जिंदगी के आखिरी पलों में आता है यादों का सैलाब..

-सुनील कुमार॥

अभी अनायास एक ऐसा वैज्ञानिक संयोग हुआ जिसने यह अंदाज लगाने का मौका दिया है कि इंसान अपने आखिरी कुछ पलों में क्या करते हो सकते हैं? अमरीका की एक यूनिवर्सिटी, लुईसविले, में न्यूरोसर्जन एक ऐसे व्यक्ति की दिमागी हलचलों को रिकॉर्ड कर रहे थे जो कि मिर्गी के दौरों का शिकार था। उसके दिमाग की तरंगें दर्ज हो ही रही थीं कि वह अचानक दिल के दौरे से मर गया। अब मौत के कुछ पल पहले, और दिल की धडक़न बंद हो जाने के बाद के कुछ पलों तक उसके दिमाग में जो हलचल चल रही थी उसे कम्प्यूटर रिकॉर्ड करते चल रहा था। अब वैज्ञानिकों के पास ऐसी तकनीक है कि वे ऐसी रिकॉर्डिंग का यह विश्लेषण कर सकते हैं कि उस वक्त दिमाग में क्या चल रहा था। इस व्यक्ति के मौत के वक्त की रिकॉर्डिंग बतलाती है कि वह सपने देखते हुए या पुरानी यादों को ताजा करते हुए दर्ज होने वाली रिकॉर्डिंग सरीखी थीं। इसका एक मतलब यह भी हो सकता है कि मौत के वक्त उस इंसान के दिमाग में अपनी जिंदगी की यादों का सैलाब चल रहा था। अब यह बात एक वैज्ञानिक अध्ययन के एक मानवीय विश्लेषण से निकली हुई है, और यह अपने किस्म की एक अनोखी और अकेली रिकॉर्डिंग है इसलिए इससे बहुत अधिक निष्कर्ष निकालना भी जायज नहीं होगा। आज इस जगह पर इस मुद्दे को लेकर लिखने का मतलब ऐसे वैज्ञानिक विश्लेषण की गहराई में जाना नहीं है, बल्कि इसके एक मानवीय पहलू पर चर्चा करना है।

अगर यह बात और कई लोगों की रिकॉर्डिंग में साबित होती है कि मौत के पल इंसान की जिंदगी की यादों को दुहराने के पल रहते हैं, तो फिर लोगों को यह सोचना चाहिए कि वे अपने ऐसे पलों के लिए अपनी जिंदगी में किस किस्म की यादें रखना चाहते हैं? वैसे भी धर्म से जुड़े हुए लोग भी यह कहते हैं कि मौत के बाद ऊपर जाकर तमाम चीजों का हिसाब देना होता है। अगर ऐसा कोई ऊपर है, और वहां ऐसा कोई हिसाब होता है, तो उस हिसाब में भी लोगों को जिंदगी की तमाम अच्छी और बुरी यादों से गुजरना ही होगा। इसलिए आज बेहतर यही है कि वैज्ञानिक निगरानी में दर्ज होने वाले आखिरी पलों की बात हो, या ऊपर जाकर किसी काल्पनिक ईश्वर के सामने हिसाब देने की बात हो, लोगों को अपनी जिंदगी के अंत के लिए अपनी यादों को बेहतर रखना चाहिए। कुछ लोगों को यह भी लग सकता है कि केवल किस्से-कहानियों में चल रही ईश्वर की अदालत की परवाह करके भला क्यों पूरी की पूरी जिंदगी ईमानदारी की तकलीफ में गुजारें, या बेईमानी का मजा पाने से परे रहें। लेकिन कुछ लोग ऐसा जरूर सोच सकते हैं कि आखिरी वक्त अपनी छाती पर इतना बोझ न रहे कि यादें ही अपना गला घोंट दें।

जो बात हम लिख रहे हैं यह बहुत ही महीन बात है, और मोटी समझ वाले, नैतिकता से बेफिक्र अधिकतर लोगों के लिए यह बेवकूफी की एक गैरजरूरी बात होगी। लेकिन फिर भी हमें जो सूझ रहा है वह यह है कि लोगों को अपनी पूरी जिंदगी ऐसे काम भी करने चाहिए जो कि आखिरी वक्त पर अपनी छाती का बोझ हल्का कर पाएं। लोगों को यह भी सोचकर जिंदगी गुजारनी चाहिए कि कुछ अच्छी यादें भी इन आखिरी पलों के लिए साथ रहें, और जिनका भरोसा स्वर्ग और नर्क में है, उन्हें भी उन जगहों की सहूलियत का फर्क याद रखते हुए अपनी जिंदगी बेहतर रखनी चाहिए। फिर यह भी है कि आज की बात तो एक अकेले वैज्ञानिक प्रयोग के विश्लेषण को लेकर है जो कि किसी और मकसद से किया जा रहा था, और जिसमें कोई और बातें दर्ज हो गईं, आगे चलकर हो सकता है कि विज्ञान कई दूसरे किस्म के नतीजों पर पहुंचने लगे, और यह साबित होने लगे कि आज के किए हुए अच्छे या बुरे काम का कल क्या नतीजा हो सकता है, कल उसका कैसा फर्क पड़ सकता है। विज्ञान अंधाधुंध रफ्तार से आगे बढ़ रहा है, और जो बातें अब तक सिर्फ विज्ञान कथाओं में होते आई हैं, हो सकता है कि अगले कुछ हफ्तों में वे हकीकत भी बन जाएं। अभी-अभी 2022 के पहले पचास दिनों की वैज्ञानिक कामयाबियों को लेकर बनाई गई एक लिस्ट सामने आई है जिसमें कहा गया है कि महज इतने ही दिनों में विज्ञान ने यह देखा कि परमाणु टेक्नालॉजी में एक बड़ी खोज हुई है जिससे साफ-सुथरी ऊर्जा में मदद मिलेगी, पहली बार एक महिला एचआईवी के इलाज से ठीक हुई है, एमआईटी के इंजीनियरों ने एक नया ऐसा असंभव-पदार्थ बनाया है जो स्टील से अधिक मजबूत है लेकिन प्लास्टिक से भी हल्का है, एंटीबायोटिक के खिलाफ बदन में बनने वाले प्रतिरोध से निपटने में एक बड़ी कामयाबी हुई है, हवा से कार्बन कैद करने की एक बड़ी तकनीक 2022 में ही तैयार हुई है, अब डीएनए तकनीक में इतनी रफ्तार आ गई है कि वह इंसानी जीनोम कुल पांच घंटे दो मिनट में कर ले रही है, रीढ़ की हड्डी में अभी एक ऐसा इम्प्लांट लगाया गया है जिससे लकवाग्रस्त लोग फिर से चल रहे हैं, साइकिल चला रहे हैं, और तैर रहे हैं, एक इंसान को जानवर का हृदय प्रत्यारोपित किया गया है, 25 बरस की मेहनत से और 10 बिलियन डॉलर की लागत से बनाए गए एक अंतरिक्ष टेलीस्कोप ने अपनी पहली तस्वीरें दी हैं, स्वीडन के वैज्ञानिकों ने सौर ऊर्जा से कार्बनडाइऑक्साइड को ईंधन में बदलने की तकनीक विकसित की है। ये सारी कामयाबियां 2022 से पहले पचास दिनों की हैं, और यह मानने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि ऐसी तकनीक किसी भी दिन सामने आ सकती हैं जो ये साबित करें कि आज के अच्छे या बुरे काम का नफा या नुकसान कल किस तरह दर्ज हो सकता है। इसलिए एक वैज्ञानिक प्रयोग से निकली हुई एक दार्शनिक किस्म की बात की भावना को समझने की जरूरत है, और उसके मुताबिक अपनी भावनाओं को बदलने की, ताकि अपनी जिंदगी के आखिरी पल सुख देने वाले हों, न कि छाती पर बोझ बनने वाले। और अगले किसी वैज्ञानिक प्रयोग के नतीजे जिंदगी के आखिरी पलों के पहले की पूरी जिंदगी को भी किसी तरह रिकॉर्ड कर सकते हैं, इसलिए आज से ही अपने तौर-तरीकों को बेहतर बनाने की जरूरत है।

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