जनता आ गई और सिंहासन खाली हो गया..

रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा है-
सदियों की ठंडी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

इस कविता में वे आगे कहते हैं-
हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,
सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,
जनता की रोके राह,समय में ताव कहां?
वह जिधर चाहती,काल उधर ही मुड़ता है।

काल का मुड़ना और महलों की नींव उखड़ना, इन दो काल्पनिक स्थितियों के उदाहरण शनिवार को श्रीलंका में दुनिया ने सच होते देखे। वहां सचमुच यही लगा कि जनता सिंहासन खाली कराने आ पहुंची तो राष्ट्रपति को घर छोड़कर भागना पड़ा। पिछले कई महीनों से बदहाली में जीवन बिता रही श्रीलंका की जनता प्रतीक्षा कर रही थी कि उसके अच्छे दिन आएंगे। लेकिन धीरे-धीरे यह संयम चुकता गया। देश में बार-बार विरोध-प्रदर्शन की नौबत आने लगी। जनता सड़कों पर उतर कर अपने गुस्से का इजहार करती और सरकार उस गुस्से पर काबू पाने के इंतजाम करती। पहले प्रधानमंत्री महेन्द्र राजपक्षे कुर्सी से हटे, लेकिन उनके भाई और राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे अपने पद पर बने रहे। प्रधानमंत्री की कुर्सी पर विक्रम रानिलसिंघे बैठे, लेकिन हालात उनसे भी नहीं संभले। और शनिवार को जो हुआ, उसके बारे में सत्ताधारियों ने सोचा भी नहीं होगा कि कभी उन्हें इस तरह बेआबरू होकर कूचे से निकलना पड़ सकता है।

गौरतलब है कि श्रीलंका में पिछले कई महीनों से भारी आर्थिक संकट चल रहा है। देश में जरूरी सामान का आयात नहीं हो पा रहा है, क्योंकि विदेशी मुद्रा लगभग खत्म हो चुकी है। पेट्रोल जनता के लिए उपलब्ध नहीं है, गैस, खाने-पीने की चीजों और दवाओं जैसे जरूरी सामान की भारी किल्लत है। लोग पिछले कई महीनों से प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे पद छोड़ने के लिए तैयार नहीं हो रहे थे। आखिर लोगों के सब्र का बांध टूटा और शनिवार को राष्ट्रपति भवन पर ही उग्र प्रदर्शनकारियों ने धावा बोल दिया। राष्ट्रपति भवन के भीतर से हैरान करने वाली तस्वीरें सामने आईं। कहीं लोग राष्ट्रपति भवन की रसोई खंगालने लगे, कहीं शयनकक्षों में घुसकर इधर-उधर सामान उठाने लगे, बहुत से लोग भवन के स्वीमिंग पूल में कूद पड़े, कुछ लोगों ने कसरत करने की हसरत भी पूरी कर ली। नजारा ऐसा था, मानो बरसों से बांध कर रखे गए कैदियों को एकदम से बेड़ियों से मुक्त कर दिया गया हो और वे इस अचानक मिली आजादी में समझ ही नहीं पा रहे कि किस तरह अपनी भावनाओं का इजहार करें।

श्रीलंका की जनता पिछले कई बरसों से तरह-तरह की बेड़ियों में ही तो जकड़ी हुई थी। शासक धर्म के नाम पर कट्टर विचारों को बढ़ावा दे रहे थे, जिसकी परिणति चर्च पर हमले या अल्पसंख्यकों के लिए नफरत के रूप में सामने आई। हलाल मीट और बुरका को प्रतिबंध कर एक धर्म पर दूसरे धर्म की सत्ता स्थापित करने की कोशिशें हुईं। निजीकरण को बढ़ावा दिया गया। तमिलों और सिंहलियों के बीच सद्भाव कायम करने की जगह तमिलों का दमन किया गया। अपने प्रचार के लिए मीडिया को हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया और इस सबका असर ये हुआ कि देश में आर्थिक गिरावट आती गई, विदेशी कर्ज इतना चढ़ गया कि सरकार के लिए उसे चुकाना असंभव हो गया, और इसका खामियाजा जनता को भुगतना पड़ा।

श्रीलंका में जिस तरह सत्ताधारियों को मनमाने आचरण पर जनता के गुस्से का शिकार होना पड़ा है, वह दुनिया के कई और देशों में तानाशाही प्रवृत्ति रखने वाले शासक पहले भुगत चुके हैं। कुछ ने खुद को मार लिया, कुछ को जनता ने मार दिया। कहीं अमेरिका जैसे गिद्धदृष्टि रखने वाले देश ने अपने पैर जमा लिए और अपने पि_ू शासकों को बिठा दिया। और इसमें भी नुकसान जनता का ही हुआ। श्रीलंका के शासक भी दुनिया के राजनैतिक इतिहास और वर्तमान से परिचित होंगे ही लेकिन सच से मुंह फेरने की गलती उन्हें भारी पड़ गई। वैसे इन पंक्तियों के लिखे जाने तक सरकार से कुछ मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया है, प्रधानमंत्री ने भी पद छोड़ दिया है। खुद राष्ट्रपति कहां है, ये अब तक पता नहीं चल पाया है। इस बीच आर्मी चीफ शवेंद्र सिल्वा ने नागरिकों से अपील की कि वो देश में शांति बनाए रखने के लिए सेना और पुलिस का सहयोग करें। आईएमएफ जैसी संस्थाएं श्रीलंका के हालात पर नजर बनाए हुई हैं।

श्रीलंका का भविष्य क्या होगा, क्या सेना के हाथ में देश की कमान चली जाएगी या गोटबाया राजपक्षे किसी और योजना के साथ वापस लौटते हैं, फिलहाल कुछ कहा नहीं जा सकता। अगर राजनैतिक अस्थिरता के कारण सेना ने देश संभाला तो फिर चीन क्या प्रभावशाली भूमिका में आएगा, ये भी देखना होगा। इस बीच पाकिस्तान में भी इमरान सरकार के जाने के बाद नई सरकार के लिए चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। आर्थिक बदहाली और महंगाई वहां भी लोगों का जीवन मुश्किल कर रही है। भारत में तो अब तक अच्छे दिन की गूंज सुनाई दे ही रही है, वैसे विदेशी कर्ज हम पर भी काफी बढ़ चुका है और सरकार के पास ऐसा कोई उपाय नजर नहीं आ रहा, जिससे दीर्घकालिक राहत मिल सके। लेकिन फिलहाल हमारे देश में धर्म की रक्षा पर जिम्मेदार लोगों का ध्यान लगा हुआ है। धर्म बच जाएगा तो हम सब भी बच ही जाएंगे, फिलहाल यही सोच काम कर रही हैं।

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