यूपी को कड़ी फटकार वाली सुप्रीम कोर्ट की नसीहत पर देश भर में अमल की जरूरत..

-सुनील कुमार॥

मीडिया में फर्जीवाड़े की जांच करने वाली और उसका भांडाफोड़ करने वाली एक विश्वसनीय वेबसाइट ऑल्ट न्यूज के एक संस्थापक पत्रकार मोहम्मद जुबैर को जमानत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में जो कहा वह देश के सभी राज्यों की सरकारों और केन्द्र सरकार के गौर करने की बात है। यह आदेश वैसे तो इस एक मामले में आया है, लेकिन अदालत ने कुछ व्यापक विचार सामने रखे हैं जो दूसरे मामलों पर भी लागू होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा है कि किसी को गिरफ्तार करने के अधिकार का इस्तेमाल पुलिस को संयम से करना चाहिए। उसने उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा जुबैर के एक ट्वीट को लेकर जगह-जगह दर्ज की गई एफआईआर पर अलग-अलग गिरफ्तारियां करने, और अलग-अलग मामले चलाने के खिलाफ राय दी, यूपी सरकार द्वारा जाहिर तौर पर फर्जी दिख रही इन शिकायतों में जुबैर को उलझाए रखने के लिए अलग-अलग जिलों में रिपोर्ट लिखवाने का जो सिलसिला चला रखा था, अदालत ने उसके खिलाफ भी कहा, और यूपी सरकार द्वारा इन मामलों पर बनाए गए विशेष जांच दल को भी भंग कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इन तमाम मामलों को एक साथ दिल्ली पुलिस को भेज दिया, जो है तो भाजपा की अगुवाई वाली केन्द्र सरकार के मातहत, लेकिन वह यूपी के बाहर है, और अब तो इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सीधे दखल के बाद दिल्ली पुलिस शायद उस तरह की साजिश का रूख नहीं रख पाएगी जैसा उत्तरप्रदेश पुलिस का दिख रहा था। उत्तरप्रदेश सरकार के वकील ने इस पूरे मामले में मुंह की खाई, और वकील तो सरकार का प्रतिनिधि रहता है, सरकार ने अदालत में मुंह की खाई है। यूपी की इस अपील को सरकार ने खारिज कर दिया कि जुबैर के आगे ट्वीट करने पर रोक लगाई जाए। सुप्रीम कोर्ट जज ने वकील से कहा यह तो ठीक वैसी ही बात की जा रही है कि एक वकील को बहस न करने को कहा जाए। एक पत्रकार को यह कैसे कहा जा सकता है कि वह लिखना बंद कर दे। अदालत ने यहां तक आदेश दिया कि अगर इसी मुद्दे पर जुबैर के खिलाफ कोई और एफआईआर भी दर्ज होती है, तो उन सभी मामलों में अभी से यह जमानत लागू रहेगी। यह अपने आपमें बड़ा कड़ा फैसला है जो कि बदनीयत की साजिश को देखते हुए दिया गया लगता है। यह एक और बात है कि अदालत के इस रूख के बाद अब यूपी सरीखा कोई दूसरा राज्य भी जुबैर के खिलाफ इस ट्वीट के मामले में नई एफआईआर लिखने से कतराएगा। अदालत ने यह साफ किया है कि गिरफ्तारी अपने आपमें एक कठोर कदम है जिसका कम ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने सभी अदालतों से कहा है कि वे ऐसे अफसरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करें जो गिरफ्तारी की शर्तों को पूरा किए बिना कानून की धाराओं का पालन किए बिना गिरफ्तारी करते हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश देश की बाकी तमाम अदालतों पर लागू होता है।

अब ये दिन कुछ ऐसे चल रहे हैं कि हमें लगातार पुलिस और अदालत के मामलों पर लिखना पड़ रहा है। पहले बस्तर के मामले सामने आए जिनमें बेकसूर आदिवासियों को पुलिस और सुरक्षाबलों ने थोक में मारा और सरकारी वर्दियों द्वारा की गई ऐसी हत्याओं की जांच रिपोर्ट आने के बरसों बाद भी छत्तीसगढ़ सरकार उस पर कोई कार्रवाई करते नहीं दिख रही है। इसके बाद अभी चार दिन पहले एक दूसरा मामला आया जिसमें बस्तर में सीआरपीएफ पर एक नक्सल हमले के बाद पास के गांव के करीब सवा सौ बेकसूर आदिवासियों को गिरफ्तार कर लिया गया था, और एनआईए ने उन पर मुकदमा चलाया, और एनआईए की विशेष अदालत ने उन सबको बेकसूर पाकर छोड़ दिया। आज राज्यों की पुलिस वहां की सत्तारूढ़ राजनीतिक पसंद और नापसंद के आधार पर जिस तरह की कार्रवाई करते दिख रही हैं, उसके खिलाफ देश में एक जागरूकता की जरूरत है, और सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा फैसले में निचली अदालतों को दिए गए निर्देश पर अमल भी करवाने की जरूरत है। अगर पुलिस अपने राजनीतिक आकाओं के कहे हुए किसी की भी गिरफ्तारी के लिए टूट पड़ती है, तो ऐसी पुलिस की कानूनी जवाबदेही तय होनी चाहिए। हमने पिछले कई बरसों में लगातार यह देखा है कि अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों की सरकारों के मातहत काम करती पुलिस राजनीतिक कार्यकर्ता की तरह काम करने लगती है। और यह सिलसिला न्याय प्रक्रिया को ही एक सजा की तरह स्थापित कर देता है जब जुबैर की तरह एक के बाद एक अलग-अलग जिलों में की गई एफआईआर के आधार पर उसकी एक जमानत होते ही दूसरी एफआईआर पर गिरफ्तारी की जाती है, और इंसाफ के पूरे सिलसिले को ही कुचल दिया जाता है। बाकी प्रदेशों में बाकी पार्टियां कोई रहमदिल नहीं हैं, और वे भी अपने विरोधियों, अपने को नापसंद लोगों को अपनी पुलिस के हाथों इसी तरह घेरती हैं, और कुचलती हैं। ऐसे में अदालतों को जमानत की सुनवाई करते हुए यह भी देखना चाहिए कि क्या पुलिस सत्ता के तलुए सहलाने के लिए लोगों को गिरफ्तार करके जेल में डाल रही है? बस्तर के आदिवासी पांच बरस बाद नक्सल आरोपों से छूटकर जेल के बाहर आए हैं, देश में जगह-जगह कई पत्रकार महीनों और बरसों तक जेल में सड़ाए जा रहे हैं क्योंकि किसी प्रदेश की सत्ता उन्हें पसंद नहीं करती। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और चूंकि देश के बहुत से प्रमुख राजनीतिक दलों की सरकारें अपने-अपने राज में यही रूख रखती हैं, इसलिए इसका इलाज अदालत छोड़ और कुछ नहीं हो सकता। जुबैर नाम का यह पत्रकार सुप्रीम कोर्ट में बड़ी लड़ाई लडऩे की ताकत रखता था, इसलिए उसके लिए बड़े-बड़े वकील खड़े हुए, और एक बहुत चर्चित मामला होने की वजह से भी अदालत ने शायद उस पर तेजी से गौर किया। लेकिन बहुत छोटे-छोटे लेखक, पत्रकार, कलाकार ऐसे हैं जिन्हें वकालत की इतनी ताकत हासिल नहीं है, और उनके हकों के लिए सुप्रीम कोर्ट को ही राज्यों की पुलिस को ऐसे निर्देश देने पड़ेंगे ताकि बदनीयत दिखने पर ऐसी पुलिस के खिलाफ कार्रवाई हो सके।

किसी का किसी मामले से छूट जाना इसलिए भी हो सकता है कि गवाह बदल जाएं, और मामला साबित न हो पाए, लेकिन पुलिस की बदनीयत जहां रहती है वहां वह सिर चढक़र बोलती है। ऐसे मामलों में पुलिस को सजा देने का काम भी होना चाहिए, और इस बात की जांच भी होनी चाहिए कि पुलिस ने किन ताकतों के कहे हुए नाजायज और गैरकानूनी काम किए। आज जब देश में न्यायिक प्रक्रिया ही एक सजा हो चुकी है, तो लोगों को ऐसी ज्यादती से बचाने के लिए अदालतों को सक्रिय होकर पुलिस की जवाबदेही कटघरे में पूछनी होगी। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न्याय की प्रक्रिया को वापिस इस्तेमाल में लाने की बात करने वाला है, और इसलिए यह हिम्मत बढ़ाने वाला भी है।

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