प्रधानमंत्री का सातवां अमेरिकी दौरा

प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका की अपनी सातवीं यात्रा से लौट आए हैं। इस बार का मोदीजी का दौरा चार दिनों का था। इन चार दिनों में संयुक्त राष्ट्र की सालाना आमसभा में हिस्सा लेने के साथ-साथ क्वाड समूह की पहली प्रत्यक्ष शिखर बैठक में मोदीजी ने हिस्सा लिया। अमेरिका में कई बड़ी कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों से भी प्रधानमंत्री की मुलाकात हुई। इसके साथ ही अमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बाइडेन और उपराष्ट्रपति कमला हैरिस से प्रधानमंत्री ने मुलाकात की। सरकारी सूत्रों ने बताया कि मोदीजी करीब 65 घंटे अमेरिका में रहे और इस दौरान वह 20 बैठकों में शामिल हुए। अमेरिका जाते वक्त और वहां से लौटते वक्त भी प्रधानमंत्री ने विमान में अधिकारियों के साथ 4 लंबी बैठकें कीं। विमान में कुछ कागजों को पढ़ते हुए उनकी तस्वीर भी काफी वायरल हुई, जो शायद यह बताने के लिए प्रसारित की गई है कि हमें कितने कर्मठ प्रधानमंत्री मिले हैं। 

वैसे इस देश को कभी कोई आलसी प्रधानमंत्री मिला हो, ऐसा याद नहीं पड़ता। नेहरूजी से लेकर डॉ. मनमोहन सिंह तक विशिष्ट गुणों से संपन्न प्रधानमंत्रियों ने इस देश को संभाला और आगे बढ़ाया। अपनी खास विदेश नीति के बूते दुनिया के मानचित्र में भारत की धाक बनी। विश्व के कई देशों में सन् 47 के बाद कई तरह की उथल-पुथल देखने मिली, जिसमें वैश्विक शक्तियों ने अपने-अपने स्वार्थ के लिहाज से भूमिकाएं निभाईं, लेकिन भारत अपनी गुटनिरपेक्ष नीति के कारण सम्मान का पात्र बना रहा और उस लिहाज से अपनी सार्थक भूमिका निभाता रहा। पूर्व प्रधानमंत्रियों ने भी कई विदेश यात्राएं कीं और वैश्विक नेताओं से उनके मधुर संबंध बने। लेकिन इस तरह घंटों का हिसाब रखकर बैठकों का ब्यौरा शायद ही कभी दिया गया हो। मोदीजी की विदेश यात्रा में अब ये पहलू भी जुड़ गया है। और जब बात अमेरिका की हो, तो मीडिया का आग्रह कुछ अलग ही हो जाता है। 

वैसे अगर मोदीजी की इस यात्रा की उपलब्धियों का लेखा-जोखा आने वाले समय में ही ठीक से हो पाएगा। उन्होंने ऐसे वक्त में अमेरिका का दौरा किया, जब हमारे पड़ोसी अफगानिस्तान में फिर से तालिबान का कब्जा हो चुका है, अमेरिका की सेनाएं वापस जा चुकी हैं और भारत के आर्थिक, सामरिक समीकरण दांव पर लगे हैं। पाकिस्तान हमेशा की तरह कश्मीर को मुद्दा बनाए हुए है। वैसे प्रधानमंत्री ने संरा आमसभा में अफगानिस्तान के हालात पर चिंता व्यक्त की, महिलाओं-बच्चों के साथ अल्पसंख्यकों की मदद का आह्वान किया, जो सीएए की वकालत जैसा लगा। मोदीजी ने आतंकवाद पर पाकिस्तान को बिना नाम लिए सुनाया और चीन को भी संकेतों में विस्तारवाद पर नसीहत दी। इशारों में यूं बातें सरकार कब तक करेगी, ये देखना है।

इस बार अमेरिका में जो बाइडन के साथ मोदीजी की पहली बार आमने-सामने द्विपक्षीय बैठक हुई। हालांकि मित्र बराक या दोस्त ट्रंप जैसी गर्मजोशी दोनों के बीच देखने नहीं मिली, लेकिन बैठक काफी अच्छे माहौल में हुई। दोनों देशों ने अपने सामरिक महत्व के सहयोग के साथ अपनी अहम साझेदारी को और मज़बूत करने की प्रतिबद्धता जताई। बदलते वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका और भारत दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है, ये बात दोनों नेता जानते हैं। हां, जो बाइडेन ने अपनी बैठक में गांधीजी के ट्रस्टीशिप और अहिंसा के सिद्धांत को जिस तरह याद किया या उससे पहले कमला हैरिस ने लोकतंत्र, लोकतांत्रिक संस्थाओं और मूल्यों की रक्षा करने की जरूरत पर जिस तरह जोर दिया, उसे भी इशारों में मोदीजी को नसीहत के तौर पर ही समझा जा रहा है। इससे पहले किस भारतीय प्रधानमंत्री को इस तरह लोकतंत्र का महत्व मंच से सुनना पड़ा, इसका इतिहास भी खंगालना चाहिए।

इस अमेरिका यात्रा का एक खास पड़ाव क्वाड समूह की बैठक था। गौरतलब है कि अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, भारत और जापान का संगठन है जिसका मकसद हिंद प्रशांत क्षेत्र में सहयोग को बढ़ाना है। माना जाता है कि अमेरिका की खास दिलचस्पी इस संगठन में इसलिए है ताकि इस इलाके में चीन के बढ़ते प्रभाव को चुनौती दी जा सके। चीन क्वाड समूह को अपना विरोधी मानता है, हालांकि इस बैठक में भी किसी ने चीन का नाम नहीं लिया। चारों देशों ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में आवाजाही की आजादी को सुनिश्चित करने के लिए मिलकर काम करने की जरूरत पर जोर दिया।

कई कूटनीतिक उपलब्धियों के साथ अमेरिका से मोदीजी 157 कलाकृतियों और पुरावशेषों को भी साथ लेकर लौटे, जो चोरी या तस्करी से भारत के बाहर ले जाईं गईं थीं। बहुत सी कलाकृतियां 10वीं से 14वीं शताब्दी के बीच की हैं, कुछ पुरावशेष 2000 ईसा पूर्व के हैं। प्रधानमंत्री देश की ऐतिहासिक विरासत को वापस लाने का प्रयास कर रहे हैं, यह खुशी की बात है। अगर लोकतंत्र के ऐतिहासिक मूल्य भी वापस आ जाएं, तो और ज्यादा खुशी होगी।

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