भाजपा और केन्द्र सरकार से निराश कश्मीरी पंडित

अनुच्छेद 370 के हटने पर लाखों की संख्या में विस्थापित हुए कश्मीरी पंडितों की घर वापसी के दावे करने वाली केन्द्र सरकार द्वारा अब तक उस दिशा में कोई ठोस कदम न उठाने से जहां एक ओर वे निराश हैं, वहीं उसके मंत्री ऊलजलूल बयानों से अपने ही वतन में निर्वासित हो गये लोगों के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम कर रहे हैं। स्वयं कश्मीरी पंडित सरकार से नाराज दिख रहे हैं। दो साल पहले 370 की समाप्ति से उन्हें घर वापसी की जो आशा बंधी थी, वह भी खत्म होती दिख रही है। 

विदेश राज्य मंत्री मीनाक्षी लेखी ने इस बाबत मंगलवार को एक बेहद गैरजिम्मेदाराना बयान दिया है। उनका कहना है कि ‘जब लॉकडाउन में लाखों की संख्या में मजदूर अपने घरों को लौट सकते हैं तो कश्मीरी पंडित क्यों नहीं लौटे?’  उनका तो यह भी कहना है कि ‘लाखों लोग अपने घरों को छोड़कर अलग राज्यों में निवास करते हैं और खुश रहते हैं।’ मीनाक्षी सत्तारुढ़ दल भारतीय जनता पार्टी की प्रवक्ता भी हैं।  इसलिए यह माना जाना चाहिये कि उन्हें भाजपा और केन्द्र की कश्मीर संबंधी नीति और नज़रिये का पूरा ज्ञान है। वे खुद सुप्रीम कोर्ट की वकील हैं। उनके पति अमन लेखी भी वहीं वकील हैं। उनके दिवंगत ससुर प्राणनाथ लेखी उच्चतम न्यायालय के वकील रहे जिन्हें आज भी एक संविधान विशेषज्ञ के रूप में याद किया जाता है। दिल्ली से ही सांसद बनीं मीनाक्षी को इसलिये कश्मीरी पंडितों के दुख-दर्द का एहसास होना चाहिये क्योंकि नब्बे के दशक से विस्थापित हुए कश्मीरी पंडितों की सर्वाधिक संख्या दिल्ली में ही है जो शरणार्थी शिविरों में नारकीय जीवन बिता रहे हैं। अगर वे नहीं जानतीं तो उन्हें सांसद बने रहने का हक नहीं है। 

कश्मीरी पंडितों के इस मुद्दे को लेकर पिछले कई दशकों से भाजपा ने अपनी राजनीति को खूब चमकाया है। एक तरह से यह उनके साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की रणनीति का एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है। जब अनुच्छेद 370 को हटाया गया तो उसके जो अनेक उद्देश्य बताये गये थे, उनमें यह भी था कि इससे कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापसी का मार्ग प्रशस्त होगा। उस अनुच्छेद के हटने का दूसरा साल पूरा हो गया है, तो लोगों द्वारा यह पूछा जाना स्वाभाविक है कि आखिर इस मुद्दे पर सरकार कितना आगे बढ़ी है। मीनाक्षी का तो कहना है कि इस प्रश्न के उठाए जाने पर ही उन्हें अचरज है। मीनाक्षी लेखी का यह बयान उनकी पार्टी के रवैये के ही अनुरूप है जो इस मुद्दे पर कतई गंभीर नहीं है।  उल्टे, भाजपा एवं सरकार के लिए यह हमेशा से ही राजनैतिक एवं चुनावी मुद्दा रहा है। ऐसे मुद्दे उसके लिए वोट दिलाने का काम करते हैं। इसलिए इसमें संदेह है कि केन्द्र सरकार एवं भाजपा इसका वास्तव में निराकरण करना चाहती है। इस मसले के लटके रहने में ही उनका लाभ है। 
वैसे कश्मीरी पंडितों को फिर से घाटी में बसाने के नाम पर केवल मंदिरों का जीर्णोद्धार हो पाया है। उनके अधिकारों के लिए लड़ने वाले संगठन ‘रिकांसिलेशन, रिटर्न एंड रिहैबिलिटेशन ऑफ  माइग्रेंट्स’ के अध्यक्ष सतीश महालदार ने मंगलवार को जारी एक बयान में कहा है कि ‘सभी सरकारें कश्मीरी पंडितों को दोबारा घाटी में बसाने में विफल रही हैं। प्रशासन 50 हजार मंदिरों के जीर्णोद्धार की बात करता है। वे मंदिर अब हैं ही कहां? जब पंडित यहां नहीं रहेंगे तो इन मंदिरों में प्रार्थना कौन करेगा?’ उनका यह भी आरोप है कि ‘5 अगस्त, 2019 को जो कहा गया था, वह अभी धरातल पर नहीं उतरा है।’  स्पष्ट है कि सत्ता में आने के सात साल और 370 को हटाने के दो वर्षों के बाद भी इस दिशा में कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया गया है।

स्वयं कश्मीरी पंडित ही जब केन्द्र व भाजपा से बेहद निराश हो चुके हैं, तो साफ है कि भाजपा के लिए यह केवल लाभ के लिए उठाया गया मुद्दा है। जनता भी इसे समझ चुकी है लेकिन कम से कम पार्टी और सरकार को चाहिये कि अपनी प्रवक्ता एवं मंत्री मीनाक्षी पर न केवल लगाम कसे वरन उन्हें मंत्रिमंडल से बर्खास्त भी करे। कश्मीरी पंडितों का विस्थापन एवं पुनर्वास अत्यंत संवेदनशील मुद्दा है जिसे इस तरह के बेतुके, गैरजिम्मेदाराना और पीड़ितों को आहत करने वाले बयानों से नहीं सुलझाया जा सकता। 

मोदी सरकार एवं पार्टी की आलोचना करने वालों पर टूट पड़ने वाली मीनाक्षी ने अभी कुछ दिनों पहले ही केन्द्र द्वारा लाये गये तीन कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की तीनों सीमाओं एवं जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे किसानों को ‘मवाली’ कहकर संबोधित किया था। हालांकि इसके लिए उन्होंने बाद में खेद भी प्रकट किया था। ऐसे बयान न केवल पीड़ित पक्षों के घावों पर नमक छिड़कते हैं वरन समाज में कटुता भी फैलाते हैं।

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