एक-एक अफसर से सोने-चांदी की ईटों के ऐसे भंडार का मतलब.?

-सुनील कुमार॥

पंजाब के चंडीगढ़ में एक आईएएस अफसर के बेटे ने अपनी लाइसेंसी बंदूक से खुद को गोली मार ली। उसे अस्पताल में भर्ती किया गया है, और परिवार का कहना है कि पंजाब विजिलेंस की जो टीम उनकी घर की तलाशी लेने आई थी, उसी ने बेटे को गोली मार दी हैं। यह आईएएस अफसर, संजय पोपली, कुछ दिन पहले भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, और उसकी काली कमाई की जांच के लिए विजिलेंस कई जगह छापेमारी कर रही है, और इसी सिलसिले में उसके घर पहुंची थी जहां परिवार में यह हादसा हुआ। विजिलेंस को इस अफसर के घर से बारह किलो सोना, तीन किलो चांदी की ईटें मिली हैं, और अनगिनत दूसरे महंगे सामान भी। इस अफसर की जांच पाईप लाईन टेंडर मंजूर करने के लिए एक फीसदी कमीशन मांगने के आरोप के बाद हुई थी, और वहां से इन सामानों के साथ-साथ हथियार और कारतूस भी मिले, जिन्हें लेकर एक अलग मामला दर्ज किया गया है। पंजाब की आम आदमी पार्टी की सरकार ने पहले दिन से भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मोर्चा खोलने की घोषणा की थी, और देश का शायद यह पहला मौका था कि मुख्यमंत्री ने काम सम्हालने के कुछ हफ्तों के भीतर ही अपने एक मंत्री को भ्रष्टाचार के जुर्म में गिरफ्तार करवा दिया। अब यह महज दिखावा मानना या कहना तो नाजायज होगा क्योंकि सरकार के मंत्री का ऐसा भ्रष्ट होना सरकार के लिए बदनामी भी लेकर आता है, लेकिन पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार ने हौसला दिखाया था।

अकाली-भाजपा गठबंधन और कांग्रेस पार्टी की सरकारों के रहते हुए पिछले दशकों में पंजाब भ्रष्टाचार में डूबा हुआ राज्य बन गया था, और वहां मंत्री भी नशे की तस्करी में शामिल बताए जाते थे। दोनों ही तरह की सरकारें जमीन से कट गई थीं, सामंती और कुनबापरस्त अंदाज में चल रही थीं, और शायद यही वजह थी कि वोटरों ने इस बार हैरतअंगेज नतीजे देते हुए इन तीनों ही पार्टियों को खारिज कर दिया था, और आम आदमी पार्टी को सत्ता दे दी थी। लोगों को यह भी याद रहना चाहिए कि दो चुनाव पहले दिल्ली में भी वोटरों ने कांग्रेस और भाजपा को एकमुश्त खारिज करते हुए आम आदमी पार्टी को सत्ता दी थी, और अरविंद केजरीवाल की अगुवाई में सरकार दुबारा लौटकर भी आई। दिल्ली में भी भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम केजरीवाल का एक बड़ा नारा रहा, और अगर लगातार दो चुनावों के नतीजे कोई संकेत हैं, तो वोटरों ने उनके इस नारे पर भरोसा किया दिखता है।

लेकिन पंजाब, दिल्ली, और आम आदमी पार्टी से परे देश में भ्रष्टाचार की बात करें, तो सरकारों का एक बड़ा बजट भ्रष्टाचार के हवाले हो जाता है। अलग-अलग सरकारों में भ्रष्टाचार के तौर-तरीके अलग हो सकते हैं, कहीं पर हर ठेकेदार से रिश्वत और कमीशन ली जाती है, कहीं पर अफसरों के ट्रांसफर-पोस्टिंग को एक बड़ी इंडस्ट्री की तरह चलाया जाता है, और कहीं-कहीं बड़े कारोबारियों को सरकारी कामकाज में उपकृत करके उनसे पर्दे के पीछे भागीदारी कर ली जाती है। हिन्दुस्तान में अलग-अलग पार्टियों और देश-प्रदेश की सरकारों के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन पूरा देश भ्रष्टाचार में बुरी तरह डूबा हुआ है, और आम जनता उसमें पिस रही है। आज जब यूक्रेन यूरोपीय समुदाय का मेंबर बनने की कोशिश कर रहा है, तो यूक्रेन का मौजूदा भ्रष्टाचार इस राह का रोड़ा बना हुआ है। यूरोपीय यूनियन जैसा विकसित लोकतंत्रों और सभ्य समाजों का गठबंधन भ्रष्टाचार को एक बड़ा मुद्दा मानता है, और किसी को सदस्य बनाने के पहले उस देश की सरकार को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जवाब देना पड़ता है, कानून बनाने पड़ते हैं, और उन पर अमल भी करना पड़ता है। आज हिन्दुस्तान ऐसे किसी समुदाय की सदस्यता की जरूरत से बहुत दूर है, लेकिन अगर ऐसी कोई नौबत रहती, तो हिन्दुस्तान कभी यूरोपीय यूनियन जैसी संस्था का सदस्य नहीं बन सकता था।

आज की ही एक दूसरी खबर बताती है कि जिस बिहार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का सुशासन बताया जाता है, उसकी राजधानी पटना में सरकारी निगरानी विभाग ने एक ड्रग इंस्पेक्टर के घर पर छापा मारा तो वहां से पांच बोरों में भरे हुए चार करोड़ के नोट मिले, दर्जनों जमीनों के कागज मिले, कई कारें मिलीं, और गहने, बैंक खाते मिले। अब ड्रग इंस्पेक्टर तो राज्य सेवा का एक छोटा अफसर होता है, और बिहार को नीतीश कुमार का सुशासन कहा जाता है, वहां यह हाल है। आज अगर एक प्रदेश के एक अफसर के घर के स्टोर रूम से सोने-चांदी का ऐसा जखीरा निकल रहा है, दूसरे छोटे अफसर के घर बोरों में करोड़ों के नोट निकल रहे हैं, और दूर-दूर तक उसकी दौलत बिखरी होने की जांच जारी ही है, तो फिर पूरे देश को कुल मिलाकर किस तरह बेचा जा रहा है, यह साफ है। हमारा तो यह मानना है कि भ्रष्ट अफसरों से जितनी जब्ती हो पाती है, वह उनकी काली कमाई का एक बहुत ही छोटा हिस्सा रहता है, बाकी तो चारों तरफ बेनामी जायदाद और दूसरे देशों के बैंकों में चले जाता है। ऐसे में देश-प्रदेश की सरकारें अगर कोई ईमानदार नीयत रखती हैं, तो उन्हें किसी के इतने अधिक भ्रष्ट हो जाने के बहुत पहले ही उसे दबोच लेने का इंतजाम रखना चाहिए। जब भ्रष्ट अफसर अरबपति हो जाएं, उसके बाद उन पर हाथ डाला जाए, तो उसका मतलब है कि वे सरकारी पैसों और कामकाज की दसियों गुना अधिक बर्बादी कर चुके हैं, जनता के हितों और सरकारी कामकाज की क्वालिटी को बेच चुके हैं। यह हालत ऑल इंडिया सर्विस कही जाने वाली नौकरियों की है, जिनके लिए देश भर से सबसे चुनिंदा लोगों को छांटा जाता है, और फिर वे आनन-फानन देश के सबसे भ्रष्ट लोग भी बनने का खतरा रखते हैं। यह सिलसिला अखिल भारतीय सेवाओं की साख को खत्म कर चुका है, और केन्द्र सरकार और अलग-अलग प्रदेशों में हर किस्म के भ्रष्टाचार के नमूने मौजूद हैं।

अच्छी साख वाली एक अंतरराष्ट्रीय संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने डेढ़ दशक पहले एक सर्वे किया था तो उसमें पाया था कि पचास फीसदी हिन्दुस्तानी रिश्वत देकर, या कोई पहचान जुटाकर सरकारी काम करवा पाते हैं। 2021 में भ्रष्टाचार पर जनधारणा का एक सर्वे हुआ, उसमें दुनिया के 180 देशों में हिन्दुस्तान को 85वें जगह पर रखा गया था, यानी यह देश दुनिया के 84 और देशों के मुकाबले अधिक भ्रष्ट मिला था। केन्द्र और राज्य सरकारों के कई विभाग भ्रष्टाचार की सबसे अधिक गुंजाइश रखने वाले माने जाते हैं, और मंत्रियों में इन विभागों को पाने के लिए गलाकाट मुकाबला तो चलता ही है, अफसर भी इन विभागों या ऐसी जगहों पर तैनाती के लिए लूटपाट करने को तैयार रहते हैं।

पंजाब की आम आदमी पार्टी की सरकार सचमुच ही भ्रष्टाचार के खिलाफ लगी हुई है, या यह उसका दिखावा है, जो भी हो, देश-प्रदेश की तमाम सरकारों को अपने राज के भ्रष्टाचार पर काबू पाना चाहिए, और जनता के बीच के लोगों को भी चाहिए कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ अलग-अलग तरह की लड़ाई लड़ें। यह इसलिए भी जरूरी है कि भ्रष्टाचार सबसे गरीब जनता के बुनियादी हक भी खा जाता है, लोगों को अपने परिवार की लाश के पोस्टमार्टम के लिए भी रिश्वत देनी होती है, और मानवाधिकारों का इससे बुरा कुचलना और क्या हो सकता है? लोग अपने-अपने आसपास के भ्रष्टाचार को देखें, और अपनी जिम्मेदारी सोचें।

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