कांग्रेस में युवा शक्ति और सिद्धू का इस्तीफा

‘इंसान का पतन समझौते से होता है। मैं कांग्रेस के भविष्य और पंजाब की भलाई के एजेंडे से कभी समझौता नहीं कर सकता। इसलिए मैं प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देता हूं। पार्टी के लिए काम करता रहूंगा।’ चार पंक्तियों के इस खत के साथ पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष पद से नवजोत सिंह सिद्धू ने अपना इस्तीफा कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को भेज दिया। अपने खत में सिद्धू ने ये कहीं नहीं लिखा कि वे कांग्रेस छोड़ रहे हैं।

बल्कि उन्होंने पार्टी के काम करते रहने की बात कही है। वैसे अपने अप्रत्याशित कदमों के लिए मशहूर सिद्धू वाकई कांग्रेस में रहेंगे या नहीं, या अध्यक्ष पद से सचमुच हट जाएंगे या किसी और दल में चले जाएंगे या अपना कोई नया दल खड़ा कर लेंगे, इस बारे में फिलहाल कुछ कहा नहीं जा सकता। लेकिन उनके इस कदम को पंजाब कांग्रेस और राहुल-प्रियंका के नेतृत्व पर बड़े प्रहार की तरह खबरिया चैनलों पर देखा जाने लगा है। ये सही है कि चुनाव के चंद महीनों पहले कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ने की बात कहकर सिद्धू ने एक अप्रिय स्थिति पैदा कर दी। इस फैसले के लिए उन्होंने जो समय चुना, उस पर भी सवाल उठ रहे हैं।

28 तारीख की शाम को कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवाणी को कांग्रेस में राहुल गांधी शामिल करवाने वाले थे, यह बात पहले से तय थी। हालांकि इसे लेकर कोई ऐलान नहीं किया गया था, मगर नवजोत सिंह सिद्धू को अपने दल में होने वाले इस बड़े फैसले की जानकारी रही होगी। फिर भी उन्होंने इंतजार न कर उसी वक्त अपने इस्तीफे की बात चलाई। जाहिर है इससे जो सुर्खियां राहुल गांधी, कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवाणी को मिलनी थी, उसमें सिद्धू भी हिस्सेदार हो गए।

नवजोत सिंह सिद्धू के इस्तीफे के पीछे जो कारण बताए जा रहे हैं, उनमें यही बात निकल कर सामने आ रही है कि जिस महत्वाकांक्षा के साथ सिद्धू पंजाब में अपनी राजनीति कर रहे थे, वो पूरी नहीं हो पा रही थी। 2017 में भाजपा छोड़ उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ली, विधानसभा चुनाव लड़ा, जीते और मंत्री भी बने। लेकिन उनकी नजर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर थी। कैप्टन अमरिंदर सिंह से उनकी अनबन चलती रही और कांग्रेस के भीतर सिद्धू अपने बगावती तेवर दिखलाते रहे। लेकिन दो महीने पहले उन्हें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया तो इसे अमरिंदर सिंह की बड़ी हार और सिद्धू की जीत के तौर पर देखा गया। सिद्धू की कैप्टन के खिलाफ गोलबंदी बढ़ती रही और आखिरकार 18 सितम्बर को अमरिंदर सिंह का मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा हो गया। नवजोत सिंह सिद्धू ने एक बार फिर यही माना कि कांग्रेस आलाकमान का झुकाव उनकी ओर है।

लेकिन चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाकर कांग्रेस ने दलित कार्ड चला, उससे शायद सिद्धू को अपनी बाजी हाथ से जाती दिखी। अब चन्नी मंत्रिमंडल विस्तार और राज्य में अन्य महत्वपूर्ण नियुक्तियों में भी सिद्धू की मनमानी नहीं चली। शायद इन्हीं वजहों से सिद्धू ने इस्तीफा दे दिया। यह कांग्रेस आलाकमान पर दबाव बनाने का एक और तरीका हो सकता है। लेकिन इस खेल में सिद्धू शायद खुद ही अपना कैच थमा बैठे। राजनीति में सौदेबाजी अधिक देर तक काम नहीं आती और खुद को संगठन से बड़ा समझने की खुशफहमी अक्सर भारी पड़ जाती है। कैप्टन अमरिंदर सिंह भी शायद इसी खुशफहमी का शिकार हो गए थे, लिहाजा उन्हें रोकने की जरूरत कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने नहीं समझी और अब सिद्धू के साथ भी यही व्यवहार हो सकता है।

चुनावों के पहले इसे कांग्रेस के लिए बड़ा झटका कुछ विश्लेषक बता रहे हैं। भाजपा और आप के लोग भी बहुत खुश होकर प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। लेकिन हो सकता है यह फैसला कांग्रेस के पक्ष में ही जाए। नवजोत सिंह सिद्धू और कैप्टन अमरिंदर सिंह दोनों के दबाव से अगर एक साथ मुक्ति मिल जाए, तो कांग्रेस नेतृत्व नई ऊर्जा और सोच के साथ काम कर सकता है। पंजाब की राजनैतिक हलचल को राष्ट्रीय रूप देने की खबरिया चैनलों की कोशिश के बीच एक बड़ी घटना सचमुच राष्ट्रीय स्तर पर घटित हुई। कांग्रेस में आज जिग्नेश मेवाणी और कन्हैया कुमार दो बड़े जनाधार वाले युवा नेता शामिल हो गए। जिग्नेश मेवाणी गुजरात में निर्दलीय विधायक हैं, लेकिन उनका कहना है कि अगला चुनाव वे कांग्रेस प्रत्याशी के तौर पर लड़ेंगे। चरणजीत सिंह चन्नी के बाद जिग्नेश मेवाणी को आगे बढ़ाकर कांग्रेस ने दलित मतदाताओं के बीच अपनी पैठ बढ़ाने की तैयारी कर ली है। गुजरात चुनाव में इसका असर पड़ेगा ही, लेकिन उससे पहले जल्द होने वाले पांच राज्यों के चुनाव में भी इस फैसले की उपयोगिता साबित होगी।

कन्हैया कुमार का भाकपा छोड़कर कांग्रेस में आना वर्तमान राजनीति का एक महत्वपूर्ण दौर साबित होगा। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष के तौर पर कन्हैया कुमार की पहचान एक जुझारू, संघर्षशील, बौद्धिक नेता के तौर पर बनी थी, जो आज तक कायम है। केंद्र सरकार के फैसलों का जिस तार्किक तरीके से विश्लेषण कन्हैया करते हैं, जिस सहजता से, बिना कड़वाहट के वे अपने सवालों को सामने रखते हैं, वो खूबी आज के नेताओं में बिरली है। भाकपा की ओर से उन्होंने राजनैतिक पारी की शुरुआत की थी। लेकिन अब वे राहुल गांधी का साथ देने कांग्रेस में आए हैं। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि यदि कांग्रेस नहीं रही तो देश में लोकतंत्र भी नहीं रहेगा। कन्हैया कुमार के आने से बिहार समेत पूरे भारत में कांग्रेस को जमीनी मुद्दों की लड़ाई लड़ने और युवाओं को साथ जोड़ने में मदद मिलेगी।

पिछले कुछ समय में कांग्रेस से ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, सुष्मिता देव, ललितेशपति त्रिपाठी जैसे नेता अलग हुए। इन नेताओं के जाने को कांग्रेस के पैर उखड़ने की तरह निरूपित किया गया। लेकिन ये याद रखना होगा कि ये तमाम नेता उसी वंशवाद की पौध थे, जिसका विरोध भाजपा करती आई है। इन नेताओं को पारिवारिक विरासत का लाभ राजनीति में मिला। लेकिन आज कांग्रेस को ऐसे युवाओं की जरूरत है, जिनके पैर जमीन पर टिके हों, जो कांग्रेस की विरासत को आगे बढ़ाएं और उसका लाभ कांग्रेस के साथ-साथ देश को मिले। जिग्नेश और कन्हैया से इसकी शुरुआत हुई है। कांग्रेस को अपनी ये मुहिम जारी रखना चाहिए।

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