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योग गुरु के रूप में प्रसिद्धि पाने के बाद आयुर्वेदिक दवाओं के व्यवसाय में उतरे बाबा रामदेव जैसे-जैसे ख्याति पाते गये, वे नये-नये विवादों में भी घिरते गये हैं। प्रारम्भ में तो उनकी सराहना हुई कि उन्होंने भारतीयों को अपने स्वास्थ्य के बारे में जागरूक किया। उनके योग शिविरों में लोगों ने भारी-भरकम शुल्क देकर योग सीखा। इसके बल पर उन्होंने अपना बड़ा साम्राज्य स्थापित कर लिया।

अंग्रेजी दवाओं के खिलाफ उन्होंने बड़ा अभियान चलाया। इसे उन्होंने भारत की परम्परागत उपचार विधि पर हमला बताया। बाद में वे हरिद्वार के अलावा विभिन्न राज्यों में स्वयं के आयुर्वेदिक दवाओं के कारखाने खड़े करते गये तथा एक तरह से उनके पास हर बीमारी का इलाज मानों उपलब्ध था। वैसे तो उनके इलाज एवं दवाओं को प्रारम्भ से ही आधुनिक प्रणाली के लोग शंका की नज़र से देखते रहे हैं, परन्तु अपने प्रचार तंत्र और सत्ता से नज़दीकियों के कारण उनके खिलाफ कोई बड़ी कार्रवाई कभी नहीं की जा सकी।

अलबत्ता अब सुप्रीम कोर्ट में पतंजलि को कड़ी फटकार मिली है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) की ओर से दायर एक याचिका पर मंगलवार को सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने पतंजलि को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर उनके उत्पादों को लेकर किसी भी तरह के भ्रामक विज्ञापन जारी किये गये तो हर विज्ञापन पर 1 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया जायेगा।

शीर्ष कोर्ट ने पतंजलि आयुर्वेद को भविष्य में किसी भी तरह के भ्रामक विज्ञापन प्रकाशित करने से बचने की सलाह देते हुए यह भी कहा कि ऐसा प्रेस बयान भी न दिया जाये जिससे कोई भ्रम फैले। वैसे सुप्रीम कोर्ट की इस चेतावनी के बाद रामदेव ने यह आरोप लगाया कि पतंजलि के खिलाफ ड्रग माफिया द्वारा षड्यंत्र रचा जा रहा है। उन्होंने इस बात से इंकार किया कि वे कोई गलत प्रचार कर रहे हैं।

बुधवार को हरिद्वार में एक प्रेस वार्ता आयोजित कर रामदेव ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर पतंजलि कोई गलत प्रचार करेगा तो उस पर जुर्माना लगेगा। रामदेव ने मुख्य न्यायाधीश के समक्ष स्वास्थ्य लाभ लिये हुए मरीजों की परेड करने की भी चुनौती देते हुए कहा कि गलती करने पर वे एक हजार करोड़ रुपये का जुर्माना भरने व फांसी चढ़ने के लिये भी तैयार हैं।

रामदेव पहले तो योग करने-कराने में व्यस्त रहे लेकिन बाद में उन पर देश से भ्रष्टाचार खत्म करने का भूत सवार हो गया। वे एक दशक पहले हुए अन्ना हजारे के लोकपाल आंदोलन से जुड़ गये थे। उनकी लोकप्रियता ऐसी थी कि जब वे दिल्ली के रामलीला मैदान में चल रहे धरने में भाग लेने के लिये पहुंचे तो डॉ. मनमोहन सिंह की तत्कालीन कांग्रेस प्रवर्तित केन्द्र सरकार के कई वरिष्ठ मंत्री उन्हें लेने व मनाने पहुंचे थे। यह अलग बात है कि आंदोलन को खत्म करने के लिये जब लाठी चार्ज हुआ तो मंच से कूदकर भागने वालों में वे सबसे आगे थे। उनके अनुयायियों ने उन्हें महिला के कपड़े पहनाकर सुरक्षित निकाला था।

मनमोहन सिंह की सरकार को बदनाम करने में जिन लोगों का प्रमुख हाथ था उनमें रामदेव भी थे। उनका दावा था कि अगर विदेशों में भारतीयों का रखा कथित भ्रष्टाचार का पैसा वापस आ जाये तो पेट्रोल पानी के भाव से मिलेगा और हर गांव समृद्ध होगा। उनकी भारतीय जनता पार्टी से नज़दीकियां बढ़ती चली गयीं। बताया जाता है कि अनेक राज्यों में उन्हें दवा निर्माण के लिये फैक्ट्रियां लगाने के लिये बहुत सस्ते में जमीनें मिल गयीं। हालांकि उन पर आरोप है कि उनकी दवाएं अमानक होती हैं तथा बहुत से ब्रांड उन्होंने आऊटसोर्स कर दिये हैं। यानी वे खुद नहीं बनाते। यह जानकर कि उनके प्रति लोगों का विश्वास व श्रद्धा इतनी है कि वे किसी भी कीमत पर उनकी दवाएं खरीद लेंगे, पतंजलि के उत्पाद काफी महंगे होते हैं व देश भर में उनकी दवाओं की मांग है। अब रामदेव केवल दवा नहीं बनाते बल्कि खाद्य सामग्रियां, सौंदर्य प्रसाधन का उत्पादन भी करते हैं। विदेशी संस्कृति की आलोचना करने वाले, भगवा वस्त्रधारी रामदेव को जीन्स के परिधान बनाने से भी परहेज नहीं रह गया। उनके उत्पादों पर कई बार आपत्तियां उठाई गईं लेकिन सत्ताधीशों के समर्थन से उन पर आंच तक न आई। भ्रष्टाचार व महंगाई पर वे अब कुछ नहीं कहते।

कोरोना काल में भी रामदेव ने भ्रम फैलाने का कार्य किया। जब करोड़ों लोग आधुनिक तकनीकों से किए गए शोधों के आधार पर एलोपैथी प्रणाली के टीके व दवाओं से अपनी जान बचा रहे थे, रामदेव ने इसकी निरर्थकता का प्रचार करते हुए आनन-फानन में तैयार अपने उत्पादों को रामबाण बतलाते हुए उसे बड़े पैमाने पर बेचा।

आईएमए ने इस पर आपत्ति उठाई कि पर्याप्त शोध एवं आवश्यक अवधि तक प्रभाव देखे बिना पतंजलि अपनी कथित कोरोनारोधी दवाएं बेच रहा है। इस पर अपने समर्थकों, अनुयायियों एवं मुख्य धारा के मीडिया के जरिये एलोपैथी प्रणाली के खिलाफ उनके द्वारा अभियान ही छेड़ दिया गया। यहां तक कि संस्था को ईसाई बतलाया गया। उस दौरान उठे एलोपैथी बनाम आयुर्वेद विवाद का फायदा भी उन्होंने जमकर उठाया। परिणामस्वरूप कई लोगों ने एलोपैथी की बजाय पतंजलि के उत्पाद लेने प्रारम्भ किये।

योग से शुरू कर रामदेव की बनाई मल्टी-प्रोडक्ट्स वाली कम्पनी से किसी की दुश्मनी नहीं है। हर कोई अपना व्यवसाय कर सकता है लेकिन उसके लिये सभी आवश्यक नियमों का पालन ज़रूरी है। विशेषकर लोगों को भ्रमित कर अपना व्यवसाय करना सामाजिक हितों के खिलाफ है क्योंकि अमानक दवाएं हों या खाद्य सामग्रियां, वे जानलेवा होती हैं।

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