अमेरिका का स्याह पक्ष

अमेरिका दुनिया में केवल एक महाशक्ति का नाम ही नहीं है, बल्कि दुनिया के करोड़ों लोगों के लिए स्वप्नजगत की तरह है, जहां हर चीज खूबसूरत, नायाब और अनूठी है। भारत समेत दुनिया के लाखों-करोड़ों नौजवान अमेरिकी रहन-सहन को अपनाने की कोशिश करते हैं, अमेरिकी समाज की तरह बेफिक्र, बेलौस जीवन जीने की आकांक्षा उनकी होती है। हालांकि ऐसी चाह रखने वालों के लिए दूर के ढोल सुहावने वाला मुहावरा नसीहत के तौर पर दिया जा सकता है। क्योंकि अमेरिका में हर चीज अच्छी और सुंदर नहीं है। वहां भी अन्य समाजों की तरह बहुत सी कमियां और खामियां हैं। अमेरिका का समाज दूर से खुला और उदारवादी दिखता है, लेकिन कट्टरता, रूढ़िवादिता और संकीर्णता की जड़ें वहां भी गहरी हैं। इस बात की पुष्टि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों से होती है।

अमेरिका में हथियारों की संस्कृति सभ्य समाज के लिए एक गहरी चिंता का विषय है। गोलीबारी की कई घटनाओं से अमेरिकी समाज लहूलुहान हो चुका है। अभी पिछले दिनों ही एक युवक ने एक स्कूल में अंधाधुंध गोलियां चलाई थीं। जिसके बाद फिर से सवाल उठने लगा कि नागरिकों को हथियार रखने की अनुमति देना कितना सही है। राष्ट्रपति जो बाइडेन ने भी इस चलन पर गहरी चिंता जतलाते हुए अमेरिकी जनता से वादा किया था कि वे इसके खिलाफ कानून लाएंगे और अब उसकी तैयारी भी शुरु हो चुकी है। लेकिन पिछले हफ्ते ही अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने न्यूयार्क के कानून के खिलाफ फैसला देते हुए कहा कि सार्वजनिक तौर पर बंदूक लेकर चलना लोगों का मूलभूत अधिकार है। जबकि न्यूयॉर्क के कानून के मुताबिक निवासियों को अपने साथ बंदूक ले जाने के लिए एक उचित कारण का होना जरूरी था। अदालत ने इस कानून को संविधान के खिलाफ बताया। बंदूक रखने के अधिकार से जुड़ा यह फैसला 6-3 के बहुमत से आया। यानी 9 में से केवल 3 जज इसके खिलाफ थे। इस फैसले से राष्ट्रपति बाइडेन समेत उदारवादी सोच रखने वाले बहुत से लोग निराश थे। इस बीच एक और अहम फैसला सुप्रीम कोर्ट ने दिया है और वो महिलाओं के अधिकारों से जुड़ा है।

अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने गर्भपात को क़ानूनी तौर पर मंज़ूरी देने वाले पांच दशक पुराने $फैसले को पलट दिया है। कंज़रवेटिव-बहुल्य कोर्ट ने गर्भपात के संवैधानिक अधिकार को प्रभावी ढंग से समाप्त कर दिया। आठ में से पांच जज इस फैसले के पक्ष में थे। अब महिलाओं के लिए गर्भपात का हक़ क़ानूनी रहेगा या नहीं इसे लेकर राज्य अपने-अपने अलग नियम बना सकते हैं। गौरतलब है कि 50 साल पहले इसी सुप्रीम कोर्ट ने गर्भपात कराने को क़ानूनी करार दिया था। तब कहा गया था कि संविधान गर्भवती महिला को गर्भपात से जुड़ा फ़ैसला लेने का हक़ देता है। लेकिन समय का पहिया उल्टा घुमाते हुए अमेरिका के रूढ़िवादी मानसिकता के पोषक जजों ने देश को 50 साल पहले की स्थिति में लाते हुए महिलाओं के अपने ही जीवन और शरीर पर हक को खत्म करने का कदम उठा लिया। पूरी दुनिया में गर्भपात का मुद्दा बहुत से धार्मिक समूहों के लिए काफी अहम है, वे इसे जीव हत्या की तरह देखते हैं। बच्चों को ईश्वर की देन मानते हैं और इसलिए अजन्मे बच्चों के हक की पैरवी करते हैं।

लेकिन इस तरह की सोच से महिलाओं के अधिकारों का हनन होता है, क्योंकि बच्चा पैदा करने के लिए उन्हें बाध्य किया जाता है, उनकी मर्जी के कोई मायने नहीं रहते। अमेरिका में भी इस तरह की सोच के हिमायती लोग आज भी बहुतायत में हैं और वो मानते हैं कि भ्रूण को जीवन का हक है। गर्भपात का मुद्दा राजनीति को भी प्रभावित करने लगा है। इस मामले पर डेमोक्रेटिक पार्टी और रिपब्लिकन पार्टी की सोच अलहदा थी। रिपब्लिकन गर्भपात को ठीक नहीं मानते हैं और कोई आश्चर्य नहीं कि डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में नियुक्त किए जजों ने इस तरह के फैसलों को बढ़ावा दिया है।

इस फै़सले से अमेरिका की 3 करोड़ से अधिक महिलाओं के सामने मुश्किल खड़ी हो गई है। गर्भपात कराने वाले बहुत से क्लिनिक रातों-रात बंद हो गए हैं और इस बात का अंदेशा बढ़ गया है कि अब इसके लिए गैरकानूनी तरीकों का इस्तेमाल शुरु हो जाएगा। संपन्न वर्ग की महिलाओं के पास दूसरे राज्यों में जाने की सुविधा रहेगी, लेकिन गरीब महिलाओं के लिए यह फैसला बहुत बड़े झटके की तरह है, क्योंकि अब उन्हें अनचाही औलाद के साथ जीवन जीना पड़ेगा। इस सबका दूरगामी असर समाज पर पड़ेगा। इसलिए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले को ‘भारी भूलÓ करार दिया है। गर्भपात को गैरकानून ठहराने के खिलाफ अमेरिका के अलग-अलग शहरों में प्रदर्शन हो रहे हैं और राजनैतिक, सामाजिक क्षेत्रों के लोगों के अलावा आम जनता भी खुलकर इस फैसले की आलोचना कर रही है।

दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश पर इन रूढ़िवादी फैसलों का क्या असर होता है, ये तो वक्त बताएगा। फिलहाल दुनिया के बाकी लोकतांत्रिक और उदारवादी कहलाने वाले देशों के लोगों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि न्याय की आसंदी पर पूर्वाग्रह और संकुचित मानसिकता से ग्रसित व्यक्तियों के बैठने से कितने गलत उदाहरण पेश होते हैं और लोकतंत्र के लिए ऐसे फैसले कितने घातक साबित हो सकते हैं।

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