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Tag: फेसबुक

राहुल के बयान से फेसबुक गरमाया…

 दागी सासंदों और विधायकों पर सरकार द्वारा लाये गए अध्यादेश को राहुल गाँधी द्वारा बकवास और फाड़ दिए जाने के काबिल बताये जाने के बाद सोशल मीडिया पर राहुल और कांग्रेस को लेकर चर्चायें शुरू हो गयी हैं फेसबुक पर पत्रकारों से लेकर पेशेवर लोगों ने राहुल के बयान को अपने अपने नज़रिए से देखा है. पेश हैइस सिलसिले में फेसबुक पर हुई कुछ पोस्ट्स..

वरिष्ठ साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता मोहन श्रोत्रिय कहते है कि

राहुल किसके तुरुप के पत्ते निकले?rahul-maken

अपनी पार्टी और सरकार की भट्टी बुझाने का काम बेशक कर दिया हो उन्होंने, इसका कोई खास लाभ तो मिलता दिखता नहीं, कांग्रेस को ! ऐसा हो सकता है क्या कि जब अध्यादेश राष्ट्रपति के पास भेजा गया, तब तक उन्हें पता ही न हो कि कहां-क्या चल रहा है !

मंत्रियों-संतरियों-प्रवक्ताओं सब के चेहरे पीले पड़ ही गए होंगे !?!

जैसा यह लग रहा है. कहीं उससे बड़ा तो नहीं है यह खेल? मनमोहना बोलेंगे कुछ, मक्का (अमरीका) से लौटकर?

पता नहीं !

वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द कुमार सिंह अरविन्द कुमार ने भी फेसबुक पर अपने विचार कुछ इस तरह रखे हैं..

राहुल का विरोध स्वागत योग्य

दागी नेताओं के मसले को लेकर राहुल गांधी ने निजी रूप में ही जो प्रतिक्रिया दी है, उससे भूचाल आना स्वाभाविक है…सार्वजनिक जीवन में नेता का बयान हो या कुछ और वह निजी नहीं होता…राहुल ने साहस के साथ इसका विरोध किया है..इसका स्वागत होना चाहिए…इसका उनको राजनीतिक लाभ मिलता है या हानि होती है, .यह समय बताएगा लेकिन मनमोहन सिंह सरकार इसे लेकर कठघरे में जरूर खड़ा हो गयी है…इसी बयान से यह संकेत भी मिल रहा है कि राहुल अब परिपक्व राजनेता बनने की ओर हैं..यह माना जा सकता है कि अगर वो अपनी चौकड़ी से बाहर आकर बोलेंगे तो ऐसा ही बोलेंगे और कुछ कड़े फैसले ले सकते हैं…लेकिन फिर कोटरी का क्या होगा….क्योंकि जब वो इसका विरोध कर रहे थे तो सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी और वी.नारायण सामी इसका समर्थन कर रहे थे…मैं उस मौके पर मौजूद था…नारायण सामी मिठाई खा रहे थे जब उनको किसी ने राहुल गांधी के बयान की जानकारी दी तो लगा जैसे करेला खा लिया है..

बहरहाल लिखते लिखते खबर मिली है कि दिग्गज राजनेता और लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने भी राहुल गांधी के इस बयान का स्वागत किया है…मैं जानता हूं कि दागी राजनेता के रूप में चिन्हित किए जा रहे तमाम लोग अपराधी नहीं हैं औऱ राजनीतिक दुश्मनी के तहत उन पर मामले दर्ज होते हैं…लेकिन जो अपराधी हैं वे अज्ञात नहीं है…दोनों के बीच फर्क को सुनिश्चित करने का रास्ता भी निकालना चाहिए…

वहीँ, वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा लिखते हैं कि अध्यादेश की कापी फाड़ने का ये ड्रामा बंद करो . सब कुछ तुम्हारे हाथ में है . रद्द करवाओ उसे , अगर इतना ही बुरा लग रहा है तो . पब्लिक को अपनी तरह भोंदू न समझो . वह सब जानती है.

तो आईआईटीयन वीएस रावत ने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा है कि राहुल गाँधी ने कैबिनेट द्वारा स्वीकृत किए गए “अपराधियों के चुनाव लड़ने के क़ानून के संशोधन” को “पूरी तरह बकवास” बताया, और कहा इस ऑर्डनेन्स को फाड़ कर फेंक देना चाहिए।”

यह कथन कांग्रेस की समग्र नीतियों से इतना अधिक अलग है कि यह किसी भाषण लिखने वाले का लिखा, राजमाता स्वीकृत कथन नहीं लग रहा है मुझे।

यह राहुल गाँधी का अपना कथन है।

बहुत अच्छी शुरुआत है, राहुल।

तुम साबित कर रहे हो कि तुम मंदबुद्धि चाहे हो, लेकिन तुम मंद-नैतिकता वाले नहीं हो।

सैल्यूट्स।

अब कांग्रेस जवाब दे।

इसी तरह वृन्दावन में गरीब बच्चों को निशुल्क शिक्षा प्रदान करने में लगे पूर्णेंदु ने पोस्ट किया है कि मैं राहुल गाँधी के बयान का स्वागत करता हूँ. इसका मतलब ये कदापि नहीं है की मैं कांग्रेसी हो गया मैं ना किसी पार्टी में था ना हूँ हां अगर कोई पार्टी कोई अच्छी बात करती है तो उसकी बात का समर्थन जरूर करता हूँ अगर कोई पार्टी धार्मिक गुरुओ की दुकान बन्द करने की बात करेगा जिस तरह से निर्मल बाबा या कुमार स्वामी या आसाराम जैसे लोग इलेक्ट्रानिक मीडिया या प्रिंट मीडिया के माध्यम से लोगो को मूर्ख बनाते है तो में उसका पूरा समर्थन करूँगा.

दिल्ली विश्वविद्यालय के वरिष्ठ शिक्षक आशुतोष कुमार ने अपनी फेसुक वाल पर लिखा है कि

”भारत माता के (कागजी ) शेर ” का मुकाबला करने के लिए राहुल बाबा के सलाहकारों ने ‘एंग्री यंग मैन’ वाला पुराना चोला निकाला है , जो पिछले यूपी चुनाव में ही तार- तार हो गया था. दाढी फिर उग आई है . आस्तीनें चढाने की अदा लौट आई है . ‘फाड़ दो , फेंक दो ‘ वाला वही पुराना पिटा हुआ डायलॉग भी हाजिर हो गया है . जैसे अचानक सोये से जाग कर कोई पुकारे – ये किसने …..हमारी नींद में ख़लल डाली . इस नवजागरण के लिए भी पीएम् के विदेश जाने का इंतज़ार था? प्रेस कान्फरेन्स के अलावा गुस्सा जताने का और कोई तरीका नहीं था ?
एंग्री रौंग मैन जी , आपने अपने ही पीएम् और पार्टी की इज्ज़त फाड़ कर हवा में फेंक दी ? पता नहीं मनमोहन सिंह में कितना आत्मसम्मान बचा है . कायदे से तो आते ही हाईकमान के मुंह पर दे मारना चाहिए इस्तीफा .
जैसे पार्टी -आधारित लोकतंत्र को बिगबौस के घर में बदल देने का कम्पटीशन चल रहा हो मोदी और राहुल में .
इतना छोटा देश नहीं है कि कुँए और खाई के बीच चुनने की मजबूरी हो . देश अपना रास्ता निकाल लेगा , आप दोनों अपने रस्ते जाओ जी .

 

निहत्थों और निर्दोषों को ना मारो…

जहाँ एक तरफ मुजफ्फरनगर दंगों को लेकर अपने अपने राजनैतिक हित साधने के लिए कुछ राजनेता देश भर में कट्टरपंथी धार्मिक भावनाएं भड़काने में लगे हैं वहीँ सोशल मीडिया पर देश के जिम्मेदार नागरिक सक्रिय हो गए हैं तथा सबसे अनुरोध कर रहे हैं कि कट्टरपंथियों के बहकावे में न आयें और अपने विवेक का इस्तेमाल कर भारत के गंभीर और जिम्मेदार नागरिक होने का परिचय दें. हमने फेसबुक पर पोस्ट की गयी ऐसी ही अपीलों को इस पोस्ट में समाहित किया है…

-नितिन ठाकुर||

एक-दूसरे का घर जला रहे बेवकूफों,खुद लगाई इस आग पर पानी डालो. अगर ये आग और भड़की तो किसे-किसे जलाकर खाक कर देगी तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं. आग लगाना तुम्हारे हाथ में है लेकिन भड़की आग पर काबू पाने का दम तुम्हारे बाप में भी नहीं है. अगर ये लड़ाई हिंदू और मुसलमान की मानकर लड़ रहे हो तो फिर मैदान में पाला खींचकर एक-दूसरे पर टूट पड़ो मगर निहत्थों और निर्दोषों को ना मारो. बेचारी औरतों पर ना टूट पड़ो. गरीबों के घर ना लूटो. जिनके दम से तुम दंगे कर रहे हो उन्हें ब्लैक कैट कमांडो मिले हुए हैं,बंगलों के बाहर एंबुलेंस लगी हैं और फायर ब्रिगेड का पानी उन्हीं की सुविधा के लिए है. उनका कुछ ना बिगड़ेगा..अपना सब कुछ तुम खो बैठोगे.

अब मुझे वाकई डर लग रहा है..मेरठ के दंगे याद आ रहे हैं..फिर से जले शरीर आंखों के सामने घूमने लगे हैं..वीरान गलियां ज़हन में खौफ पैदा कर रही हैं. समझ नहीं आ रहा कि मैं क्या करूं..यहां बैठा बेबस महसूस कर रहा हूं..वाकई.muzaffarnagar violence

-राकेश श्रीवास्तव||

सर्व धर्म संभाव मार्का धर्मनिरपेक्षता की कब्र पर पनपी साम्प्रदायिकता बड़ी ज़हरीली साबित हो रही है .. दिल्ली से ऐसी धर्मनिरपेक्षता ‘राजधर्म’ का आह्वान करती रह जाती है और गुजरात कब्र बनता रहता है .. उसी तरह उत्तर प्रदेश में तत्कालीन शाषकों के तथाकथित सर्व धर्म समभाव के फ्रेम वर्क में इस्लामी कट्टरवाद पनाह पाता है … हिन्दू कट्टरवाद तो सभी दलों में राजनीतिक सामाजिक यथास्थितिवाद के साये तले पलता ही है … राजनीति में शुद्ध और कठोर धर्मनिरपेक्षता का कहीं पता नहीं … प्रशाषण में कानून के शाषण की संभावनाओं को गुजरात के कई अधिकारियों या उत्तर प्रदेश में दुर्गा शक्ति नागपाल आदि के रूप में किनारे कर दिया जाता है ..

-मोहम्मद अनस||

दंगों की आग में उत्तर प्रदेश को झुलसा देने वाली सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी और विपक्ष में अमित शाह जैसे हत्यारे जिसे सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली है और जिसकी जमानत रद्द करवाने की अर्जी देने की ज़िम्मेदारी कांग्रेस पर बनती है पर उसने ऐसा नहीं किया.

इन तीनो राजनैतिक दलों को कौन कौन वोट नहीं देगा और गाँव समाज में लोगों को इनकी सियासत से परिचित करवाएगा ?

हमें लखनऊ में मूर्तियाँ मंजूर हैं पर प्रतापगढ़, मसूरी, फैजाबाद और मुजफ्फरनगर जैसे जिलों में जिंदा लोगों की लाशें नहीं.

-अंकित मुत्रिजा||

उत्तर-प्रदेश के मुजफ्फरनगर में साम्प्रदायिक हिंसा अपने चरम पर हैं. ऐसे में कौन ग़लत – कौन सहीं की जगह हमें इंसानी जानों की सलामती की दुआँ करनी चाहिए. प्रदेश की कमान ऐसे निक्कमों के हाथ सौंपने पर संवेदनशील और अमनपरस्त आवाम जरूर दुखी होगी. साम्प्रदायिक ताक़ते राजनीतिक नफ़े की खातिर पूरे प्रदेश के अमन-चैन को नफ़रतों की भट्टी में फूंकने पर आमादा हैं. और उत्तर प्रदेश को निरूत्तर प्रदेश में तब्दील कर देने वाली प्रदेश की कलेश सरकार क्या मूकदर्शक बनकर सब देखने के लिए ही चुनी गई थी जो पिछले चौबीस घंटे से साम्प्रदायिक हिंसा का तांडव जारी हैं. लोगों को चाहिए कि वो साधारण और सतही समझ से बचकर भूल से भी किसी की भावनाओं को न भड़काएं. मौजूदा सरकार के सत्ता में आने के बाद से तकरीबन 27 मर्तबा नफ़रतों की आग जली ज़ाहिर तौर पर जिस आग में उन सभी ने सुकून से हाथ तापें जिनका मकसद ही आवाम को एक दुसरे के खून का प्यासा बनाकर खुद के हित साधना हैं.

विद्यार्थियों ने नरेन्द्र मोदी को ‘युवा नेता’ के रूप में नकारा…

-नचिकेता देसाई||

ट्विटर, फेसबुक सहित न्यू मीडिया के सभी हथकंडे अपनाने के बाद भी प्रधानमंत्री पद का ख्याली पुलाव पकाने वाले नरेंद्र मोदी को महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी के छात्रों ने ‘युवा नेता’ मानने से इनकार कर दिया और हाल ही में हुए छात्र संघ के चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के सभी प्रत्याशियों को हार की धूल चटा दी.narendra-modi

विद्यार्थी परिषद् ने छात्र संघ के चुनाव में अपने प्रत्याशियों के प्रचार के लिए यूनिवर्सिटी कैंपस की दीवारों को मोदी की फोटो वाले पोस्टरों से पाट दिया गया था. साथ ही ट्विटर और फेसबुक के फर्जी पेज और अकाउंट बना कर युवक युवतियों को आकर्षित करने का जोरदार प्रयास किया था. इसके बावजूद छात्र संघ के सभी पदों के लिए हुए चुनाव में परिषद् के प्रत्याशियों को मुंह की खानी पड़ी. बल्कि दस साल में विद्यार्थी परिषद् को छात्र संघ चुनाव में पहली बार हार का सामना करना पड़ा.

इस हार की शर्मिंदगी के बाद यूनिवर्सिटी परिसर में लगे मोदी के सारे पोस्टर्स और बैनर्स तुरंत हटा लिए गए.

एक पाती जो राजेंद्र यादव न छाप पाए…

अपनी उदारता के तमाम दावों के बावजूद राजेंद्र यादव ऐसा कुछ नहीं छापते जो उनकी छवि न चमकाता हो.. यह पत्र भी वह नहीं छाप पाए…

-शैलेन्द्र चौहान||

आदरणीय राजेंद्र जी,

अभिवादन !

मैं सदैव ही आपके कुछ विशेष तरह के विचारों का कटु आलोचक रहा हूँ। यद्दपि मैं आपका, वरिष्ठ लेखक के नाते पूरा सम्मान करता हूँ  पर मैं व्यक्तिपूजा और चाटुकारिता में विश्वास नहीं रखता। मुझे यह देख कर सुखद आश्चर्य हुआ कि इस बार के हंस में (जून ‘१३) सम्पादकीय से लेकर अन्य सामग्री तक स्त्रियों की देहमुक्ति को छोड़कर उनके प्रति एक गहरी संवेदना और सदाशयता के साथ प्रस्तुत हुए हैं। इस हेतु मैं आपको बधाई देना चाहूँगा। अपने सम्पादकीय में स्त्रियों के प्रति निर्दयता का विश्लेषण करते हुए आप लिखते हैं- ‘इस हिंसा की जड़ें उन परिवारों में हैं जिनकी बनावट आज भी सामंती है।’ यह सही है मगर यह पूरी तरह वस्तुगत विश्लेषण नहीं है।Rajendra_Yadav

क्या आज समाज के जिस वर्ग और चरित्र के लोग ये दुष्कृत्य कर रहे हैं वे मात्र सामंती परिवेश के हैं या इस क्रूर और बेलगाम आवारा पूँजी की चकाचौंध भी उसमें है? दूसरा क्या इस देश की राजनीतिक बनावट भी इसके लिए जिम्मेदार नहीं है? आजादी के पैंसठ वर्षों बाद में इन राजनेताओं ने समाज को उन्नत, जागरूक तथा सम्वेदनशील बनाने के लिए क्या रंचमात्र भी प्रयत्न किये हैं? उपनिवेशवाद का सामंत वाद से बाकायदा गठजोड़ था। उसी तरह  आज पूंजीवाद का भी उसके साथ गठजोड़ है। आज का समाज शुद्ध सामंती नहीं है वह पूँजी और उपभोग वस्तुओं की चकाचौंध का भी मारा हुआ है। वह सिर्फ दौलत बटोरने में (कमाने में नहीं) विश्वास रखता है, वह फिर चाहे जैसे भी हो। यह सामंती मूल्य नहीं है। दौलत बटोरने के बाद ऐय्यासी और एडवेंचर उसके शौक बन गए हैं। विज्ञापन उस पर और आग में घी का काम कर रहे हैं।  घर में प्रयोग होने वाली सामान्य वस्तुओं से लेकर खास किस्म के प्रोडक्ट को भी आज स्त्री विज्ञापनों के ज़रिए प्रोमोट किया जा रहा  है।  साबुन, शैम्पु, हैंडवाश, बर्तन, फ़िनाइल, डीओ, तेल, विभिन्न तरह के लोशन, क्रीम, टॉयलेट क्लीनर से लेकर पुरुषों के दैनंन्दिन प्रयोग की चीज़ों के विज्ञापनों में भी सुंदर एवं आकर्षक स्त्री दिखाई देती हैं। पुरुषों के अंर्तवस्त्रों या डीओड्रेंट्स के विज्ञापनों में तो अधनंगी स्त्रियां पुरुषों के साथ एक खास किस्म के कामुक जेस्चर में प्रेज़ेंट की जाती हैं। इसका उद्देश्य होता है, स्त्रियों के कामोत्तेजक हाव-भाव और सम्मोहक अंदाज़ के ज़रिए पुरुष दर्शकों को टारगेटेड विज्ञापन के प्रति आकर्षित करना और उस निश्चित ब्रांड के प्रति दर्शकों के रुझान को बढ़ाना जिससे वे उसे जल्द खरीदें।

यह देखा गया है कि खास किस्म के विज्ञापनों में भी स्त्री-शरीर के ज़रिए विज्ञापनों को प्रमोट किया जाता है। मसलन् मोटापा कम करने या कहें ‘स्लिम-फिट’ होने के विज्ञापन मुख्यतः स्त्री-केंद्रित होते हैं। चाहे यह विज्ञापन मशीनों द्वारा वज़न कम करने का हो या रस और फल-सेवन के उपाय सुझाने वाला लेकिन हमेशा स्त्री-शरीर ही निशाने पर रहता है। इसमें एक तरफ ज़्यादा वज़न वाली अधनंगी (बिकिनी पहनी) स्त्री पेश की जाती है तो दूसरी तरफ स्लिम-अधनंगी स्त्री। एक तरफ ज़्यादा वज़न वाली के खाने का चार्ट दिखाया जाता है तो दूसरी तरफ कम वज़न वाली का। फिर दोनों की तुलना की जाती है कि किस तरह कम वज़न वाली स्त्री मशीन के प्रयोग से या कम सेवन कर आकर्षक, कामुक और सुंदर लग रही है, दूसरी तरफ अधिक वज़न वाली स्त्री वीभत्स, अ-कामुक और कुत्सित लग रही है। इसलिए फलां फलां चीज़ सेवन करें या फलां मशीन उपयोग में लाएं ताकि आप भी आकर्षक और कामुक दिख सकें।

आजकल फेसबुक जैसे सोशल मीडिया साइट्स में भी इस तरह के विज्ञापनों का खूब सर्कुलेशन हो रहा है। इस तरह के विज्ञापनों की  स्त्री को अपमानित करने और वस्तु में रुपांतरित करने में बड़ी भूमिका है। मध्यवर्ग की कुछ स्त्रियां इन विज्ञापनों से प्रभावित भी होती हैं। वे या तो मशीन का उपयोग करने लगती हैं या फिर डाइटिंग के नुस्खे अपनाती हैं। इससे स्पष्ट होता है कि विज्ञापन केवल स्त्री-शरीर ही नहीं स्त्री-विचार पर भी हमला बोलता है। वह तयशुदा विचारों को लोगों के दिमाग में थोपता है और इसमें खासकर स्त्रियां निशाने पर होती हैं।

यह विज्ञापनों का स्त्री-विरोधी या पुरुषवादी रवैया ही  है जो स्त्री की व्यक्तिगत इच्छाओं और आकांक्षाओं पर हमला करता है। स्त्री के शरीर को केंद्र में रखकर स्त्री को स्लिम होने के लिए प्रोवोक करना कायदे से उसे पुरुष – भोग का शिकार बनाना है। स्त्री के ज़ेहन में यह बात बैठाई  जाती  है कि अगर वह स्लिम होगी तो वह मर्दों को आकर्षित कर पाएगी। स्त्रियों में विज्ञापनों के ज़रिए यह भावना  पैदा की जाती  है कि वो अपने फ़िगर को आकर्षक बना सकती हैं।विज्ञापन स्त्रियों के उन्हीं रुपों को प्रधानता देता है जो शरीर के प्रदर्शन से संबंध रखता है, उसकी बुद्धि और मेधा के विकास से नहीं, उसकी पढ़ाई से नहीं, उसकी सर्जनात्मकता से नहीं, उसकी अस्मिता से नहीं।  धीरे-धीरे स्त्री अपनी स्वायत्त इच्छाओं के साथ-साथ अपना स्वायत्त व्यक्तित्व तक खो देती है और हर क्षण पुरुषों की इच्छानुसार परिचालित होती रहती है। अंततः स्त्री ‘व्यक्ति’ की बजाय पुरुषों के लिए एक मनोरंजक ‘वस्तु’ या ‘भोग्या’ बनकर रह जाती है। दूसरी तरफ राजनीति  है, आप कृपया यह बताएं कि कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी किसकी है ? यदि अपराध रुक नहीं रहे हैं तो उसके लिए क्या सिर्फ समाज या अपराधी जिम्मेदार हैं या व्यवस्था की भी कोई भूमिका है ? अपराधियों को खुली छूट किसने दे रखी है ? क्या यह राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी नहीं है ? क्या यह प्रशासनिक संवेदनहीनता नहीं है ? पुलिस किसके इशारों पर प्रभावशील अपराधियों को छोड़ देती है उनके खिलाफ शिकायत दर्ज नहीं करती ? अपराधियों के साथ गैर जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारियों, नेताओं और सचिव स्तर के अधिकारियों को उनकी अक्षमता के लिए सजा क्यों नहीं दी जाती ? क्यों अपराधों पर उन्नत सूचना तकनीक द्वारा निगरानी नहीं रखी जाती ? क्यों हो हल्ला और शोरशराबा होने पर ही सरकार और प्रशासन की नींद खुलती है ? इन प्रश्नों पर भी जन हित में विचार आवश्यक है. भारतीय नागरिक कदम कदम पर अपमानित होता है क्या इसी लोकतंत्र के लिए हमने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी थी, इतने बलिदान दिए थे ?

अब एक बात और भारत की न्याय व्यवस्था जो राजनीतिक और व्यवसायिक मामलों में अपनी अति सक्रियता के लिए जानी जाने लगी है उसकी बानगी देखें-छत्तीसगढ़ में सोनी सोढ़ी नाम की आदिवासी महिला को पुलिस ने अक्टूबर 2011 से माओवादियों के संदेशवाहक होने के नाम पर बंद कर रखा है।

सोढ़ी ने सुप्रीम कोर्ट के सामने ये इल्ज़ाम लगाया है कि पुलिस हिरासत में उनके साथ बलात्कार किया गया और उनके गुप्तांगों में पत्थर की टुकड़ियां घुसेड़ी गईं।

ऐसे सभी लोग जो इन स्थितियों से गुजरे हैं वे सभी पीड़ित न्याय मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं। उधर मीडिया की भूमिका आग में घी डालने के समान रही  है, टीआरपी बढ़ाने के लिये टीवी चैनल किसी भी घटना को कलर फुल एवं सनसनीखेज  बना देते  है और उसे चौबीसों  घंटे  धुनते  रहते  हैं । आसाम में एक लड़की को एक प्रभावशाली मीडिया मालिक के इशारे पर  सरे आम बेईज्ज़त किया जाना इसका भयानकतम उदहारण है। सूचना व संवाद की तमाम साधन संपन्नता के बाजवूद हम अपनी जनचेतना को बुध्दि संपन्न या उर्जा संपन्न नहीं मान सकते क्योंकि आज हमारा समाज नायक विहीन है। तमाम विकृतियों, विसंगतियों एवं कमजोरी के बाजवूद हमारे बीच चेतना के सकारात्मक स्वर भी मुखरित होते रहे हैं। असंगठित मजदूर व किसान अपनी बात कहे तो किससे कहे? जन जब दम तोड़ता नजर आये, जब जीवन के आदर्श अपना मूल्य खोने लग जायें, भारतीय संस्कृति  का वर्तमान जब त्रिशंकु की भूमिका में हो तब  जनांदोलनों की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है।

खैर यह तो रहीं सम्प्रति स्थितियां परन्तु मूल प्रश्न यह है कि क्या व्यवस्था परिवर्तन के बगैर अपराध रोके जा सकते हैं और सामाजिक जीवन में गुणवत्ता आ सकती है?

आपका,

शैलेंद्र चौहान

फेसबुक पर संभलकर करें पोस्ट, अश्लील या आपत्तिजनक पोस्ट दिखा सकती है हवालात…

यूपी पुलिस महानिदेशक के आदेश पहुंचे हर जिले के एसएसपी आफिस…

फेसबुक पर किसी के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी करने से पहले यह ध्यान रहे कि आप पुलिस की नजर में हैं. एक गलती भारी पड़ सकती है. प्रोफाइल ब्लाक होने के साथ ही आपको जेल भी हो सकती है.Facebook (1)

दरअसल फेसबुक व अन्य सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर देश-प्रदेश की राजनीतिक हस्तियों, मंत्री-विधायकों के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां व अश्लील संदेश पोस्ट किए जा रहे हैं. धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाले संदेश भी पोस्ट हो रहे हैं. उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक ने ढेरों ऐसी शिकायतें मिलने के बाद प्रदेश के सभी एसएसपी/एसपी को पत्र लिखकर पुलिस को फेसबुक समेत अन्य प्रचलित सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर नजर रखने के निर्देश दे दिए हैं. ऐसे लोग जो अश्लील या आपत्तिजनक पोस्ट करते हैं, उनके प्रोफाइल/पेज को ब्लाक कराने के लिए आवश्यक कदम उठाएं. पुलिस महानिदेशक ने कहा है कि जिलों में गठित साइबर सेल, फेसबुक के साथ गूगल व अन्य सर्च इंजन पर भी नजर रखें.

पुलिस महानिदेशक ने जिलों के पुलिस अधिकारियों को भेजे पत्र में आपत्तिजनक टिप्पणी करने वालों के पेज/प्रोफाइल ब्लॉक कराने के बाबत महत्वपूर्ण जानकारियों से भी अवगत कराया है. पत्र में पुलिस महानिदेशक ने कहा है कि जिस भी यूजर के पेज पर अश्लील सामग्री मौजूद है, उसके पेज की पूरी जानकारी लेने के बाद उसे स्कैन कराएं. धारा 91 के तहत राजपत्रित अधिकारी की नोटिस सहित सील तैयार करें. नोटिस में उक्त आपत्तिजनक वस्तु नत्थी कर स्कैन कराएं और फेसबुक की अधिकृत वेबसाइट पर ई-मेल करें.

(एजेंसी)

नमो और कांग्रेस की सोशल मीडिया पर जूतमपैजार…

-सुग्रोव्रर||

जैसे जैसे लोकसभा चुनाव करीब आ रहे हैं, राजनैतिक दलों की प्रचार गतिविधियाँ बढ़ती चली जा रही हैं. राजनेताओं द्वारा मतदाताओं को गुमराह किये जाने वाली हरकतें कोई नई बात नहीं है,  लेकिन इस बार तो इन नेताओं ने सभी सीमायें लाँघ दी है. लोकसभा चुनावों के मद्दे नज़र इस बार यह राजनैतिक दल सोशल मीडिया पर भी सक्रिय हो गए हैं और खालिस झूठ, फरेब और ब्लैक हैट तौर तरीकों से सोशल मीडिया पर गन्दगी फैला रहे हैं.fenku express

अपने सैंकड़ों वेतनभोगी कर्मचारियों के ज़रिये भारत में सोशल मीडिया का उपयोग सबसे पहले अरविन्द केजरीवाल ने शुरू किया और सोशल मीडिया पर सक्रिय युवाओं के भीतर भ्रष्टाचार के खिलाफ सुलगती हुई चिंगारियों को भड़का कर धधकती आग में तब्दील कर दिया, नतीज़न देश का युवा जन लोकपाल के समर्थन में फेसबुक और ट्विटर पर खुल कर सामने आ गया. यही नहीं जब अन्ना हजारे ने जन्तर मंतर पर अनशन शुरू किया तो देशभर के एनजीओ’ज़ के अलावा सोशल मीडिया पर सक्रिय यह युवा भी सडकों पर उतर आया. अरविन्द केजरीवाल ने भी फेसबुक पर बहुत गंद फैलाया था. जो भी फेसबुक यूजर टीम केजरीवाल के तौर तरीकों का विरोध करता था, केजरीवाल के वेतनभोगी सामूहिक रूप से उस यूजर पर टूट पड़ते थे, उन्हें भ्रष्टाचारी का तमगा ही नहीं मिलता था बल्कि उसकी माँ-बहन से अपने रिश्ते जोड़ कर उसे चुप करवाने की कवायद शुरू हो जाती थी.  आलम यह था कि जो अरविन्द केजरीवाल के तौर तरीकों का समर्थक नहीं, वह देशद्रोही और भ्रष्टाचारी करार दे दिया जाता था टीम अन्ना द्वारा. टीआरपी के चक्कर में नम्बर एक कहे जाने वाले न्यूज़ चैनल आजतक से लेकर छुटभैया न्यूज़ चैनल्स भी टीम अन्ना को चौबीसों घंटे स्क्रीन पर दिखा रहे थे. जिसके चलते टीम अन्ना के हौंसले कुछ अधिक ही बुलंद हो गए थे.

केजरीवाल को फेसबुक पर मिलती सफलता ने बाबा रामदेव को उकसाया और बाबा ने भी अपनी टीम फेसबुक पर उतार दी. बाबा रामदेव ने सबसे पहले फेसबुक पर दिवंगत राजीव दीक्षित को फैलाया तथा सच्चा देशभक्त साबित किया. वाकपटु राजीव दीक्षित के वीडियो यूट्यूब पर अपलोड करवाए गए और उन्हें फेसबुक पर पोस्ट किया जाने लगा. राजनेताओं और सत्ताधीशों की तुष्टिकरण की नीति से परेशान युवा राजीव दीक्षित के  राष्ट्र भक्ति और स्वदेशी समर्थक वीडियो देख देख कर राजीव दीक्षित का मुरीद हो गया और बाबा रामदेव की दवाइयों और नुस्खों का प्रचार करने लगा. यहाँ तक कि जो राजीव दीक्षित खुद कैन्सर जैसी बीमारी का शिकार होकर असमय काल के ग्रास बन गए, उसी राजीव दीक्षित द्वारा बाबा रामदेव के  कैन्सर से छुटकारा दिलाने के नुस्खों पर बनाये गए वीडियो को फेसबुक पर यह जाने बिना पोस्ट करने लगे कि राजीव दीक्षित ने इन नुस्खों पर विश्वास कर अपनी जान गँवा दी थी और यदि कोई अन्य कैंसर का रोगी इन नुस्खों पर भरोसा जता बैठा तो उसकी भी जान पर बन सकती है.

तब तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और नमो ने भी अपनी साइबर टीम खड़ी कर दी थी और फेसबुक का हर पन्ना हिंदुत्व, नरेन्द्र मोदी के नाम, फोटो और कारनामों से भर गया. हर तरफ फोटोशॉप पर बनाई गई उलटी सीधी तस्वीरों से फेसबुक अट गई. टीम केजरीवाल हो या टीम रामदेव या फिर टीम आरएसएस और नरेन्द्र मोदी, फेसबुक पर इन सबकी टीम का रवैया लगभग एक सा ही रहा कि जो भी उनका किसी भी तरह का विरोध करे या अपने निष्पक्ष और स्पष्ट विचार अपनी वाल पर पोस्ट करे, उस पर आक्रमण करो, गालियाँ दो, कुतर्क करो और यदि इसके बाद भी वह विरोध करे तो उसकी फेसबुक प्रोफाइल की सामूहिक रिपोर्ट करो ताकि वह फेसबुक यूजर बैन हो जाये.

फेसबुक पर इस तरह के आक्रामक अभियान से इन सबने बहुत से समर्थक भी बटोरे मगर ऐसी गंद फैलाती गतिविधियों को देख कई सामान्य यूजर चुप ही रहे और किसी विवाद का हिस्सा बनने की बजाय अपने मित्रों और रिश्तेदारों तक सीमित हो गए. लेकिन सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही यह गन्दगी थमी नहीं है बल्कि जैसे जैसे चुनाव करीब आ रहे हैं वैसे वैसे यह गंदगी अपना विकराल रूप धारण करती जा रही है. फेसबुक पर अफवाहों, असत्य तथ्यों और गाली गलोच का बाज़ार गर्म है. यहाँ तक कि एतिहासिक तथ्यों को बदलने का प्रयास चल रहा है.

नरेन्द्र मोदी द्वारा हैदराबाद रैली में इस्तेमाल किये गए अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के जुमले “यस, वी कैन, वी विल डू” को टीम आरएसएस और नरेन्द्र मोदी स्वामी विवेकानंद का जुमला साबित करने पर उतारू हो गई है. जबकि सत्य कुछ और ही है. स्वामी विवेकानंद द्वारा अमेरिका के शिकागो शहर में दिए गए पूरे व्याख्यान में “यस, वी कैन, वी विल डू” है ही नहीं. स्वामी विवेकानंद द्वारा शिकागो की धर्म संसद में दिए गए  व्याख्यान का शब्दानुशः पाठ इस  लिंक में पढ़ा जा सकता है.

स्वामी विवेकानंद का शिकागो में दिया गया व्याख्यान पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें..

इसके अलावा किसी अन्य की आवाज में इस वीडियो में इस व्याख्यान को सुना जा सकता है.

यहाँ सवाल यह नहीं है कि नरेन्द्र मोदी ने यह जुमला क्यों इस्तेमाल किया. इस जुमले पर किसी का कोई कॉपीराइट भी नहीं है और न पेटेंट. सवाल इतना सा है कि इसे स्वामी विवेकानंद का जुमला बताने की कोशिश क्यों कर रही है टीम मोदी? क्या झूठ की बुनियाद पर खड़ी की गयी इमारत मज़बूत हो सकती है?

दशकों पहले इसी देश में गणेश जी की मूर्तियों को दूध पिला चुकी आरएसएस के कहने में इस देश के भोले भाले युवा जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास से परिचित ही नहीं, तो आ सकते हैं मगर वे लोग नहीं जो इनकी रग रग से वाकिफ हैं. चिंता की बात यही है कि हमारे देश के युवाओं को झूठ और फरेब के सहारे बरगलाया जा रहा है. जब उनका विश्वास टूटेगा तो वे किसी पर भी आसानी से विश्वास करने की स्थिति में नहीं होगें.

कांग्रेस भी कोई कम नहीं है. कांग्रेस ने भी अपनी साइबर टीम सोशल मीडिया पर उतार दी है. नरेन्द्र मोदी की हैदराबाद रैली से ठीक पहले फेंकूएक्सप्रेस नामक वेबसाईट खड़ी कर फेंकूएक्सप्रेस को ट्विटर पर ट्रेंड बनवाने के लिए बाकायदा रोबोट सॉफ्टवेयर बनवाया गया तथा इस सॉफ्टवेयर के ज़रिये लाखों फर्जी ट्विटर एकाउंट बनाये गए और फेंकूएक्सप्रेस को टैग कर करोड़ों ट्विट और रिट्विट करवाए गए ताकि ट्विटर पर ट्रेंड बना कर ट्विटर यूजर्स तक फेंकूएक्सप्रेस पहुंचाई जा सके.

अभी तो सोशल मीडिया पर कांग्रेस और भाजपा में युद्ध की शुरुआत हुई है मगर इस तरीके की हरकतों से वास्तविक सोशल मीडिया यूजर्स परेशान भी हैं तो इन दोनों राजनैतिक दलों द्वारा एक दूसरे पर किये जा रहे वार को देखने के लिए उत्सुक भी.

फेसबुक पर तस्वीरें पोस्ट करना हराम है…

 -असीम त्रिवेदी||

सुन्नी मुफ्ती ‘अब्दुल रहमान नईमुल हलीम फिरंगी महली’ का कहना है कि आप फेसबुक पर किसी की तस्वीर नहीं देख सकते हैं और यह फैसला भी नहीं कर कर सकते हैं कि आप दोस्ती करना चाहते हैं. प्यार और मोहब्बत के लिए वास्तविक जीवन में देखिए. इस तरह के आभासी संबंधों का कोई फायदा नहीं है. मुफ्ती चाहते हैं कि नौजवान वास्तविक दुनिया में रहें. काश कि बेहद लंबे नाम वाले ये बेचारे मुफ्ती जान पाते कि वो खुद ही वास्तविक दुनिया से दूर आदम हव्वा की दुनिया में जी रहे हैं. उम्मीद है पुरातत्व विभाग की ओर से ज़ल्द ही मुफ्ती साहब पर दावा ठोक दिया जाएगा. जिससे आदम हव्वा की ऐसी विरासतों का संरक्षण किया जा सके. वैसे मुमकिन है कि इतना लंबा नाम होने की वज़ह से मुफ्ती साहब को फेसबुक पर एकाउंट बनाने में तकलीफ आ रही हो शायद इसीलिये फ्रस्ट्रेट होकर ऐसे बयान दे रहे हों. उन्हें यूआरएल शोर्ट करने की वेब प्रक्रिया से सबक लेकर अपना नाम कुछ छोटा करने पर ध्यान देना चाहिए.A smartphone user shows the Facebook application on his phone in Zenica, in this photo illustration

वहीं शिया समुदाय के मौलाना सैफ अब्बास नकवी ने कहा, “महिलाओं को अपने परिवार के मर्दो के सिवाय कहीं भी अपना चेहरा नहीं दिखाना चाहिए. ऐसे में फेसबुक पर तस्वीरें पोस्ट करना हराम है और गैर इस्लामिक है. हम तालिबानी मानसिकता के नहीं, बल्कि उदारवादी हैं.” इन शिया मुफ्ती साहब के बयान को देखकर लगता है कि अब समय आ गया है कि तालिबानी सोच की एक व्यापक परिभाषा बनायी जाए, नहीं तो हर तालिबानी खुद को उदारवादी कहता फिरेगा. वैसे जहां तक महिलाओं के चेहरा दिखाने का प्रश्न है. मैं मानता हूँ कि मूर्खता और पिछडेपन के प्रतीक ऐसे मुफ्ती दुनिया को अपना चेहरा दिखाने के लायक नहीं हैं और अब इन्हें बुर्का पहने बिना घर से नहीं निकालना चाहिए.

आश्चर्य है कि कभी कोई मुफ्ती महिलाओं को संगीत से दूर करने की कोशिश करता है तो कभी कोई सोशल मीडिया से बेदखल करने की बेवकूफी बघारता है. और महिलाओं के हक की लड़ाई के इस दौर में सरकारें इन पुरुषवादी धर्मगुरुओं पर कोई कार्रवाई नहीं करती. हांलाकि मैं इन मुफ्तियों के फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन का विरोध नहीं करता. लेकिन कम से कम इतना तो सुनिश्चित करना चाहते हूँ कि महिलाओं के साथ सदियों से चले आ रहे इस लिंगभेदी अन्याय को खत्म करने के लिए कुछ उपाय हों. और इतिहास गवाह रहा है कि हमेशा महिलाओं का शोषण करने वाली ये व्यस्था विभिन्न धर्मों के नाम पर ही पाली पोसी गयी और लंबे समय अंतराल में महिलाओं को बेहद कमज़ोर और पिछड़ा बना देने में सफल रही.

(असीम त्रिवेदी की फेसबुक वाल से)

दुर्गा शक्ति मामले में फेसबुक पर कमेन्ट करने से दलित लेखक गिरफ्तार…

निलम्बित आइएएस दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन के बाद दुर्गा शक्ति के पक्ष में और सपा सरकार पर के खिलाफ देश भर में उठ रही आवाजों ने उत्तर प्रदेश सरकार को बुरी तरह हिला दिया है. हर तरफ अपनी भद्द पिटते देख अखिलेश सरकार हत्थे से उखड गई लगती है. जिसके चलते अखिलेश सरकार सोशल मीडिया पर उठ रही विरोध की लहर को दबाने के लिए फेसबुक पर सपा सरकार के खिलाफ कमेन्ट करने पर गिरफ्तार तक करने लगी है.kawal

इसकी ताज़ा बानगी है दलित लेखक और कार्यकर्ता कंवल भारती की गिरफ्तारी. अखिलेश सरकार ने सोशल साइट फेसबुक पर कॉमेंट करने के कारण दलित लेखक और कार्यकर्ता कंवल भारती को गिरफ्तार कर लिया. कंवल भारती ने फेसबुक पर कमेंट किया था कि दुर्गा और आरक्षण, दोनों मामलों में अखिलेश सरकार फेल रही है. उन्होंने इस मसले पर अखिलेश सरकार की तीखी आलोचना की थी.

गौरतलब है कि कंवल भारती दलित राजनीति पर लगातार लिखते रहे हैं. उन्हें मंगलवार को रामपुर में गिरफ्तार किया गया. हालांकि सीजेएम कोर्ट से उन्हें थोड़ी ही देर बाद जमानत मिल गई.

कंवल भारती ने फेसबुक पर लिखा था, ‘आरक्षण और दुर्गाशक्ति नागपाल मुद्दों पर अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार पूरी तरह फेल हो गयी है. अखिलेश, शिवपाल यादव, आज़म खां और मुलायम सिंह इन मुद्दों पर अपनी या अपनी सरकार की पीठ कितनी ही ठोक लें, लेकिन हकीकत ये देख नहीं पा रहे हैं. अपराधियों के हौसले बुलंद हैं और बेलगाम मंत्री इंसान से हैवान बन गए हैं. ये अपने पतन की पटकथा खुद लिख रहे हैं. सत्ता के मद में अंधे हो गये इन लोगों को समझाने का मतलब है भैंस के आगे बीन बजाना.’

जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख आन्दोलन कारियों में से एक रहे प्रसिद्ध लेखक अफलातून अफलू ने उत्तर प्रदेश सरकार की कड़ी निंदा करते हुए अपनी फेसबुक वाल पर लिखा है कि “रावण से बदत्तर है मुलायम के राज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की स्थिति. लेखक कंवल भारती की आजम खान के PRO की FIR पर गिरफ्तारी ने यह साबित कर दिया है. लोहिया रावण के राज में विभीषण द्वारा अपने निवास पर ‘राम-राम-राम’ लिखने के बावजूद रावण द्वारा खलल न डालने को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति उसकी निष्ठा का नमूना मानते थे. ‘ सच कहना अगर बगावत है,तो समझो हम भी बागी हैं’ ! सूबे की सरकार तत्काल लेखक-चिन्तक कंवल भारती पर लगाये फर्जी मुकदमे को वापस ले.”

फेसबुक और अखबार..

-आशुतोष कुमार||

जब टेलिविज़न से अखबार का मुकाबला हुआ,  तो दहशत खाए अखबारों ने तुरंत चोला बदला. वे अधिक से अधिक ‘दृश्य’ हो गए. ढेर सारे चित्र. कम से कम शब्द. अधिक से अधिक रंग. भाषा भी अधिक  सनसनीखेज और चित्रात्मक. हिंसा और सैक्स की रेलपेल. यह सब कर के उन्होंने अपना वजूद तो बचा लिया, लेकिन ईमान गँवा दिया. वे दूसरा रास्ता भी ले सकते थे. वे अपने पाठकों को वैसा बहुत कुछ दे सकते थे, जो टेलिविज़न जैसा तुरंता माध्यम कभी दे नहीं सकता. वे दृष्टि का निर्माण करने वाली गहरी जानकारियों और विश्लेषण  पर आधारित सामग्री दे कर भी  अपनी जगह बचा सकते थे. भले ही यह मुश्किल रास्ता था. एकाध अखबारों ने ही ऐसा कुछ करने की  कोशिश की .facebook_newspaper-704x318

आज अखबार का मुकाबला फेसबुक से है. फिर अखबारों में ऐसी ही दहशत है. वे अखबार को फेसबुक का विस्तार बनाने में लगे हैं. अनेक सम्पादक अखबार की तुलना में फेसबुक पर अधिक समय बिता रहे हैं. वे फेसबुक से कहानियां उठा रहे हैं और अखबार में फैला रहे हैं. वे फेसबुक जैसी बहसबाजी को बढ़ावा दे रहे हैं. वे व्यक्तिगत हमलों और चरित्रहन को अपना कारोबार बना रहे हैं .

लेकिन अखबार न टेलिविज़न हो सकता है,  न फेसबुक. हर माध्यम की अपनी एक शक्ति और अपना एक लोक है. अखबार अपने ही लोक में ज़िंदा रह सकता है.  दूसरे माध्यमों के साथ आतंकित होड़ में पड़कर वह अपना इहलोक और परलोक दोनों बिगाड़ने में तुला हो तो क्या किया जाए !

(आशुतोष कुमार की फेसबुक वाल से)

फेसबुक पर लडकी को नग्न फोटो भेजे, युवक गिरफ्तार…

फेसबुक पर भी लड़कियों के साथ अश्लील हरकतों में बड़ी तेज़ी से बढ़ोतरी हो रही है. हाल ही में एक युवक ने फेसबुक पर एक युवती को नग्न और अश्लील फोटो भेज दिए. युवती की शिकायत के बाद पुलिस ने आईटी एक्ट समेत कई धाराओं में मामला दर्ज कर सीमापुरी निवासी मुकेश (25) को गिरफ्तार कर लिया है.

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पुलिस के मुताबिक पीड़ित ममता (21)(बदला हुआ नाम) परिवार के साथ कल्याणपुरी इलाके में रहती है.

करीब एक साल पहले ममता एक होटल में काम करती थी वहां मुकेश भी नौकरी करता था. कुछ समय बाद ममता का ट्रांसफर दूसरी जगह हो गया. लगभग दो माह पहले फेसबुक पर दोनों की दोबारा मुलाकात हुई.

हालांकि मुकेश ने ममता की फेसबुक वाल पर अपनी अश्लील फोटो पोस्ट करनी शुरू कर दी. यही नहीं आरोपी ने ममता के घर और उसके फोन नंबर का भी पता लगा लिया तथा उसके फोन पर अश्लील बातें करने के अलावा ममता का पीछा करने की कोशिश करने लगा.

साथ ही कई बार सड़क पर छेड़छाड़ का प्रयास भी किया. परेशान होकर ममता ने मामले की शिकायत कल्याणपुरी थाने में की. छानबीन के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपी मुकेश को दबोच लिया.

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