भगत सिंह-अंबेडकर की फोटो ले मोहब्बत और नसीहतों से नफरत कैसे चलेगी?

-सुनील कुमार।।

दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार के अनुसूचित जाति और जनजाति कल्याण मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने इस्तीफा दे दिया है। पिछली दिनों वे बौद्ध धर्म के एक बड़े कार्यक्रम में शामिल हुए थे जिसमें करीब दस हजार लोगों ने डॉ. भीमराव अंबेडकर की बताई हुई 22 प्रतिज्ञााओं को दुहराया था। इसमें एक प्रतिज्ञा में हिंदू देवी-देवताओं की पूजा न करने की शपथ भी शामिल है। इस बात को हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करार देते हुए भाजपा ने आम आदमी पार्टी पर हमला किया था और इस मंत्री से लेकर केजरीवाल तक से इस्तीफा मांगा था। सोशल मीडिया पर केजरीवाल को हिंदू विरोधी करार देते हुए गुजरात चुनाव में उनकी सक्रियता को घेरने की कोशिश भी की गई थी। ऐसे ही सारे विवाद के बीच मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने कल पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने यह साफ किया कि वे अंबेडकरवादी हैं, और अपनी धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक वे इस कार्यक्रम में और दस हजार लोगों के साथ शामिल हुए थे जिसमें बाबा साहब की दिलवाई गई 22 प्रतिज्ञाएं दुहराई गई थीं। उन्होंने इस इस्तीफे में खुलासे से लिखा कि ये प्रतिज्ञाएं केंद्र की भाजपा सरकार ने भी बाबा साहब की किताबों में छपवाई है और ये प्रतिज्ञाएं हर वर्ष देश में हजारों जगहों पर करोड़ों लोग दुहराते हैं। भाजपा इस कार्यक्रम और उनकी मौजूदगी को लेकर आम आदमी पार्टी और अरविन्द केजरीवाल पर नाजायज हमला कर रही और इस गंदी राजनीति के खिलाफ वे (राजेंद्र पाल गौतम) मंत्री पद से इस्तीफा दे रहे हैं।

एक तरफ भाजपा और दूसरी तरफ केजरीवाल, इन दोनों के साथ दिक्कत यह हो गई है कि इन दोनों ने देश की आजादी के ऐसे प्रतीकों को गोद लेने का काम किया है जिन्हें वे प्रतीक से अधिक पसंद नहीं करते। भाजपा और केजरीवाल दोनों ही भगत सिंह और अंबेडकर को बड़ा आदर्श मानकर अपने मंचों पर पेश करते हैं, केजरीवाल ने तो सरकारी दफ्तरों से गांधी तक की तस्वीरें हटवा दीं, और सिर्फ भगत सिंह और अंबेडकर की तस्वीरें लगवाई हैं। यही काम गांधी की तस्वीर के साथ-साथ भाजपा ने किया है। उसने सरदार पटेल की दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमाओं में से एक प्रतिमा बनवाई है, और पटेल को कांगे्रस पार्टी की तरफ से इतिहास में तिरस्कृत साबित करते हुए पटेल को अपना आदर्श बनाया है, जबकि पटेल ने गांधी हत्या के बाद लगातार आरएसएस की नीतियों का विरोध करते हुए इस संगठन पर प्रतिबंध लगाया था और इसे गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार विचारधारा ठहराया था। लेकिन पटेल की तमाम धर्मनिपरेक्ष बातों को अलग रखते हुए भाजपा उनके संघ-विरोधी लिखे हुए को अनदेखा करते हुए पटेल के नाम का इस्तेमाल करती है। ठीक इसी तरह भाजपा अंबेडकर की बुनियादी नसीहतों को आज दिल्ली सरकार के इस मंत्री के संदर्भ में अनदेखा कर रही है, मंत्री पर हमला कर रही है, और अंबेडकर का नाम भी जप रही है। अगर बौद्ध धर्म में आने वाले लोगों को अंबेडकर ने हिंदू देवी-देवताओं की पूजा न करने के लिए कहा था, तो उसमें क्या गलत कहा था? और अगर वह प्रतिज्ञा हिंदू धर्म छोडक़र बौद्ध धर्म में जाने वाले लोग हर बरस दुहराते हैं तो उसमें हिंदू देवी-देवताओं का अपमान कहां है? आज कुछ मुस्लिमों को भाजपा ने हिंदू बनाया है, तो क्या वे अब भी पांच वक्त नमाज पढ़ते रहेंगे? भाजपा का इस मामले को लेकर इस मंत्री का विरोध एक बहुत बड़ा पाखंड है जो कि गुजरात चुनाव के हिसाब से खड़ा किया हुआ दिखता है, वरना भाजपा को यह बात साफ करना चाहिए कि अंबेडकर की तैयार की हुई प्रतिज्ञाओं से वह सहमत है या असहमत है? ऐसा भी नहीं कि उनसे भाजपा के असहमत होने से बौद्ध हो चुके कल के हिंदू दलितों की सेहत पर कोई फर्क पड़ रहा है। जैसे आक्रामक हिंदुत्व तेवरों की वजह से दलितों ने करोड़ों की संख्या में बौद्ध बनना बेहतर समझा, ठीक वैसे ही आज आम आदमी पार्टी के इस मंत्री ने इस मुद्दे पर मंत्री पद छोड़ देना बेहतर समझा है। अब गेंद अरविंद केजरीवाल और भाजपा दोनों के पाले में है। अंबेडकर की फोटो टांगने वाली केजरीवाल की पार्टी को अब यह साबित करना है कि अंबेडकर की प्रतिज्ञा को दुहराने की वजह से अगर वे अपने मंत्री का इस्तीफा ले रहे हैं, या मंजूर कर रहे हैं, तो इसके बाद उन्हें अंबेडकर का नाम लेने का भी हक है क्या? अगर उनमें इतना नैतिक साहस भी नहीं है कि अपने एक बौद्ध मंत्री को वे अंबेडकर की दिलवाई प्रतिज्ञा दुहराने का हक दे सकें, तो उन्हें भारतीय लोकतंत्र में राजनीति करने का क्या हक है? ठीक इसी तरह भाजपा को भी आज यह साबित करना होगा कि एक बौद्ध राजनेता के इस प्रतिज्ञा के दुहराने से अगर उसे यह हिंदू देवी-देवताओं का अपमान लग रहा है, तो फिर उसे अंबेडकर का नाम लेकर राजनीति क्यों करनी चाहिए क्योंकि अंबेडकर की तो बुनियादी सोच ही यही थी। और अगर इस सोच पर चलने की वजह से अंबेडकर के एक धार्मिक अनुयाई को अपनी धार्मिक मान्यता दुहराने का भी हक भाजपा नहीं देती, तो फिर उसे अंबेडकर की फोटो का अगला कोई इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

यह बहुत अच्छी नौबत है कि आम आदमी पार्टी के एक मंत्री ने तो अपनी धार्मिक, सामाजिक, और राजनैतिक प्रतिबद्धता साफ करते हुए मंत्री पद छोड़ देना बेहतर समझा है। राजेंद्र पाल गौतम ने अपने इस्तीफे में लिखा है- पिछले कुछ वर्र्षाें से मैं लगातार देख रहा हूं कि मेरे समाज की बहन-बेटियों की इज्जत लूटकर उनका कत्ल किया जा रहा है, कहीं मूंछ रखने पर हत्याएं हो रही हैं, कहीं-कहीं मंदिर में प्रवेश करने पर और मूर्ति छूने पर अपमान के साथ पीट-पीटकर हत्या की जा रही है, यहां तक कि पानी का घड़ा छू लेने पर बच्चों तक की दर्दनाक हत्याएं की जा रही हैं, ऐसे जातिगत भेदभाव की घटनाओं से मेरा दिल हर दिन छलनी होता है। दशहरे के दिन आयोजित बौद्ध कार्यक्रम में तो इस मंत्री ने देश की आज की दलितों की हालत पर कुछ नहीं कहा था, और बौद्ध समाज की एक प्रचलित प्रतिज्ञा को ही दुहराया था। लेकिन अब भाजपा के हमलों के बाद इस्तीफा देते हुए उन्होंने जो कहा है, उस पर केजरीवाल और भाजपा दोनों को अपना रूख साफ करना होगा। वोटों के लिए अंबेडकर की फोटो, और उनके अनुयाईयों का तिरस्कार साथ-साथ नहीं चल सकता। ऐसा ही काम देश में कुछ राजनीतिक दल सरदार पटेल को लेकर, नेताजी सुभाषचंद्र बोस को लेकर, विवेकानंद और सावरकर को लेकर कर रहे हैं। सावरकर को गांधी से ऊपर साबित करने की कोशिश करते हुए भाजपा और उसकी सोच के संगठन यह बात पूरी तरह से अनदेखी कर देते हैं कि गाय खाने के बारे में सावरकर की सोच कैसी वैज्ञानिक थी, और उसके ठीक खिलाफ अभियान चलाते हुए आज की हिंदुत्ववादी ताकतें सावरकर की तस्वीर पर दांव भी लगाते चलती हैं।

आखिर में यह बात साफ होनी चाहिए कि इस मुद्दे पर अपने मंत्री से लिए हुए, या मंत्री के दिए हुए इस्तीफे पर आम आदमी पार्टी अपना रूख बताए, और अंबेडकर की फोटो रखे या हटाए। ठीक यही सवाल भाजपा के भी सामने है कि अगर वह अंबेडकर से असहमत है, इस हद तक असहमत है कि वह अंबेडकर की नसीहत की वजह से अगर किसी दलित मंत्री का जीना हराम कर रही है, तो फिर उसे भी अंबेडकर का नाम लेकर वोट नहीं मांगने चाहिए। देश के अंबेडकरवादी दलितों के सामने यह परखने का एक मौका है कि केजरीवाल और भाजपा की असलियत क्या है।

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