संसद है, चुनावी मंच नहीं कि जुमलेबाजी चलेगी..

सोमवार को लोकसभा और मंगलवार को राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो कुछ कहा, उसे आधिकारिक भाषा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई चर्चा का जवाब कहा जाता है। लेकिन श्री मोदी के उद्बोधन में झूठ, तथ्यों का घालमेल, संवेदनहीनता, इतिहास की गलत व्याख्या और नेहरू-गांधी परिवार एवं कांग्रेस पार्टी के लिए नफरत के सिवा कुछ नहीं था। इसलिए अब संविधान विशेषज्ञों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि इस तरह के भाषणों को किस श्रेणी में रखा जाए। लोकसभा में जब राहुल गांधी ने इस चर्चा में हिस्सा लिया था, तो उन्होंने स्पष्ट तौर पर संसदीय परंपराओं की अवहेलना की शंका जतलाई थी और कहा था कि इस मंच से जिस स्तर की चर्चाएं अभी हो रही हैं, वो नहीं होनी चाहिए। क्योंकि यहां ऐसा कभी नहीं हुआ।

आसान शब्दों में कहें तो संसद में सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के माननीय सदस्य बीते बरसों में भी एक-दूसरे पर बरसते रहे, सदनों का बहिष्कार करते रहे, हंगामे होते रहे, लेकिन फिर भी संसद की मर्यादा को लेकर चिंता का ऐसा माहौल कभी नहीं बना, जो आज बन चुका है। कारण स्पष्ट है कि संसद में इस वक्त जिस भाजपा का बहुमत है, उसके भी चाल, चरित्र और चेहरे बहुत बदल गए हैं। भाजपा हमेशा ही कांग्रेस की विरोधी रही है। भाजपा ने हमेशा ही हिंदुत्व की राजनीति की है। भाजपा का मकसद हमेशा से राम के नाम का इस्तेमाल कर सत्ता में आना था। लेकिन भाजपा की राजनीति में जिस नफरत के दर्शन इस वक्त हो रहे हैं, उतने पहले कभी नहीं हुए। जबकि बाबरी मस्जिद भी टूटी, गुजरात दंगे भी हुए, फिर भी कहीं संसदीय लिहाज का एक झीना आवरण बना हुआ था। इस हफ्ते संसद में वह आवरण भी पूरी बेशर्मी से उतार फेंका गया।

संसद के दोनों सदनों में श्री मोदी का भाषण एक प्रधानमंत्री का नहीं बल्कि भाजपा के स्टार प्रचारक का भाषण लग रहा था। उन्होंने विपक्ष पर संसदीय परंपराओं और लोकतंत्र का विरोधी होने का आरोप लगाया। लेकिन ये सब जानते हैं कि एक उंगली अगर कांग्रेस पर मोदीजी ने उठाई है, तो बाकी की तीन उन्हीं की ओर उठी हैं। अपने भाषणों में मोदीजी ने कांग्रेस के लिए अपनी नफरत के इतहार के सिवा कोई नया विचार व्यक्त नहीं किया। राष्ट्र निर्माण का संकल्प और श्रेष्ठ भारत के लिए स्वप्न, त्याग, तपस्या ऐसे भारी-भरकम शब्द श्री मोदी की जुबां से इतने बार उच्चारित हो चुके हैं कि अब इनका वजन हल्का हो गया है।

इनके अर्थ बेमानी लगने लगे हैं। सात साल से ऊपर हो गए उन्हें प्रधानमंत्री पद पर बने हुए, फिर भी कांग्रेस का ऐसा खौफ है कि चुनावी मंचों से लेकर संसद तक वे कांग्रेस के खिलाफ जहर उगलने के सिवा कुछ और बोल ही नहीं पाते। यही हाल राहुल गांधी को लेकर भी है। भाजपा ने पहले उन्हें युवराज बताया, फिर पप्पू कहा, फिर नौसिखिया राजनेता कहा, मोदीजी खुद अपने पद की गरिमा भूल कर उन्हें चिढ़ाने वाले अंदाज में फब्तियां कसते रहे हैं। और सोमवार को लोकसभा में यही सब फिर दोहराया गया। राहुल गांधी को अपने आगे कुछ न मानने वाले मोदीजी अपने पूरे भाषण में राहुल गांधी की लोकसभा में कही बातों का ही जवाब देते रहे।

इसमें उन्हें कोरोना काल की त्रासदियों के लिए कांग्रेस को ही जिम्मेदार ठहराने में कोई झिझक महसूस नहीं हुई। कम से कम उनकी अंतरात्मा ने तो ये सच उन्हें बताया ही होगा कि रातों-रात लॉकडाउन के फैसले से लाखों जिंदगियां उनके कारण ही खतरे में पड़ गईं थीं। हर किसी के पास लुटियन्स दिल्ली के बंगले नहीं थे, जो लॉकडाउन लगने के बाद भी महीनों अपने घर में चैन से बैठ सकते थे। लाखों लोगों को जिंदा रहने की मजबूरी में तपती सड़कों पर निकलना पड़ा, जिसमें कांग्रेस समेत बहुत से लोगों ने अपनी-अपनी तरह से बेघर मजदूरों की मदद की। अब मोदीजी ने उन्हें ही कोरोना के प्रसार का जिम्मेवार ठहरा दिया। महंगाई, दो उद्योगपतियों के हाथों देश के सारे संसाधन सौंप देने और राष्ट्र शब्द की व्याख्या के लिए भी मोदीजी ने कांग्रेस को खूब खरी-खोटी सुनाई। और जिन राज्यों में कांग्रेस बरसों से सत्ता से बाहर है, उनकी याद दिलाते हुए कांग्रेस के अहंकार और नीयत पर सवाल उठाए।

लेकिन सवाल दरअसल ये होना चाहिए कि मोदीजी को इस बात की इतनी फिक्र क्यों है कि कांग्रेस किस राज्य में कितने बरसों से सत्ता में नहीं आई है। वे इस बात की फिक्रक्यों नहीं करते कि उनके शासनकाल में देश महंगाई, भुखमरी, बेरोजगारी, आजादी पर पहरे के नित निए रिकार्ड क्यों बना रहा है। 80 करोड़ लोगों को अगर दो वक्त की रोटी के लिए सरकारी मदद का मोहताज होना पड़ा है, तो यह उपलब्धि है या विफलता। वैसे राहुल गांधी ने तो विदेश नीति की खामियां गिनाते हुए पाकिस्तान और चीन के करीब आने की बात भी कही थी, लेकिन मोदीजी ने भूल कर भी चीन का नाम नहीं लिया, क्योंकि वे जानते हैं कि चीन के नाम पर विधानसभा चुनावों में वोट नहीं मिलेंगे।

लोकसभा में नेहरूजी का नाम लेकर मोदीजी ने एहसान जताने की कोशिश भी की। और राज्यसभा में दिए भाषण में तो एक बार फिर अपनी कृतघ्नता और नेहरूजी के लिए घृणा के दर्शन करा दिए। उन्होंने गोवा की आजादी को लेकर नेहरूजी के प्रति भ्रम फैलाने की कोशिश की और यह अनायास नहीं है। गोवा में 14 फरवरी को चुनाव हैं और भाजपा की हालत वहां खस्ता है। इसलिए अब नेहरूजी के नाम पर कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश मोदीजी ने संसद से की। जबकि सच यही है कि आजादी के समय पं. नेहरू ने अंग्रेजों से यह मांग रखी थी कि गोवा को भारत के अधिकार में दे दिया जाए। लेकिन अंग्रेजों की दोहरी नीति व पुर्तगाल के दबाव के कारण गोवा पुर्तगाल को हस्तांतरित कर दिया गया। गोवा में आजादी के लिए संघर्ष चलता रहा और 1961 में नेहरूजी के प्रधानमंत्रित्व काल में ही भारतीय सेना ने 2 दिसंबर को ‘गोवा मुक्ति’ अभियान शुरू किया और 19 दिसंबर को गोवा को आजाद कराया। इतिहास को चालाकी से तोड़ने-मरोड़ने की संघी कोशिश राज्यसभा में दिखी, जो शर्मनाक है। पंजाब चुनाव के कारण मोदीजी ने सिख दंगों की याद दिलाई और उत्तरप्रदेश के कारण तीन तलाक की।

कुल मिलाकर मोदीजी ने विधानसभा चुनावों के लिए संसद से ही प्रचार कर दिया। लेकिन संसद का ऐसा इस्तेमाल क्या राष्ट्र निर्माण के संकल्प को पूरा करेगा, ये विचारणीय है।

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