ज़रूरत नमक की, सवाल जमीर का..

-सर्वमित्रा सुरजन॥

जिस फैसले से जनता का भला हो, वही लिया जाए, चाहे इसके लिए खुद को कितना भी बड़ा जोखिम क्यों न उठाना पड़े। गांधीजी इसी तरह की मजबूती आए दिन अंग्रेजों को दिखाते रहते थे और अंग्रेज इसी उधेड़बुन में रहते थे कि इस दुबले-पतले, धोतीधारी इंसान को झुकाया कैसे जाए। लेकिन गांधीजी झुके तो केवल नमक उठाने के लिए।

पुर्तगाल के स्टार फुटबॉलर क्रिस्टियानो रोनाल्डो ने पिछले दिनों यूरो 2020 में हंगरी के खिलाफ मुकाबले से पहले एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कुर्सी पर बैठते ही पहला काम ये किया कि मेज पर रखी कोका-कोला की दो बोतलों को हटा दिया और पानी की बोतल उठा कर पानी पीने की सलाह दी। उनके इतना करने से कोका-कोला के स्टॉक लुढ़क गए और कंपनी को 4 बिलियन अमेरिकी डॉलर यानी करीब 29 हजार करोड़ का नुकसान हो गया। यह घटना आग की तरह सोशल मीडिया पर फैली और मीम्स बनने लगे। रोनाल्डो के बाद फ्रांसीसी फुटबॉलर पॉल पोग्बा ने हैनिकेन बीयर की बोतल इसी तरह प्रेस कांफ्रेंस में मेज से नीचे रख दी। जैसे रोनाल्डो सॉफ्ट ड्रिंक नहीं पीते हैं, वैसे ही पोग्बा भी अल्कोहल का सेवन नहीं करते हैं। वे दोनों बेहतरीन खिलाड़ी हैं और अपनी सेहत को लेकर जागरुक हैं।

इसलिए उन्होंने उन पेय पदार्थों से दूरी बनाई, जो सेहत के लिए हानिकारक हैं और इस दूरी का सार्वजनिक प्रदर्शन इन दोनों खिलाड़ियों ने शायद इसलिए करना जरूरी समझा, क्योंकि उनके ऐसा करने से उन लाखों युवाओं को प्रेरणा मिल सकती है, जो रोनाल्डो या पोग्बा को अपना आदर्श मानते हैं। अपनी इस पहल से ये दोनों खिलाड़ी नायक वाला दर्जा पा रहे हैं। किसी भी इंसान की तरह रोनाल्डो या पोग्बा में भी कई कमियां होंगी। इन्होंने अपने अतीत में गलतियां की होंगी और भविष्य में भी कर सकते हैं। लेकिन वर्तमान में इन दोनों खिलाड़ियों ने जो जज्बा दिखाया है, उसे देखते हुए इनकी तारीफ करने में कंजूसी नहीं करना चाहिए। क्योंकि पूंजीवादी व्यवस्था के सामने खड़े होने का जज्बा आज दुर्लभ होता जा रहा है। याद रहे कि कोका कोला और हैनिकेन दोनों ही यूरो कप के प्रायोजक हैं।

यानी ऐसे खर्चीले आयोजनों के पीछे इन कंपनियों की बड़ी पूंजी लगी है। इस पूंजी के बदले ये अपना प्रचार करती हैं। फुटबॉल, क्रिकेट, टेनिस, बैडमिंटन और अब तो कबड्डी जैसे देसी खेल भी पूंजीवादी व्यवस्था से संचालित होते हैं। जाहिर है ऐसे में खिलाड़ियों से उनके बेहतरीन प्रदर्शन की उम्मीद प्रायोजक करते हैं, ताकि ऐसे आयोजनों की लोकप्रियता बढ़े और उन्हें अपने उत्पादों के लिए बड़ा बाजार मिले। मैदान के बाहर ये खिलाड़ी खेल भावना दिखाएं न दिखाएं, प्रायोजकों की उनसे ये उम्मीद रहती है कि उनके उत्पादों का प्रचार इन खिलाड़ियों के जरिए होता रहे।

इस नजरिए से देखें तो कोका कोला और हैनिकेन, इन दोनों बड़े ब्रांडों को रोनाल्डो और पोग्बा ने निराश करने का जोखिम उठाया है। ऐसा करने वाले वे अनूठे खिलाड़ी नहीं हैं। 2001 में ऑल इंग्लैंड चैंपियनशिप जीतने के बाद बैडमिंटन खिलाड़ी और अब कोच पुलेला गोपीचंद को 2002 में सॉफ्ट ड्रिंक का विज्ञापन मिला था, लेकिन अच्छी-खासी अनुबंध राशि को ठुकराते हुए उन्होंने ऐसे उत्पाद का विज्ञापन करने से इन्कार कर दिया, जिससे सेहत पर खराब असर पड़ता है। 2017 में क्रिकेट खिलाड़ी विराट कोहली ने भी ऐसा ही इन्कार किया था। 2014 में सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने भी पेप्सी का विज्ञापन करने से इन्कार किया था, क्योंकि एक स्कूली छात्रा ने उनसे पूछा था कि वे जहर का समर्थन क्यों करते हैं। हालांकि इससे पहले कई बरसों तक अमिताभ बच्चन पेप्सी का विज्ञापन करते रहे हैं और उन पर सवाल भी उठे कि आखिर तब उन्हें ये अहसास क्यों नहीं हुआ कि वे सही नहीं कर रहे हैं। दरअसल यहां सवाल जमीर का है, जिसका असल इम्तिहान बड़ी पूंजी के सामने होता है।

सितारों, महानायकों और भगवानों का दर्जा पाए इंसान कई बार जमीर के मामले में आम इंसानों से काफी पीछे नजर आते हैं। अपनी लोकप्रियता को भुनाते हुए वे यह भूल जाते हैं कि उनके एक कदम का समाज पर क्या असर पड़ेगा। पानमसाला, इलायची के रूपहले आवरण में लिपटी तंबाखू, सोडा के नाम पर शराब, नूडल्स और चिप्स जैसे कितने ही उत्पादों का विज्ञापन इन सितारों के कारण रातों-रात लोकप्रिय हुआ और इनकी बिक्री में इजाफा हुआ। अमिताभ बच्चन, ऋ तिक रोशन, सलमान खान, शाहरुख खान, आमिर खान, आलिया भट्ट, कटरीना कैफ, जूही चावला, माधुरी दीक्षित ऐसे तमाम फिल्मी सितारों ने उन उत्पादों का विज्ञापन किया, जिनका इस्तेमाल वे शायद खुद न करते हों, न ही अपने बच्चों को उनके उपभोग की इजाज़त देतें हों। महज पैसों की खातिर इन लोगों ने बड़े ब्रांडों के साथ अनुबंध किया, हालांकि इनमें से किसी को पैसे की ऐसी जरूरत संभवत: नहीं है कि जो काम मिले, उस पर गलत-सही का विचार किए बिना कर लें। इन लोगों को सितारों का दर्जा इनके प्रशंसकों के कारण ही मिलता है। ये सितारे चाहें तो अपनी हैसियत का इस्तेमाल समाज को बेहतर दिशा देने में कर सकते हैं। लेकिन भारत में इस वक्त ऐसे गिने-चुने लोग ही रह गए हैं, जो अपनी सेलिब्रिटी वाली ताकत और प्रभाव का सही इस्तेमाल करते दिखें।

उद्योगपतियों के घर शादियों में बारातियों को भोजन परोसने वाले या उनके संगीत में नृत्य पेश करने वालों से यह उम्मीद रखना शायद बेमानी है कि वे इनके हितों के खिलाफ जाकर कोई बात करेंगे, फिर चाहे वो व्यापक देशहित में ही क्यों न हो। अभी देश पिछले सात महीनों से किसान आंदोलन का साक्षी बना हुआ है। कई बड़ी हस्तियों ने इन किसानों के समर्थन में खुलकर अपनी आवाज़ उठाई, बहुत से लोग इनके बीच धरनास्थल तक गए। लेकिन मजाल है कि इन तथाकथित सुपरस्टार्स ने अपनी रीढ़ की हड्डी का दम दिखाया हो। जनता से इन्हें मतलब तभी तक है, जब तक उनके प्रशंसकों की संख्या बढ़ती रहे और बॉक्स आफिस पर उनकी फिल्में सौ करोड़ के क्लब में शामिल होती रहें। इसके अलावा इनका जनता से कोई सरोकार नजर नहीं आता। तभी तो कई बड़ी घटनाओं पर ये चुप्पी साध जाते हैं, लेकिन किसान आंदोलन पर सरकार की किरकिरी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हो, तो उसे देश का आंतरिक मामला बताने वाला ट्वीट कर देते हैं, वो भी मौलिक नहीं, बल्कि चिपकाया हुआ।

फिल्मी सितारे तो कला के नाम पर अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से किनारा कर सकते हैं। हालांकि जिनमें रीढ़ होती है, वे एक कलाकार के समाज के प्रति दायित्व को समझते हैं और गलत को गलत कहने का हौसला रखते हैं। इस वजह से उन्हें नुकसान भी उठाना पड़ता है। अतीत में कई ऐसे प्रकरण हुए हैं जब किसी कलाकार को किसी विज्ञापन या फिल्म से उसके राजनैतिक विचारों के कारण बाहर कर दिया गया। लेकिन बिना रीढ़ वाले लोग अब राजनीति में भी बहुतायत में पाए जाने लगे हैं। खुद को जनप्रतिनिधि कहने वाले ये लोग असल में कार्पोरेट के हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए लालायित रहते हैं। इसलिए उनके गलत कामों को या तो कानून की शक्ल देकर सही करवाने के पैंतरे आजमाते हैं या फिर उसे अनदेखा कर देते हैं। जब जनसमुदाय इन गलत कामों और उन्हें संरक्षण देने वाले सरकारी फैसलों का विरोध करते हैं, तो उन्हें कभी माओवादी कहा जाता है, कभी आतंकवादी। देश के कई हिस्सों में चल रहे आदिवासियों के विरोध, आंदोलनों को इसी तरह तो दबाने की कोशिशें हो रही हैं। राजनैतिक दलों को भारी-भरकम चंदा देकर कार्पोरेट घराने उन्हें अपना गुलाम बना लेते हैं और फिर आका की तरह उनसे हुक्म बजवाते हैं। देश में इस वक्त जो विकासगाथा सुनाई जा रही है, उसमें इस सच्चाई को देखा जा सकता है। इसके बाद दाढ़ी-मूछों पर ताव भी इस बात का है कि देश को मजबूत सरकार मिली है।

सत्ता की शक्तियों के बूते किसी के बैंक बैलेंस को करोड़ों से अरबों में पहुंचवाना न विकास है न मजबूती। असली मजबूती तो तब है जब इन अरबपतियों-खरबपतियों के सामने सिर उठा कर खड़ा हुआ जाए, उन्हें अपनी पीठ पर हाथ रखने से रोका जाए और जिस फैसले से जनता का भला हो, वही लिया जाए, चाहे इसके लिए खुद को कितना भी बड़ा जोखिम क्यों न उठाना पड़े। गांधीजी इसी तरह की मजबूती आए दिन अंग्रेजों को दिखाते रहते थे और अंग्रेज इसी उधेड़बुन में रहते थे कि इस दुबले-पतले, धोतीधारी इंसान को झुकाया कैसे जाए। लेकिन गांधीजी झुके तो केवल नमक उठाने के लिए। इसी नमक की आज देश को सख्त जरूरत है।

Facebook Comments Box

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *