गोरे रंग पे ना इतना गुमान कर..

-सुनील कुमार।।

छत्तीसगढ़ में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के किसान संगठन ने कल पहली नवंबर को राज्य के स्थापना दिवस पर राज्य सरकार और कोल इंडिया के खिलाफ प्रदर्शन किया क्योंकि राज्य के साथ-साथ कल कोल इंडिया का भी स्थापना दिवस था, और सीपीएम इन दोनों की रोजगार संबंधी नीतियों के खिलाफ आवाज उठा रही थी। सीपीएम के बयान में कहा गया कि उसने कोयला खदानों के इलाकों में काला दिवस मनाया। इस प्रदर्शन के अधिक मुद्दों पर चर्चा आज का मकसद नहीं है, लेकिन काला दिवस शब्द पर कुछ चर्चा करने की हसरत है। विरोध-प्रदर्शन के लिए किसी जगह किसी नेता के पहुंंचने पर उसे काले झंडे दिखाने की घोषणा होती है, और लोग अपने कपड़ों के भीतर काले झंडे छुपाकर आमसभा या जुलूस के रास्ते पर पहुंचते हैं, और काले झंडे दिखाते हैं जिन्हें पुलिस छीनने की कोशिश करती है। कुछ और लोग कुछ दूरी से काले गुब्बारे हवा में छोड़ते हैं, और वहां तक पुलिस की लाठियां नहीं पहुंच पातीं, जिनके खिलाफ प्रदर्शन होता है वे उसे अनदेखा करने की कोशिश करते हैं, और प्रेस-फोटोग्राफरों के कैमरे उन्हीं पर जा टिकते हैं। जिन दफ्तरों में या कारखानों में विरोध जाहिर करना होता है, वहां लोग बांह पर काली पट्टी बांधकर काम करते हैं, या कमीज के सामने पिन से काली रिबिन का टुकड़ा लगाते हैं। सरकार से जब किसी कानून को वापिस लेने की मांग होती है, तो काला कानून वापिस लेने का नारा लगाया जाता है। जब किसी के खिलाफ और अधिक आक्रामक प्रदर्शन करना रहता है, तो उसके मुंह पर कालिख मली जाती है, या काली स्याही पोती जाती है।

काला रंग प्रतिकार का प्रतीक बना हुआ है, और कई दूसरे किस्म की नकारात्मक बातों के लिए काले रंग का इस्तेमाल किया जाता है। भ्रष्टाचार या जुर्म से कमाया गया पैसा, या टैक्स चुराकर बचाया गया पैसा कालाधन कहलाता है, पश्चिमी दुनिया में मौत की जो छवि बनाई गई है वह काला लबादा ओढ़े हुए रहती है, हिन्दू धर्म में यमराज काले भैंसे पर सवार होकर चलता है। पश्चिम के कॉमिक्स देखें तो उनमें गोरे वेताल या फैंटम का सहयोगी एक अफ्रीकी बौना आदिवासी, गुर्रन होता है, और इसी तरह कॉमिक्स के एक दूसरे किरदार मैन्ड्रेक का सहयोगी एक अफ्रीकी राजकुमार लोथार होता है। ये दोनों ही काले सहयोगी गोरों के मातहत काम करने वाले वफादार सेवक की तरह रहते हैं, और इन कॉमिक्स को पढऩे वाले बच्चों के दिल-दिमाग में बचपन से ही यह बात घर कर जाती है कि काले लोग गोरों की सेवा के लिए बने रहते हैं। ऐसी अनगिनत मिसालें हैं जो कि कहावत और मुहावरों के दिनों से शुरू हुई हैं, और आज हिन्दुस्तान में सबसे जागरूक राजनीतिक दल सीपीएम के नारों तक जारी हैं, अब हिन्दुस्तानी जनचेतना में किसी रंग का ऐसा बेइंसाफ राजनीतिक इस्तेमाल खटकता भी नहीं है, क्योंकि भारत सहित बाकी दुनिया का समाज भी रंगों की राजनीति को समझने में नाकामयाब रहा है।

हम पहले भी यह लिख चुके हैं कि हिन्दी बोलने वाले बच्चों को बचपन से ही यह गाना सुनने और गाने मिलता है कि नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए, बाकी जो बचा काले चोर ले गए…। हिन्दी और हिन्दुस्तानी में किसी के कुकर्मों की चर्चा होती है तो कहा जाता है कि इतिहास में उसके काम काली स्याही से दर्ज होंगे, जबकि सारा का सारा इतिहास काली स्याही से ही दर्ज होता है, किसी मुजरिम का भी, और किसी महान का भी, दुनिया की तकरीबन तमाम किताबें काली स्याही से ही छपती हैं। किसी घर के बहुत शानदार बनने पर उसे लोगों की नजर लग जाने का खतरा रहता है तो लोग उसके सामने एक काली हंडी टांग देते हैं, बच्चों के चेहरे पर काजल का काला टीका लगा दिया जाता है, उनके गले, हाथ, या कमर पर काला डोरा बांध दिया जाता है। ट्रकों और दूसरी गाडिय़ों के पीछे लोग लिख देते हैं, बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला। कोई जुर्म करते हैं तो उनके बारे में कहा जाता है कि खानदान या मां-बाप के नाम पर कालिख पोत दी। किसी के लिए काली नीयत की चर्चा होती है, किसी के काले धंधे, किसी की काली कमाई गिनाई जाती है। हिन्दुओं के शुभ मौकों पर काले कपड़ों से परहेज किया जाता है, गहनों में कोई काला पत्थर न लगा रहे यह देखा जाता है। और यह फेहरिस्त अंतहीन है, यह कितनी भी लंबी हो सकती है। और ऐसा भी नहीं है कि इंसानों की जुबान में ही काले रंगों का ऐसा नकारात्मक इस्तेमाल हुआ है। ईश्वर, या कुदरत, जो कोई भी इंसानों को बनाने के लिए जिम्मेदार है उसने कई बीमारियां भी ऐसी बनाई हैं जो कि काले लोगों को अधिक प्रभावित करती हैं। अभी एक ऐसा स्तन-कैंसर मिला है जो गोरी महिलाओं के मुकाबले काली महिलाओं को न सिर्फ अधिक होता है, बल्कि काली महिलाओं की मौत भी गोरी महिलाओं से 28 फीसदी अधिक होती है, अब वैज्ञानिक इसके पीछे के जिम्मेदार जींस का पता लगा रहे हैं।

इस पूरी बात का मकसद यह है कि योरोप और अमरीका जैसे गोरे देशों में अफ्रीका से आए हुए लोगों के साथ जिस तरह का रंगभेद होता है, कुछ उसी किस्म का रंगभेद दुनिया की जुबान में अपने-अपने इलाकों के काले लोगों के खिलाफ होता है, फिर चाहे वह झंडों, शब्दों, और कहावतों की शक्ल में ही क्यों न होता हो। दुनिया में भाषा की राजनीति हमेशा से ही हिंसक रही है, और बेइंसाफ भी, इसलिए उसकी मरम्मत करने की जरूरत है, और इस जागरूकता की जरूरत है कि आज की भाषा को रंगभेद से किस तरह आजाद कराया जाए। हिन्दुस्तानियों की काले रंग से नफरत जगजाहिर है, खासकर इस देश में उन लोगों की, जो कि इस देश के काले लोगों के मुकाबले कम काले हैं या गोरे हैं। हिन्दुस्तानी अखबारों में शादी के इश्तहार देखें तो वे गोरी दुल्हन की चाह से लदे रहते हैं, काली लडक़ी से शादी करना मानो कोई जुर्म हो। यह पूरी सोच कतरा-कतरा नहीं बदल सकती, इसे राजनीतिक नारों से लेकर, मजदूर संगठनों के झंडों तक, और कहावत-मुहावरों तक में सुधारना होगा, तब कहीं जाकर दो-चार सदी में समाज की सोच बदल पाएगी। जिसे टैक्स चोरी या भ्रष्टाचार का कालाधन कहा जाता है, वह भी होता तो लाल और हरे नोटों की शक्ल में है, या सुनहरे बिस्किटों की शक्ल में, उनमें से किसी का भी रंग काला नहीं होता, और दुनिया की कोई गाली गोरी नहीं होती। यह सिलसिला खत्म करने की जरूरत है। ऐसा भी लगता है कि गोरी दुनिया में, या भारत जैसे देश में भाषा का इस्तेमाल पहले गोरे लोगों ने शुरू किया होगा, और उसी वक्त से बुरी, नकारात्मक, या गलत बातों के लिए काले शब्द को बढ़ावा दिया गया होगा। बाद में काले लोगों की तो यह बेबसी हो गई होगी कि वे इन गालियों को ढोते रहें। और धीरे-धीरे सदियां पार होते-होते काले लोगों का भी यह अहसास खत्म हो गया होगा कि विरोध और नकारात्मकता के लिए काले रंग का इस्तेमाल दरअसल उनके खिलाफ एक साजिश थी जिसे उन्होंने स्वाभाविक मान लिया। लोगों को अपने-अपने दायरे में दायरे में काले रंग से जुड़ी हुई बेइंसाफ बातों की शिनाख्त करनी चाहिए, और उनका इस्तेमाल खत्म करना चाहिए, सोशल मीडिया पर जहां-जहां काले रंग का ऐसा इस्तेमाल दिखे, उसका विरोध करना चाहिए। गोरे रंग पे न इतना गुमान कर, यह गाना बना कैसे, काले रंग पर गुमान का तो कोई गाना अब तक बन नहीं पाया है। काले रंग के लिए तो बस यही गाना बना है- हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं, मानो काले रंग वालों का दिल तो हो ही नहीं सकता!

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