ताइवान पर अमरीका और चीन में तनाव कहां तक.?

-सुनील कुमार॥

अभी दुनिया यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद शुरू हुई जंग को ही बड़ी मुश्किल से झेल पा रही है। इन दो देशों से दूर, धरती के बिल्कुल दूसरी तरफ बसे हुए देशों तक भी इस जंग के धमाकों से अर्थव्यवस्था में दरारें पड़ रही हैं। चारों तरफ पेट्रोलियम और गैस के दाम बढ़ रहे हैं, अनाज और खाद की कमी हो रही है, और महंगाई से परे दुनिया का एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जो कि अंतरराष्ट्रीय दान में मिले अनाज पर जिंदा है, और वह हिस्सा भूख से मौत की तरफ बढ़ रहा है क्योंकि यूक्रेन में जमा अनाज बाहर निकल नहीं पा रहा है। इस जंग में अपनी फौजें न भेजते हुए भी योरप और अमरीका हथियार भेजकर शामिल तो हो ही चुके हैं, लेकिन इस बीच एक नया टकराव एक नई सरहद पर हो रहा है, वह भी दुनिया के लिए रूस-यूक्रेन से बड़ी फिक्र का सामान हो सकता है।

अमरीकी कांग्रेस (संसद) की अध्यक्ष नैंसी पेलोसी उस ताइवान में पहुंची हुई हैं जिसे चीन अपना एक हिस्सा मानता है। और दशकों से यह तनाव चल रहा है, चीन अपना फौजी बाहुबल दिखाते रहता है, ताइवान किसी टकराव से बचकर एक कामयाब कारोबारी देश बन चुका है। और इस तनाव के बीच अमरीका अपनी पूरी ताकत के साथ ताइवान के पीछे खड़ा दिखता है कि अगर चीन ताइवान पर हमला करेगा तो अमरीका उसका जवाब देगा। हालांकि अमरीका की घोषित विदेशनीति में ताइवान की फौजी मदद की घोषणा नहीं है, लेकिन अमरीका की कही बातों का लब्बोलुआब वही रहता है कि वह ताइवान पर किसी भी चीनी हमले के वक्त ताइवान का साथ देगा। अभी जब अमरीकी संसद की अध्यक्ष नैंसी पेलोसी के ताइवान जाने की खबर आई तो चीन ने जमकर विरोध किया, और उसका यह कहना था कि ताइवान उसी का हिस्सा है, और वहां पर एक प्रमुख अमरीकी नेता का आना चीन बर्दाश्त नहीं करेगा। अमरीकी सरकार ने यह साफ कर दिया कि संसद की अध्यक्ष सरकार के मातहत नहीं आती, और संसद एक स्वायत्त संस्था है, इसलिए उसकी अध्यक्ष का कार्यक्रम अमरीकी सरकार तय नहीं करती। फिलहाल तनातनी के बीच नैंसी पेलोसी ताइवान पहुंच चुकी हैं, और चीन अपना फौजी बाहुबल दिखाते हुए ताइवान के करीब अपने फाइटर प्लेन उड़ा रहा है, करीब के समंदर में चीन और अमरीका के फौजी जहाज पहुंचे हुए हैं, और यह तनाव का एक नया मोर्चा खुला है।

वैसे तो जब से यूक्रेन पर रूसी हमला हुआ, तभी से यह चर्चा चल रही थी कि क्या इससे प्रेरणा लेकर चीन भी ताइवान पर हमला करेगा? लेकिन यूक्रेन के मुकाबले आज की बाकी दुनिया ताइवान पर अधिक दूर तक टिकी हुई है, और अगर ताइवान किसी जंग में फंसता है, तो दुनिया की अर्थव्यवस्था इस बुरी तरह गिरेगी कि जिसका अंदाज लगाना भी आज मुश्किल है। दरअसल ताइवान हर किस्म की मशीन और कम्प्यूटर में लगने वाले सेमीकंडक्टर और माइक्रोचिप का दुनिया का सबसे बड़ा निर्माता है। अगर किसी वजह से ताइवान में ये कारखाने थमते हैं, तो पूरी दुनिया में मोबाइल फोन से लेकर कार-टीवी तक, और कम्प्यूटरों तक का उत्पादन ठप्प पड़ जाएगा। एक अकेला देश दुनिया की इलेक्ट्रॉनिक धडक़न को रोकने वाला साबित होगा। ऐसा नहीं कि आज लोगों को इसका अंदाज नहीं है, लेकिन यूक्रेन के तुरंत बाद ताइवान को लेकर एक फिक्र की नौबत इतनी जल्दी आएगी, यह बात किसी को नजर नहीं आ रही थी। फिर लोगों को इस बात पर भी हैरानी हो रही है कि अमरीकी संसद की अध्यक्ष को आज अंतरराष्ट्रीय तनाव के बीच ताइवान का साथ देने के लिए इस तरह वहां पहुंचकर चीन के साथ तनाव बढ़ाने की बात क्यों सूझी? अभी यह बात साफ नहीं है कि अमरीकी सरकार और वहां की संसद-अध्यक्ष के बीच इस मुद्दे पर कितनी सहमति बनी है, या नहीं बनी है। लेकिन इस एक दौरे से, नैंसी पेलोसी के लौटते ही चीन ने ताइवान की फौजी नाकेबंदी कर दी है, और उसके आसपास फौजी कसरत छेड़ दी है। मानो इसके जवाब में अमरीका ने अपना एक सबसे बड़ा जंगी जहाज वहीं पास में पहुंचा दिया है। आज दुनिया की अर्थव्यवस्था ऐसा कोई टकराव झेलने की हालत में नहीं है जिससे कि तमाम देशों के इलेक्ट्रॉनिक कारोबार ठप्प हो जाने का खतरा रहे। इससे दुनिया के कारोबार के सामने यह सोचने का एक सामान भी आ खड़ा हुआ है कि किसी एक नाजुक और जरूरी पुर्जे को लेकर क्या किसी एक देश पर इतना आश्रित रहना समझदारी की बात है?

ताइवान और चीन के बीच ऐतिहासिक तनाव हमेशा से चले आ रहा है, और ताइवान चूंकि चीन की फौजी ताकत के मुकाबले कहीं नहीं टिकता, इसलिए वह बिना टकराव अपनी आर्थिक तरक्की करने में लगे रहता है। अमरीका की कोई अतिरिक्त हमदर्दी ताइवान से हो, ऐसी कोई वजह नहीं है, लेकिन आज दुनिया के फौजी भूगोल में दुश्मन के दुश्मन देश को दोस्त बनाने का जो सिलसिला चलता है, उसी के तहत चीन के दुश्मन अमरीका को, चीन का दूसरा दुश्मन ताइवान सुहाता है। लेकिन ताइवान आज अपने कारोबारी एकाधिकार को लेकर दुनिया पर एक खतरनाक नौबत खड़ी करता है कि अगर उसके कारखाने ठप्प हुए, तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था ठप्प हो जाएगी। और यह अर्थव्यवस्था उन कारोबारों की ठप्प होगी जो कि रूस-यूक्रेन जंग से प्रभावित नहीं हैं। दुनिया का इलेक्ट्रॉनिक कारोबार अगर ठप्प होगा, तो दुनिया भर की सरकारों का टैक्स भी मार खाएगा। इसलिए यह खतरा रूस-यूक्रेन के खतरे से बड़ा हो सकता है।

आज चीन और अमरीका, ये दोनों ही देश अपनी ताकत को बढ़ाने और अपने प्रभाव क्षेत्र को फैलाने का कोई भी मौका नहीं चूकते हैं। फिर आज रूस की घेरेबंदी करते हुए पश्चिमी देशों ने रूस के चीन पर आश्रित होने को भी बढ़ा दिया है। दुनिया की महाशक्तियों के बीच संतुलन की यह एक नई नौबत है, और अभी तस्वीर साफ भी नहीं है। इसलिए आने वाला वक्त यह बताएगा कि ताइवान को लेकर अमरीका और चीन के बीच तनाव बढ़ता है, या कि बांहें फडक़ाने के बाद ये दोनों देश चुप बैठेंगे। फिलहाल ऐसे कोई भी अंतरराष्ट्रीय तनाव फिक्र तो खड़ी करते ही हैं क्योंकि दुनिया मौजूदा तनावों से भी उबर नहीं पा रही है।

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