धर्म और ट्रैफिक, दो किस्म की अराजकता ऐसी जानलेवा हुई..

-सुनील कुमार॥

पश्चिम बंगाल के कूचबिहार में एक मालवाहक गाड़ी में 27 तीर्थयात्रियों को ले जाया जा रहा था, अचानक इस पिकअप वैन में करंट दौड़ा, और 10 लोगों की मौत हो गई, कई लोग करंट से जख्मी हो गए। पुलिस का अंदाज यह है कि इस गाड़ी में डीजे सिस्टम चलाने के लिए जनरेटर लगाया गया था, और उसी की वायरिंग की गड़बड़ी से यह करंट दौड़ा हो सकता है। इस हादसे के बाद ड्राइवर गाड़ी छोडक़र भाग गया है, और शिवभक्तों के परिवारों को खबर की गई है। ऐसा हादसा हिन्दुस्तान के दो अलग-अलग पहलुओं पर फिक्र खड़ी करता है, एक तो यह कि धर्म का स्वरूप पूरी तरह अराजक हो गया है, वह आत्मघाती होने की हद तक लापरवाह हो गया है, और कई मामलों में हत्यारा होने की हद तक हिंसक भी हो गया है। दूसरा पहलू यह है कि सडक़ों पर हादसों में मरने वाले लोगों में दुनिया में हर दस में से एक हिन्दुस्तान में होते हैं, लेकिन देश-प्रदेशों में किसी को इसकी अधिक फिक्र नहीं दिखती है। धर्म पर आस्था के प्रदर्शन के लिए सार्वजनिक जगहों पर लोग नियम-कानून के खिलाफ किसी भी हद तक जाते हैं, और यह हादसा उसी का एक नमूना है।

हिन्दुस्तान में आज धर्म तरह-तरह से जानलेवा साबित हो रहा है। अभी चार ही दिन हुए हैं, उत्तर भारत में कांवडिय़ों के एक जत्थे ने एक दूसरे कांवडिय़े को पीट-पीटकर मार डाला जो कि थलसेना का फौजी है, और अपनी आस्था के चलते कांवड़ लेकर जा रहा था। इससे परे भी जगह-जगह आस्थावान लोगों की हिंसा सामने आती रहती है, और अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच टकराव भी होते ही रहता है। फिर मानो एक धर्म के कट्टर और धर्मान्ध प्रदर्शन के मुकाबले किसी दूसरे धर्म के लोग उससे अधिक बढ़-चढक़र प्रदर्शन में लग जाते हैं। नतीजा यह होता है कि सार्वजनिक जगहें धार्मिक, कट्टर, और बढ़ते-बढ़ते साम्प्रदायिक मुकाबले का मैदान बन जाती हैं, और हर धार्मिक त्यौहार पुलिस और प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर आता है। उत्तरप्रदेश जैसे कुछ राज्यों में बहुसंख्यक हिन्दू धर्म को राजकीय धर्म सरीखा अघोषित दर्जा देकर धार्मिक टकराव की नौबत घटा दी गई है, क्योंकि गैरहिन्दुओं, और खासकर मुस्लिमों को यह अच्छी तरह मालूम है कि कांवडिय़ों पर हेलीकॉप्टर से या सडक़ किनारे खड़े होकर फूल बरसाने वाले आला पुलिस अफसरों का रूख उनके प्रति कैसा रहेगा अगर वे सडक़ पर कुछ मिनटों की नमाज पढ़ते दिख जाएंगे। जब प्रदेश का राज इस दर्जे का धार्मिक भेदभाव करने लगता है, तो सत्ता की ताकत के सामने टकराव की नौबत घट जाती है। राज्य-धर्म के मानने वाले लोगों, और दूसरे दर्जे के नागरिकों के बीच टकराव की गुंजाइश नहीं रह जाती है, क्योंकि सरकारी इंसाफ कमजोर तबके को हासिल नहीं रहता है।

जिस धर्म को निजी आस्था का सामान होना चाहिए था, वह राजनीतिक बढ़ावे से विकराल होते चल रहा है। त्यौहारों या तीर्थयात्राओं के मौके पर सडक़ों पर परले दर्जे का उत्पात दिखता है। और यह भी कम इसलिए दिखता है कि अधिकतर सीधे-सरल लोग सडक़ों पर अपना अधिकार भूलकर धार्मिक गुंडागर्दी के सामने खड़े नहीं होते। वे चुपचाप किसी और रास्ते से निकल जाते हैं, और किसी टकराव का खतरा नहीं उठाते। लेकिन सार्वजनिक जीवन में साल भर किसी न किसी तरह से अड़ंगा बनने वाले धर्म लोगों की उत्पादकता को भी कम करते हैं, और उनके जीवन का सुख-चैन भी छीनते हैं। चौबीसों घंटे धार्मिक लाउडस्पीकर बजते हैं, सडक़ों पर शामियाने तानकर कार्यक्रम होते हैं, भंडारे लगाकर चारों तरफ गंदगी छोड़ दी जाती है, विसर्जन से नदियों और तालाबों में अपार कचरा इकट्टा होते जाता है। इन सबसे परे लगातार बढ़ते साम्प्रदायिक तनाव और टकराव से लोगों की आशंकाएं बढ़ती जा रही हैं। धार्मिक हिंसा में धर्म से परे चल रहे लोग भी घिर और फंस जाते हैं।

अब इससे जुड़े हुए दूसरे पहलू पर आएं, तो हिन्दुस्तान में सडक़ों पर गाडिय़ां धर्म से परे भी बहुत बुरी तरह बेकाबू हैं। गाडिय़ों से जुड़ा हुआ सारा ही सरकारी अमला संगठित भ्रष्टाचार चलाता है, और सामान ढोने वाली गाडिय़ों में मजदूरों और मुसाफिरों को ढोना रोजमर्रा की एक आम बात है। अब ऐसी गाडिय़ों में किसी हिफाजत का कोई इंतजाम तो हो नहीं सकता, इसलिए इनके हादसों में लोग बड़ी संख्या में मरते हैं। सरकारी नियमों का यह हाल है कि एक तरफ तो केन्द्र सरकार हर कार में आधा दर्जन एयरबैग लगाने का कानून बना रही है, ताकि लोगों की जिंदगी किसी हादसे में भी बच सके, दूसरी तरफ मजदूरों से लेकर तीर्थयात्रियों तक को सामान की तरह ढोने वाले ट्रकों और दूसरे कारोबारी वाहनों पर कोई रोक नहीं है। हालत यह है कि सरकारी और राजनीतिक कार्यक्रमों के लिए भी सभी तरह की मालवाहक गाडिय़ों में जिंदगियां ढोई जाती हैं। अब देश में ऐसे दोहरे कानून से क्या फायदा जिसमें पैसे वाले लोगों की निजी कारों में भी हर मुसाफिर की जिंदगी बचाने एयरबैग लगाए जाएं, और गरीबों की जिंदगी जानवरों से भी कम कीमती मानी जाए। अगर मालवाहक गाडिय़ों में लोगों को ढोना बंद होगा, ऐसी गाडिय़ों को राजसात किया जाएगा, तो धीरे-धीरे मुसाफिर गाडिय़ां बढऩे लगेंगी। लेकिन नियमों का कोई सम्मान न करने की वजह से आज ऐसी अराजक नौबत है कि सामान या जानवर की तरह ठूंसकर इंसानों को ले जाया जाता है, और उस पर कोई रोक नहीं है। फिर जब ऐसी गाडिय़ों पर धार्मिक लोग सवार रहते हैं, तो उन्हें छूने की हिम्मत किसकी हो सकती है। राजनीतिक दलों का यह चरित्र बीते दशकों में लगातार अधिक उजागर होते चल रहा है कि वे सार्वजनिक-धार्मिक आयोजनों में भीड़ को बढ़ावा देकर अपनी जमीन बनाने की कोशिश करते हैं, और भीड़ अपने मिजाज के मुताबिक अराजकता पर चलते हुए राजनीतिक संरक्षण का अधिक मजा भी लेते चलती है।

लेकिन हर कुछ बरसों में किसी न किसी चुनाव में जाने वाली पार्टियों की हांकी जाती सरकारें कोई कड़ी कार्रवाई नहीं करती हैं। तो क्या अब सरकार की रोजमर्रा की जिम्मेदारियों के लिए भी लोग अदालत जाएं? और अब तो यह भी खतरा हो गया है कि जनहित याचिका लेकर जाने वाले लोगों पर सुप्रीम कोर्ट पांच लाख रूपये तक का जुर्माना लगा सकता है, कैद सुना सकता है।
-सुनील कुमार

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