गुरू पूर्णिमा पर समझने की जरूरत कि कैसी बातें और कैसे कामों से बचें…

-सुनील कुमार॥
हिन्दुस्तान मेें आज गुरू पूर्णिमा मनाई जा रही है। लोग गुरू का मतलब आमतौर पर स्कूल-कॉलेज के शिक्षकों से लगा लेते हैं, और उन्हें याद करके उनका आभार व्यक्त करते हैं। कुछ और लोग अपने धार्मिक या आध्यात्मिक गुरू को भी याद कर लेते हैं। हमारी तरह के कुछ तीखी जुबान वाले लोग सोशल मीडिया पर यह भी लिखते हैं कि गुरू पूर्णिमा पर उन तमाम लोगों का धन्यवाद जिन्हें देखकर यह सीखा कि क्या-क्या नहीं करना चाहिए। और शायद यही आखिरी बात जिंदगी में अनजाने गुरू दिला जाती है, और लोगों के लिए जितनी अहमियत कुछ करना सीखने की रहती है, उतनी ही अहमियत कुछ न करना सीखने की भी रहती है। इस पर आज लिखने की कोई जरूरत नहीं थी अगर अमरीका से कल डोनल्ड ट्रंप और एलन मस्क के बीच तीखी जुबानी जंग सामने न आई होती। सोशल मीडिया पर छिड़ी इस बहस को देखकर गुरू पूर्णिमा पर यह समझ पड़ता है कि ऊंचे ओहदों पर पहुंचे हुए, और बड़े कामयाब लोगों को क्या-क्या नहीं करना चाहिए।

डोनल्ड ट्रंप का सोशल मीडिया पर डाला गया एक पोस्ट कहता है- जब एलन मस्क व्हाइट हाउस में मुझसे मिलने आया था, और अपने बहुत से कारोबारों के लिए मेरी मदद मांग रहा था, जिनमें ऐसी बैटरी-कारें थीं जो पर्याप्त दूरी नहीं चल पाती थीं, बिना ड्राइवर चलने वाली ऐसी कारें थीं, जो टकरा जाती थीं, या ऐसे रॉकेट थे जो कहीं नहीं जाते थे, जिनमें मेरी मदद के बिना एलन मस्क दो कौड़ी का होता, और जो मुझे बता रहा था कि वह मेरा कितना बड़ा प्रशंसक है, और मेरी रिपब्लिकन पार्टी का समर्थक है, और उस दिन मैंने अगर उसे कहा होता कि नीचे घुटनों पर खड़े होकर मुझसे भीख मांगो, तो उसने वह भी किया होता…।

इसके साथ ट्रंप ने राष्ट्रपति भवन में अपनी बैठी हुई, और एलन मस्क की खड़ी हुई तस्वीर पोस्ट की है। किसी को कितना नीचा दिखाया जा सकता है इसकी एक मिसाल ट्रंप ने पेश की, और दुनिया के सबसे ताकतवर देश की सबसे ताकतवर कुर्सी भी एक घटिया इंसान को किस तरह बेहतर इंसान नहीं बना सकती यह साबित किया है। लोगों को याद होगा कि ट्रंप अपने कार्यकाल के पहले से भी चुनाव प्रचार के दौरान ही अपनी घटिया सोच को ढेर सारी गंदी जुबान में उगलते आए हैं, और एक वक्त ऐसा भी आया जब उन्हें राष्ट्रपति बनाने वाले वोटरों को भी अपनी चूक का अहसास हुआ। अभी अमरीका के इन दो सबसे बड़े लोगों के बीच ओछी जुबान में सार्वजनिक बहस चल रही है, और यह कहने की जरूरत नहीं होना चाहिए कि इसमें ट्रंप का मुकाबला करना कई एलन मस्क के लिए मिलकर भी मुमकिन नहीं है। अमरीकी राष्ट्रपति से मिलने आए किसी व्यक्ति ने उनसे क्या बात की, उसका जिक्र करके, या न की गई बातों का झूठा हवाला देकर एक भूतपूर्व अमरीकी राष्ट्रपति इस तरह घटिया जुबान में बात करे, यह गुरू पूर्णिमा के मौके पर एक अच्छी नसीहत हो सकती है कि ऊंचे ओहदों पर पहुंचे हुए लोगों को इतना नीचे गिरने के पहले चार बार सोचना चाहिए। और यह बात अच्छी है कि एलन मस्क इस जुबानी गंदगी के मुकाबले में अपने आप पर काबू किए हुए हैं, और उन्होंने महज इतना कहा है कि यह समय ट्रंप के घर बैठने का है। उनका सूर्यास्त आ गया है, और उन्हें दुबारा चुनने का मतलब चीनी मिट्टी के बर्तनों की दुकान में बिफरे सांड को पालने सरीखा होगा। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति चुनाव लडऩे की अधिकतम उम्र 69 बरस होनी चाहिए। मस्क के कहने का मतलब यह कि 76 बरस के ट्रंप राष्ट्रपति का अगला चुनाव लडऩे की अपनी बेहिसाब हसरत पूरी न कर पाएं। यह पूरी बहस इस बात से शुरू हुई थी कि ट्रंप ने एक भरी सभा में यह दावा किया था कि एलन मस्क ने उन्हें वोट दिया था, और एलन मस्क ने इसका खंडन करते हुए कहा था कि यह सही नहीं है।

अब सवाल यह उठता है कि गंदगी की बहस, या बहस की गंदगी से बचना सीखने के लिए क्या हिन्दुस्तानियों को ट्रंप और मस्क की बहस, या ट्रंप की बकवास को सुनना जरूरी है? अमरीका से बढ़-चढक़र गंदी बहस हिन्दुस्तान में चल रही है, सडक़ों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक चल रही है। एक कानूनी बहस के दौरान केन्द्र सरकार का वकील सुप्रीम कोर्ट में कहता है कि बजरंग मुनि जैसे सम्माननीय प्रमुख धार्मिक नेता को जब कोई नफरत फैलाने वाला कहे, तो उससे समस्याएं खड़ी होती हैं। अब जिसे केन्द्र सरकार का वकील सम्माननीय धार्मिक नेता कहता है, उसके वीडियो हफ्तों से चारों तरफ तैर रहे हैं जिनमें वह लाउडस्पीकर पर मुस्लिम महिलाओं से बलात्कार करने का आव्हान कर रहा है। उसका एक नया वीडियो अभी और सामने आया है जिसमें वह कैमरे की आंखों में आंखें डालकर मुम्बई की किसी अभिनेत्री को धमकी दे रहा है कि वह आए तो बजरंग मुनि के ब्रम्हचारी उसे बलात्कार कर-करके गर्भवती करेंगे। अब इससे लोगों को गुरू पूर्णिमा पर तीन बातें सीखने मिलती हैं, पहली यह कि बजरंग मुनि नाम के इस नफरतजीवी जैसी घटिया सोच किसी इंसान को नहीं रखनी चाहिए, दूसरी बात यह कि किसी लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश के सरकारी वकील को ऐसे नफरतजीवी और हिंसक, और भारतीय कानून के मुताबिक मुजरिम इंसान को सम्माननीय धार्मिक नेता नहीं कहना चाहिए, और तीसरी बात यह कि किसी भी जरा सी जिम्मेदार सरकार को ऐसे हिंसक फतवे देने वाले को देशद्रोह के जुर्म में जेल में डालना चाहिए। अब गुरू पूर्णिमा के दिन देश के ऐसे ‘‘सम्माननीय धार्मिक नेता’’ से कुछ तो सीखना ही चाहिए।

गुरू पूर्णिमा किसी साक्षात और भौतिक गुरू से ही कुछ सीखने का मौका नहीं रहता, जिंदगी में हर दिन तरह-तरह के लोगों से पहले तो यही सीखना चाहिए कि क्या-क्या नहीं करना चाहिए, इंसान को कैसा नहीं होना चाहिए। इंसान को कैसा होना चाहिए यह नसीहत तो स्कूल के वक्त से सीखने मिलती है, कैसा-कैसा नहीं होना चाहिए यह सीखने के लिए आगे की जिंदगी में थोड़ी सी हिम्मत भी लगती है, और बहुत सी समझ भी लगती है। इसलिए आज इस मौके पर चर्चा करते हुए अच्छे गुरूओं के मुकाबले घटिया मिसालों को याद करने की अधिक जरूरत है कि भले इंसानों को कैसा-कैसे नहीं होना चाहिए। हम सबकी जिंदगी में ऐसे बहुत से लोग रहते हैं जिनके कामों को देखकर, जिनकी बातों को देखकर यह साफ समझ पड़ता है कि वे कमीनगी की बातें हैं। उनका कोई वैज्ञानिक परीक्षण करने की भी जरूरत नहीं रहती। लेकिन इतनी समझ और इतना हौसला होना चाहिए कि खुद भी ऐसा कुछ करने से बचें, और अपने आसपास के लोगों को भी ऐसी मिसालें समझाते चलें कि जिंदगी में कभी ऐसा नहीं करना चाहिए।

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