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माता जी कहलाना अश्‍लील लगता है इन मैडम को!!

By   /  July 3, 2012  /  9 Comments

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-कुमार सौवीर||

लखनऊ: इंडिया टीवी के दबंग विनोद कापड़ी ने कितनी बेशर्मी से कह दिया कि यशवंत सिंह ने 20 हजार रूपयों की रंगदारी मांगी थी। और कितनी बेशर्मी से तथाकथित जागरूक पत्रकारों ने बीस हजार रूपयों की उधारी की मांग को एक लाख की रंगदारी में बदल डाला। कितनी बेशर्मी से कापड़ी और उसकी पत्‍नी साक्षी ने उस एसएमएस को अश्‍लील करार दे दिया जिसमें यशवंत सिंह ने साक्षी को माता जी संबोधित किया था। परम्‍परागत पत्रकारिता की दलालों की सत्‍ता के चरणों मे लोटती पुलिस के मुखिया एसएसपी प्रवीण कुमार ने कितनी बेशर्मी के साथ यशवंत सिंह की दलीलों को अनुसुना करते हुए अर्जी को फाड़ दिया और पूरी बेशर्मी पर आमादा होते हुए यशवंत सिंह पर ऐसी-ऐसी धाराएं लगाकर जेल में ठूंस दिया जैसे यशवंत कोई कुख्‍यात अपराधी हो।

अपनी बात से पहले आपको एक तथ्‍य दिखाना चाहता हूं। मैं बताता हूं आपको कि यशवंत सिंह ने खुद ही मुझे पांच हजार रूपयों की मदद की थी, तब जब मैं आर्थिक तौर पर टूटा हुआ था। एक नजर डालिये मेरे एकाउंट में 12 जून-12 को, जहां भड़ास4मीडिया ने पांच हजार रूपये ट्रांसफर दिये हैं।
यशवंत सिंह ने यह मदद तब से ही देनी शुरू की थी, जब मैं नौकरी छोड़़कर सड़क पर आ गया था, लेकिन झुका नहीं था। और लोगों ने भी मुझे यह मदद लगातार दी। ब्रेन-स्‍ट्रोक के चलते अस्‍पताल के दौरान मेरी तो मौत ही जाती अगर यशवंत जैसे दोस्‍तों ने पांच दिनों तक लखनऊ में डेरा डाल कर पैसों का जुगाड़ न करा दिया होता।
देख लीजिए मेरे एकाउंट की स्लिप—

हां, बताता चलूं कि ब्रेन स्‍ट्रोक के दौरान लंदन से साइंटिस्‍ट दिनेश त्रिपाठी, दिल्‍ली की बैंककर्मी किरन श्रीवास्‍तव, उदद्यमी शीतल सिंह, सुल्‍तानपुर से दलजीत सिंह, प्रतुल मिश्र जैसे दर्जनों लोगों ने मुझे मेरा जीवन दिलाया। नियमित तौर पर तो यशवंत पूरे दौरान मेरे साथ जुड़ा रहा ही। ऐसे लोग न होते तो मैं न जाने पहले ही खत्‍म हो जाता। ऐसे ही दोस्‍तों के चलते मैं पूरे सम्‍मान के साथ सिर उठा पा रहा हूं। अब भले ही पुलिस उस कापड़ी दलाल के तलवे चाटे, लेकिन कालिख यशवंत के चेहरे पर नहीं, बल्कि ऐसे ही पत्रकारीय दलालों और पुलिस के चेहरों को ही काला करती रहेगी। पत्रकारिता के जांबाज अभिमुन्‍य जैसे योद्धों को इतनी जल्‍दी और आसानी से कत्‍ल करा पाना मुमकिन नहीं होगा।

तनिक बताइये कि साक्षी के साथ कौन सा अश्‍लील एसएमएस भेजा था। विनोद कापड़ी की पत्‍नी साक्षी को केवल इतना ही तो लिखा था यशवंत सिंह ने लिखा था कि: साक्षी माता जी।

तो भइया। माता जी कहना-लिखना अश्‍लील होता है तो दुनिया भर के पिताओं-माताओं को चाहिए कि वे अपने बेटों पर अश्‍लील बातें कहने का मुकदमा चला दें। सीआरपीसी की जितनी भी संज्ञेय धाराएं होती हैं, ऐसे बेटों पर आयद कर दी जाएं जो माताजी कहने में गर्व करते हैं। निजी तौर पर मैं जानता हूं कि मेरे तर्क थोथे ही हैं, लेकिन विनोद कापड़ी और उसकी पत्‍नी साक्षी के साथ ही एसएसपी प्रवीण कुमार के तर्क भी इससे भी ज्‍यादा बेवकूफी भरे हैं। बेवकूफी भरे नहीं, बल्कि जघन्‍य साजिशन और शातिराना भी हैं।

बात अब अगली बात पर कर लें। हां, मानता हूं कि रात के वक्‍त साक्षी को एसएमएस किया था यह। मैं मानता हूं कि यशवंत को यह नहीं करना चाहिए था। लेकिन अगर कर ही दिया तो कौन सा आसमान फट गया। गाली तो नहीं दी थी ना। साक्षी को दिक्‍कत थी तो उन्‍हें इसकी शिकायत अपने फोन प्रोवाइडर से करनी चाहिए थी। तरीका होता ही है इसका। न जाने ऐसी न जाने कितनी कॉल और एसएमएस के खिलाफ मैंने ऐसा लिखा है। लेकिन कभी भी पुलिस ने उस पर कोई जवाब नहीं मिला। फिर नोएडा के एसएसपी प्रवीण कुमार को इसमें क्‍या दिखा कि उसने एफआईआर दर्ज कर कर यशवंत के साथ किसी कुख्‍यात अपराधी और आतंकवादी की तरह व्‍यवहार कर दिया। क्‍यों प्रवीण कुमार ने थाना परिसर को पुलिसवालों की छावनी में बदल डाला, जहां न कोई यशवंत से बात कर सका और न कोई पानी पिलाने वाला। यशवंत मिलने जब सैकड़ों पत्रकार थाने पर पहुंचे तो उनके मोबाइल तक पुलिस ने जब्‍त कर लिये। आखिर क्‍यों। क्‍या शिकायत थी यशवंत से पुलिस को। केवल इतना ही ना, कि विनोद कापड़ी और उसकी पत्‍नी का मामला था और प्रवीण कुमार हर कीमत पर इस एक बड़े टीवी चैनल के आला पत्रकार दंपत्ति को खुश करना ही चाहता था।

यशवंत सिंह बीस हजार रूपये मांग रहा है। उधार के लिए। तो इसमें क्‍या हर्ज है भइया। हम में से कौन नहीं देता-लेता-मांगता है उधार। फिर विनोद कापड़ी को क्‍या ऐतराज हुआ। उधार ही मांगा था ना। तो दे देते। मन न होता तो न देते। कोई जबर्दस्‍ती तो थी नहीं। फिर कापड़ी को क्‍यों मिर्च लगी। दाढी में क्‍यों तिनका फंसा कापड़ी के। वजह साफ थी, साजिश। और रंजिश भी। कौन नहीं जानता कि यशवंत और कापड़ी एक-दूसरे को खूब जानते-पहचानते रहे हैं। दोस्‍ती और दुश्‍मनी भी रही है उन दोनों में। और पुलिस के एसएसपी प्रवीण को—— खैर, क्‍या किया जाए उसको, जो जमीर बेच बैठा हो। जमीर तो उन पत्रकारों का भी बिका हुआ है जो चंद रूपल्‍ली पर बीस हजार रूपये को एक लाख की रंगदारी का ऐलान करते हैं। बावजूद इसके कि कापड़ी को बीस हजार पर शिकायत है, लेकिन पत्रकार उसे एक लाख बनाने में तुले हैं। और तो और, इन पत्रकारों में इतना तक दम नहीं है कि विनोद कापड़ी और साक्षी का नाम अपने अखबार में छाप सकें। उनके अपने मौसेरे भाई जो हैं ना। छाप दीजिए ना साक्षी को भेजे गये सारे एसएमएस। फिर सारे माहौल पर घुप्‍प धुंधलापन तो छन सके।

खैर, इस मसले को तो प्रेस काउंसिल में उठाया ही जाएगा। अदालत में जमानत और केस का निपटारा तो होगा ही ना। फिर वहीं निपट लिया जाएगा। कानूनन। वहां कम से कम प्रवीण कुमार जैसे लोगों की अदालत तो नहीं चलेगी जहां हर सफेद को काला ही साबित करने की साजिशें पूरी बेशर्मी के साथ रची जाती हैं।

तो, श्रीमान विनोद कापड़ी, साक्षी और प्रवीण कुमार जी। मैं यह कहना चाहता हूं कि अगर यशवंत जैसा शख्‍स दलाल है, तो मैं भी ऐसा दलाल बनूंगा। इतना ही नहीं, मुझे फख्र है कि यशवंत जैसा दलाल मेरा मित्र है। कम से कम मैं तुम जैसों तो नहीं हूं जो अपना टुच्‍चे स्‍वार्थों पर बिक ही नहीं, बल्कि घुटनों के बल लेट कर जमीन जीभ लपलपाते दीख जाते हैं।

तो, अब चलते-चलते एक जानकारी और। विनोद कापड़ी-साक्षी-प्रवीण कुमार बनाम यशवंत सिंह का मामला अब फेसबुक पर शुरू हो चुका है। नजीर है यह ताजा पोस्‍ट और उस पर कमेंट्स:

आर्यावर्त के रजनीश के झा ने फेसबुक में अनुरंजन झा की पोस्‍ट पर लिखा है कि इंडिया टी वी का प्रबंध संपादक और प्रबंध सम्पादक की नई नवेली पत्नी, मामला खुन्नस का हो सकता है मगर एस एम् एस का मामला संदेहपूर्ण बनाता है क्यूंकि एस एम् एस यशवंत के नुम्बर से ही किया गया है और जो यशवंत को जानते हैं वो ये जानते हैं कि यशवंत किसी भी नारी को कोई भी अश्लील एस एम् एस भेज सकता है. सेक्स के मामले में बीमार और मानसिक विक्षिप्त.

यह है अनुरंजन झा की पोस्‍ट: http://www.facebook.com/photo.php?fbid=10150863730742820&set=a.280864617819.149619.524252819&type=1&ref=nf

इस पोस्‍ट पर रजनीश झा की राय पर कमेंट करते हुए आईबीएन7 के अमित हिसारिया ने लिखा है कि अगर नई नवेली पत्नी हैं तो ऐसा भी हो सकता है कि पहले से कुछ रहा हो…यशवंत जी के पास उनका नंबर कहा से आया?

सरगुजा के पत्रकार अमित तोमर लिखते हैं कि पूरा मामला ही गलत है क्यों की जिस तरह का घटना क्रम दिख रहा है उस से यह प्रतीत हो रहा है की उन पर गलत मामला दर्ज कीया गया है और उन्हे फसाया गया

सहारा के पत्रकार शगुन त्‍यागी का कहना है कि यशवंत को फंसाया गया कापड़ी की निजी खुन्नस है

शगुन ही क्‍यों, इस पोस्‍ट पर ज्‍यादा लोगों का मानना है कि यशवंत सिंह को निजी खुन्‍नस में फंसाया गया है। मसलन समाचार प्‍लस के पंकज पंवार को सुनिये: yaswant ye nahe kar sakta lagta hai niji khoonas hai। दिल्‍ली के पत्रकार रूतिथ व्‍यास कहते हैं कि Yashwant ki griftari sahi nahi, we condem this action taken by the police. Where is we don’t know the real fact .hence what ever it may be the issue,both side personal should have resolve this by mutual dialouge.Here it does not look better where two media personalities are fighting with each other.

चैनल के पत्रकार साजिद अशरफ का कहना है कि ho sakta hai thodi sachhai ho…lekin maamle ko kaafi badha chadha kar banaya gaya lagta hai.yashwant ki baat bhi suni jaani chaahiye aur akhbaar men use bhi chhapa jaana chaahiye. —kyonki akhbaar ke sampaadak mahoday bhi doodh ke dhule nahin ho sakte…jab hamaam men sabhi nange hon.

इस पोस्‍ट पर मेरे कमेंट पर रजनीश झा लिखते हैं कि

सौवीर जी,
किसका सवाल किसका जवाब से बेहतर है की आप यशवंत को जानते हैं या नहीं, अनुरंजन जी शायद या जरूर जानते होंगे की यशवंत को जागरण से जूता मार कर क्यूँ निकला गया था, जागरण के बाद लाइव एम् में मार्केटिंग की नोकरी करने वाला यशवंत रंजन श्रीवास्तव ने इसे क्यूँ लाइव एम् से भगाया. जो यसवंत को जानते हैं वो जानते हैं की भड़ास का दलाल यशवंत ऐसे कार्यों में लिप्त रहा है गरचे बानगी यह की दलाली का शीर्ष मुकाम के बाद फिसलना तय होता है.

भड़ास ब्लॉग जब शीर्ष पर था तो क्यूँ भड़ास ब्लॉग का दूसरा संचालक स्व. रुपेश श्रीवास्तव ने इस दल्ले से कन्नी काटी थी. खैर इन सवालों से बेहतर है आप अपने जवाब के साथ संतुष्ट रहिये मगर इसमें कोई दो राय नहीं की वेब के माध्यम से मीडिया का शीर्ष दलाल आज सलाखों के पीछे है.

बरेली से झौव्‍वा भर वेब पोर्टलों की दूकान चलाने वाले सुशील गंगवार का कमेंट है कि दलालों का सरगना अब सलाखों के पीछे है। सुशील गंगवार

www.bhadasbook.com, www.mediadalal.com, www.writerindia.com, www.sakshatkar.com, www.pressvarta.com, www.writerindia.com, www.sakshatkartv.com, www.bollywooddalal.com जैसे पोर्टलों के संचालक हैं।

 

कुमार सौवीर
लो, मैं फिर हो गया बेरोजगार।
अब स्‍वतंत्र पत्रकार हूं और आजादी की एक नयी लेकिन बेहतरीन सुबह का साक्षी भी।
जाहिर है, अब फिर कुछ दिन मौज में गुजरेंगे।
मौका मिले तो आप भी आइये। पता है:-
एमआईजी-3, सेक्‍टर-ई
आंचलिक विज्ञान केंद्र के ठीक पीछे
अलीगंज, लखनऊ-226024
फोन:- 09415302520
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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

9 Comments

  1. गोरखपुर में ssp ने सभी thano और पुलिश वालो को ये आदेश दे रखह है की यदि कोई पत्रकार किसी भी मामले में कुछ भी गलत करता है तो उसके विरुध्हा तुरंत कार्यवाही किया जाय. अगर यही हाल रहा तो लोगो को पत्रकारिता करने में भी डर लगेगा .कितनी विडंबना की केंद्र के साथ साथ राज्य सरकारे भी एस मामले में कुछ भी नही कर रही है . शायद इसका प्रमुख वजह प्त्रकतो में एकजुटता का आभाव साफ देखा जा सकता है . और जब तक पत्रकारों का एक रास्ट्रीय स्तर पर एक असोसिएसन नही बन जाता ये रुकने का नाम नही लेगा और पत्रकारों का उत्पीडन लगातार होता रहेगा . संजय कुमार त्रिपाठी गोरखपुर

  2. आपको सादर नमन!

  3. Drhs Rawat says:

    1-yaswant ne paise vinod kapri se kyo mange wo bhi 20,000 – why.
    2-jab yaswant padha likha patrakar hai to sakshi ko mata ji kyo kaha- why.
    3-ek padha likha patrakar ham umra lady ko mata ji kyo bol raha hai- why.
    yaswant dudh ka dula nazar nahi aata aapke iss article m.

  4. प्रसासन को पहले ये भी देखना चाहिए!
    बात कुछ भी हो जब तक उसके तह तक आप नहीं जाते है!
    कुछ भी फैसला नहीं लिया जा सकता है!

  5. TC Chander says:

    तुम्हारा अंजाम यही हो सकता था, यशवंत.मैं पंजाबी हूँ. ऐसा कि खुद्दारी जिस में कूट कूट कर भरी है. जी में आया कि चंडीगढ़ पुलिस से उठवा कर इधर मंगवाऊँ और वो हाल करूं कि फिर कभी किसी को रात में फोन कर गरियाना भूल जाए. लेकिन मेरे घनिष्ठ मित्र दयानंद पांडेय आड़े आ गए. बोले, समझ लो वो दुनिया में है ही नहीं. क्या करोगे उसका जो खुद लिखता है कि मैं मांग के पीता हूँ, पी के गरियाता हूँ और फिर उन्हीं से पैसे लेकर अगले दिन दूसरों को गरियाने लगता हूँ…आज मैं महसूस करता हूँ कि अगर कुछ दिन मैंने उनके चंडीगढ़ की अदालतों या जेल में कटवा दिए होते तो शायद वे कापड़ी और उनकी पत्नी को तंग और ब्लैकमेल नहीं करते. उनके खिलाफ रपट नहीं होती, वे अंदर नहीं होते और भड़ास भी आज बंद नहीं होती.

    यशवंत की वो सारी मेल और एस.एम.एस. आज भी सुरक्षित हैं मेरे पास. उन्हें छाप कर अभी मैं न तो किसी की कोई मदद कर रहा हूँ, न बदला ले रहा हूँ. लेकिन वो सब मेरे ये मान लेने के लिए काफी है कि नीचता की किस हद तक यशवंत गिर सकते हैं और आप उनकी न मानें तो फिर आप के साथ बदतमीजी की किस हद तक जा सकते हैं. अपने अनुभव से मैं ये मान के चल रहा हूँ कि विनोद कापड़ी और उनकी पत्नी के साथ वे किसी भी हद तक गए होंगे. क्या कसूर है उनका? क्या ये कि उन ने प्रेम किया और शादी कर ली? पत्रकार के रूप में दोनों का गुनाह क्या है और उनके निजी जीवन में झाँकने का आपको हक़ क्या? आपको उनके किसी लिखे, कहे पे कोई आपत्ति नहीं है तो फिर आप उनको फोन, एस.एम.एस. कर ही क्यों रहे हो? कर रहे तो कैसे न मान लें कि उसके पीछे आपका कोई दुर्भाव नहीं रहा होगा. मार देने का न सही, पैसे मांगने का. पैसे जो आप को किसी भी कीमत पर चाहिए. सिर्फ अपनी साईट चलाने नहीं, खुद आपके मुताबिक़ दारू पीने, पिलाने और उस के अलावा अपने रिश्तेदारों के खिलाफ पुलिस कारवाई में मदद के लिए भी.

    पत्रकारिता के किन सरोकारों के लिए काम किया है आपने. कौन सा ऐसा धाँसू कांसेप्ट ले के आये आप कि पत्रकारिता जगत के दिन बहुर गए? आप किसी का भी हित नहीं सिर्फ साईट के हिट्स देख रहे थे. कभी किसी अख़बार या चैनल में संपादक छोड़ो, ब्यूरो प्रमुख तक की जिम्मेवारी निभाई नहीं आपने. न वैसी कभी कोई जिम्मेवारी, न सोच, न परिपक्वता, न प्रतिष्ठान की प्रतिष्ठा की कोई चिंता. पंजाबी की एक कहावत है कि भूखे की बेटी जैसे ही अमीर हुई तो लगी वो धूल उड़ाने. आप हर उस आदमी की उतारने लगे जो आप को लगता था कि आप से आगे निकल चुका है. ये 'भड़ास' शब्द का चयन भी आपकी उसी सहज प्रतिक्रिया का हिस्सा था. अंग्रेजी में 'भड़ास' को 'फ्रस्ट्रेशन' ही कहेंगे. आप वो निकालने लगे. गरियाने से लेकर, धमकाने और फिर किसी हद बेलगाम इस विधा वाले मीडिया की मिली आज़ादी को ब्लैकमेल कर सकने की सुविधा तक…..

    लिन्क: http://journalistcommunity.com/index.php?option=com_content&view=article&id=1653:2012-07-01-08-49-16&catid=34:articles&Itemid=54

  6. TC Chander says:

    बार-बार पति-पत्नी का यह फ़ोटो छापने का क्या मतलब है?

  7. Dinesh Chand says:

    media+police= crimes(under cover)/ false allegations on anyone.

  8. Viresh Singh says:

    midiya es desh ka cancer se bhi badi mimari hai sab ke seb bhast hai.

  9. Real picture and fttest reply to so called fighter of web media.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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