लोकतंत्र के हित में हैं ममता के विपक्षी एकता के प्रयास

तीसरी बार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनने के बाद ममता बैनर्जी ने एक बार फिर से राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकजुटता के प्रयास तेज कर दिये हैं। ममता से कई तरह के मतभेदों और शत-प्रतिशत वैचारिक साम्यता न रखने वाले प्रतिपक्षी नेता और सामान्यजन भी चाहते हैं कि उनकी कोशिशों को सफलता मिले। एक संयुक्त विपक्ष 2024 में सरकार बनाने में सफल हो या नाकाम, लेकिन लोकतंत्र में यकीन रखने वाले सभी लोग जानते-मानते हैं कि देश को एक मजबूत विपक्ष की नितांत आवश्यकता है। यह बतलाने की जरूरत नहीं है कि ताकतवर विरोधी दलों की संसद में उपस्थिति जनतांत्रिक प्रणाली में किस कदर अपरिहार्य एवं महत्वपूर्ण है।

भारतीय जनता पार्टी द्वारा कभी ‘कांग्रेस विहीन भारत’ का दिया गया नारा जब ‘विपक्ष विहीन भारत’ तक पहुंच ही गया है तो अन्य दल एवं आम जनता भी उसके दुष्परिणाम प्रत्यक्ष देख रही है। केन्द्र की भाजपा सरकार द्वारा जिस तरह से निरंकुश शासन प्रणाली अपनाई जा रही है, उससे लोग तानाशाही के आसन्न खतरे को भी भांप चुके हैं। ऐसे में संभवत: कई विपक्षी दल, उनके नेता एवं समर्थक ममता की पहल का स्वागत कर सकते हैं। देखना तो यह है कि क्या ममता की मेहनत रंग लाती है और भाजपा प्रणीत केन्द्र सरकार के सामने एक सशक्त  प्रतिरोध खड़ा हो सकेगा। उनकी सफलता या असफलता तो बाद की बात है, फिलहाल ममता तो वह कर रही हैं जो देश की फौरी आवश्यकता है। अब यह विपक्षी दलों पर निर्भर करता है कि वे ममता की पुकार एवं कोशिशों का कैसा प्रतिसाद देते हैं। इसी पर भारत का भवितव्य व लोकतंत्र निर्भर करता है। खासकर इसलिए  कि मौजूदा दौर में इस तरह की साहसिक पहल न तो कोई कर रहा है और न ही किसी में ऐसा करने की इच्छा, हिम्मत या क्षमता है। 

इस सिलसिले में ममता मंगलवार से ही दिल्ली में हैं जहां उन्होंने पहले ही दिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ और आनंद शर्मा से मुलाकात की।  बुधवार को उनकी भेंट कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से भी हुई। कदाचित राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार से भी वे मुलाकात करेंगी। 

ममता ने अपने राज्य में भाजपा का पिछले 10 वर्षों से कड़ा मुकाबला करते हुए देश के सामने यह उदाहरण प्रस्तुत किया ही है कि एक ताकतवर व निरंकुश सरकार से कैसे लड़ा जाता है। भाजपा व केन्द्र द्वारा अपनाये गये तमाम हथकण्डों के बावजूद ममता ने पिछले दिनों सम्पन्न हुए विधानसभा चुनावों में उसे परास्त कर अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस पार्टी (टीएमसी) को शानदार जीत दिलाई है। पहले भी वे भाजपा विरोधी दलों को एक मंच पर एकत्र करने का प्रयास कर चुकी हैं। ममता को मुख्यमंत्री बनने पर बधाई देने के लिए किसान नेता राकेश टिकैत भी कोलकाता पहुंचे थे। उल्लेखनीय है कि किसान आंदोलन ने प. बंगाल के विस चुनाव में भाजपा को हराने की अपील की थी। इसका सीधा फायदा टीएमसी को मिला था। पिछला चुनाव जिस तरीके से जीता था, उससे ममता की रणनीतिक कुशलता का भी परिचय देशवासियों को मिला था और उनकी सभी ने तारीफ की थी। तभी से उनसे सामूहिक विपक्ष का नेतृत्व करने की अपेक्षा की जाने लगी है। 

भाजपा को पटकनी देने के बाद ममता का कद और रूतबा काफी बढ़ा है। फिलहाल उन्हें विपक्ष की सर्वमान्य नेता या अगले चुनावों में मोदी के खिलाफ प्रधानमंत्री पद के चेहरे के तौर पर तो नहीं, लेकिन धुरी के रूप में अवश्य देखा जाने लगा है। क्षेत्रीयता के खोल से वे इसलिए बाहर आ रही हैं क्योंकि अब वे अपने राज्य की ओर से काफी निश्चिंत हैं। वहां भाजपा नैतिक रूप से भी पराजित है और केन्द्र के पास टीएमसी की सरकार को गिराने के कोई उपाय नहीं रह गये हैं। ममता की पार्टी छोड़कर भाजपा में गये कई लोग या तो लौट आये हैं या पुनर्प्रवेश की बाट जोह रहे हैं। 

सुश्री बैनर्जी जानती हैं कि कांग्रेस को साथ लिए बिना विपक्षी एकता संभव नहीं है। इसलिए वे देश की सबसे पुरानी उस पार्टी को पर्याप्त आदर तथा तवज्जो दे रही हैं जिसके सदस्य के रूप में उन्होंने अपना राजनैतिक कैरियर एक युवा नेत्री के रूप में प्रारम्भ किया था। पार्टी से अलग होकर भी उनके कम से कम सोनिया गांधी से अच्छे संबंध बने रहे। प. बंगाल को तीसरी बार फतह करने से उनके अपने सम्मान में व्यापक बढ़ोतरी हुई है। इस बीच कमजोर हुई कांग्रेस भी परस्पर सहयोग के साथ भाजपा का मुकाबला करना चाहेगी। अपने प्रयासों में ममता कितनी सफल होती हैं, यह आने वाला समय ही बतायेगा।

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