से 60 बच्चों की मौत हो गई थी। उस वक्त अपने स्तर पर आक्सीजन सिलेंडर पहुंचाने वाले डॉ.कफील खान को समाज ने हीरो माना, लेकिन हिंदुत्व की राजनीति के कारण वे सबसे बड़े खलनायक की तरह पेश किए गए। उन पर कानूनी कार्रवाइयों का दौर शुरु हो गया और असल मुद्दा इस राजनीति में खो गया कि आखिर अस्पताल में आक्सीजन न पहुंच पाने के असल कारण क्या थे। क्यों सरकार ने आक्सीजन आपूर्तिकर्ता का बकाया भुगतान समय पर नहीं किया। क्यों आज भी अस्पतालों में आक्सीजन आपूर्ति जैसे जरूरी कामों में ठेकेदारों पर आश्रित रहने की जरूरत है।

कोरोना की दूसरी लहर में आक्सीजन की कमी से हजारों जानें रोजाना गई हैं, लेकिन यह स्थिति एक दिन में नहीं बनी। पिछले साल ही वेंटिलेटर्स की कमी से देश जूझा था और तभी कई डाक्टरों ने आक्सीजन की कमी की चिंता भी जतलाई थी। पिछले साल सितंबर से प्रधानमंत्री कार्यालय की एक समिति आक्सीजन आपूर्ति देख रही थी। इसके बावजूद कोरोना की दूसरी लहर में सरकार की तैयारियों की पोल खुल गई। प्रधानमंत्री मोदी तो कभी किसी गलती की जिम्मेदारी लेंगे नहीं, इसलिए अब वे कोरोना को सदी की सबसे बड़ी महामारी बता रहे हैं और राष्ट्र के नाम संबोधन में उन्होंने कहा कि सेकेंड वेव के दौरान अप्रैल और मई के महीने में भारत में मेडिकल ऑक्सीजन की डिमांड अकल्पनीय रूप से बढ़ गई थी… सरकार के सभी तंत्र लगे। ऑक्सीजन रेल चलाई गई, एयरफोर्स के विमानों को लगाया गया, नौसेना को लगाया गया। इस तरह फिर मोदीजी ने अपनी वाहवाही करवा ली। लेकिन उनसे पूछा जाना चाहिए कि जब जानकार पहले से चेतावनी दे रहे थे कि आक्सीजन की कमी हो सकती है, तो फिर यह अकल्पनीय कैसे हो गई। और सेना राहत व बचाव का चाहे जितना काम कर ले, उससे सरकार अपनी जिम्मेदारी से बरी नहीं हो सकती।

आगरा में जो हुआ, उसका सच तो ईमानदार जांच के बाद ही सामने आएगा, लेकिन सरकार की लापरवाही का सच भी जनता के सामने आना चाहिए।

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