लोकतंत्र में नैतिकता का पाठ..

बीते दिनों से ब्रिटेन की राजनीति में उथल-पुथल मची हुई है। पिछले मंगलवार को वित्त मंत्री ऋषि सुनक और स्वास्थ्य मंत्री साजिद जाविद ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद बाल विकास मंत्री विल क्विंस, शिक्षा मंत्री रॉबिन वॉकर, गृह कार्यालय मंत्री विक्की एटकिंस और ट्रेजरी मंत्री जॉन ग्लेन के इस्तीफे भी हो चुके हैं। बोरिस जॉनसन से नाराज होने वाले मंत्रियों की संख्या बढ़ती जा रही है। मंत्रियों की नाराजगी और इस्तीफे की वजह सांसद क्रिस पिंचर का मामला है। जिन्हें बोरिस जॉनसन ने पार्टी के डेप्युटी चीफ व्हिप ऑफिसर के तौर पर नियुक्त किया था, जबकि पिंचर के ऊपर 2019 में यौन दुर्व्यवहार के आरोप लग चुके हैं। क्रिस पिंचर को यौन दुर्व्यवहार के मामले में पिछले हफ्ते कंजरवेटिव पार्टी के सांसद पद से भी निलंबित कर दिया गया था। इस्तीफा देने वाले मंत्रियों का आरोप है कि बोरिस जॉनसन ने क्रिस पिंचर पर लगे आरोपों को जानते हुए उन्हें पार्टी में बड़े पद पर जानबूझकर नियुक्त किया। प्रधानमंत्री जॉनसन ने भी अपनी गलती मानते हुए पिंचर की नियुक्ति को लेकर सार्वजनिक तौर पर माफी मांग ली थी। उन्होंने मंगलवार को स्वीकार किया था कि संसद के एक दागदार सदस्य को सरकार के अहम पद पर नियुक्त करना गलत था।

लेकिन ये माफी मंत्रिमंडल में बगावत को रोकने में नाकाम रही। हालांकि ये बगावत सरकार गिराने वाली मंशा से नहीं हुई है। बल्कि मंत्रियों ने लोकतंत्र में नैतिकता को सत्ता से ऊपर रखते हुए खुद ही सरकार से किनारा कर लिया है। अपने इस्तीफे की घोषणा करते हुए भारतीय मूल के पहले वित्त मंत्री रहे ऋ षि सुनक ने बोरिस जॉनसन को लखिा कि ‘हमारा देश बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है। हम दोनों एक कम-कर, उच्च-विकास वाली अर्थव्यवस्था और विश्व-स्तरीय सार्वजनिक सेवाएं चाहते हैं, लेकिन इसे केवल तभी जिम्मेदारी पूर्वक किया जा सकता है जब हम कड़ी मेहनत, त्याग और कठिन निर्णय लेने के लिए तैयार हों।’ ऋ षि सुनक ने अपना इस्तीफ़ा देते हुए कहा कि ब्रिटेन के नागरिक ये उम्मीद करते हैं कि सरकार एक ‘सही, योग्य और गंभीर’ तरीक़े से काम करे। वहीं स्वास्थ्य मंत्री के पद से हटने का ऐलान करते हुए साजिद जाविद ने दावा किया कि सरकार ‘देश के हित में’ काम नहीं कर रही है।

आधा दर्जन मंत्रियों के इस्तीफे के बाद जॉनसन से भी इस्तीफ़े की मांग होने लगी। पहले तो बोरिस जॉनसन ने इससे इंकार किया, फिर कंजरवेटिव पार्टी के नेता पद से इस्तीफा दिया और अब प्रधानमंत्री पद से इस्तीफे की खबर भी आ गई है। अगला प्रधानमंत्री चुने जाने तक जॉनसन कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहेंगे। वैसे उनकी सरकार को अविश्वास प्रस्ताव का सामना किए एक महीना भी नहीं हुआ है। उस वक्त वे बच गए थे, हालांकि उनकी ही अपनी पार्टी के 41 प्रतिशत सांसदों ने उनके खिलाफ मतदान किया था। पिछले दिनों हुए उप चुनाव में बोरिस जॉनसन की कंजरवेटिव पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा था। इससे पहले वे पार्टीगेट में भी फंस चुके हैं, जिसमें उन पर कोरोना लॉकडाउन के दौरान नियमों का उल्लंघन करते हुए पार्टी करने का आरोप था।

बहरहाल, एक के बाद एक मुश्किलों में घिर रहे बोरिस जॉनसन क्या फिर से सत्ता में वापसी कर पाते हैं और इसके बाद 2024 में होने वाले चुनाव में ब्रिटिश जनता कंजरवेटिव या लेबर दोनों में से किस को चुनती है, ये देखना दिलचस्प होगा। वैसे इस घटनाक्रम पर विपक्षी लेबर पार्टी नजरें लगाई हुई है। लेबर पार्टी के नेता प्रतिपक्ष कीर स्टर्मर ने कहा कि वह चुनाव का स्वागत करेंगे क्योंकि देश में सरकार बदलने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि साफ हो रहा है कि कंजरवेटिव सरकार गिर रही है। अगला चुनाव 2024 में है लेकिन बोरिस जॉनसन चाहें तो यह पहले भी हो सकता है।

ब्रिटेन की इस राजनैतिक उथल-पुथल से लोकतंत्र के कई सबक फिर से याद करने का मौका मिल रहा है। पहला, लोकतंत्र में नैतिकता को जिंदा रखना सबसे अधिक जरूरी है, तभी जनता के प्रति जवाबदेही को निभाया जा सकता है। दूसरा लोकतंत्र में गलती की माफी हो सकती है, लेकिन जानबूझकर गलत का साथ देने की नहीं। तीसरा लोकतांत्रिक सरकार अगर किसी कारण से अस्थिरता के दौर से गुजर रही है, तब भी विपक्ष अवसरवादिता दखिाने से बाज़ आए। बल्कि विपक्ष की जिम्मेदारी ये है कि जनता को ही फैसला करने दे कि वह उसी सरकार को फिर से स्थिर देखना चाहती है या बदलाव चाहती है। चौथा लोकतांत्रिक सत्ता संभालने पर मन की बात और मनमाने आचरण को मन में ही रहने देना चाहिए, उसे सब पर थोपने की कोशिश की जाए तो देश पर संकट आता है। और सबसे महत्वपूर्ण है पांचवां सबक, कि लोकतंत्र में सत्ता का लोभ नहीं बल्कि त्याग और मर्यादा निभाने वाले आचरण की जरूरत है।

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