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चुनावी हलचल और भारत जोड़ो यात्रा के बीच देश में संसद का शीतकालीन सत्र भी शुरु हो गया है। भारत जोड़ो यात्रा के कई उद्देश्यों में एक महंगाई के खिलाफ आवाज़ उठाना है। वहीं चुनावों में भी महंगाई एक अहम मुद्दा रहा। और अब संसद में भी इस मुद्दे पर चर्चा होना लाजिमी था। शीतकालीन सत्र के चौथे दिन तेलंगाना से कांग्रेस सांसद अनुमुला रेवंत रेड्डी ने प्रश्नकाल के दौरान भारत की गिरती अर्थव्यवस्था पर सरकार का ध्यान दिलाते हुए प्रधानमंत्री मोदी के एक पुराने बयान की याद दिलाई।

जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘रुपया आईसीयू में पड़ा है, देश का दुर्भाग्य है कि दिल्ली सरकार को देश की चिंता नहीं है।’ गौरतलब है कि अपने मुख्यमंत्रित्व काल में नरेन्द्र मोदी ने बारंबार यूपीए सरकार को महंगाई के नाम पर घेरा था। वे काफी तल्ख शब्दों में अर्थशास्त्री डॉ.मनमोहन सिंह के शासन की आलोचना करते थे। 2013 में श्री मोदी ने कहा था कि वह हैरान हैं कि यूपीए और रुपये में नीचे गिरने की होड़ लगी है।

उन्होंने कहा कि जब देश आजाद हुआ था, तब एक डॉलर की कीमत एक रुपये के बराबर थी। जब अटलजी की सरकार थी, तब यह 42 रुपये पर जा पहुंची और यूपीए सरकार में इसकी कीमत साठ रुपये तक आ गई।

नरेन्द्र मोदी ने ये भी कहा था कि जब भारत आजाद हुआ था, तब भी मुल्क की स्थिति आर्थिक रूप से सुदृढ़ थी। लेकिन अब तो ऐसा लगता है कि देश महज एक बाजार बन कर रह गया है। यह बात सब जानते हैं कि जब भारत आजाद हुआ था, तब आर्थिक तौर पर काफी कमजोर था और प. नेहरू की मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति के कारण देश को अपने पैरों पर खड़े होने की ताकत आई। उस वक़्त कृषि और उद्योगों को बढ़ावा देकर भारत को आत्मनिर्भर बनाने की कवायद शुरु हुई।

रूस जैसे मित्रों के सहयोग से सार्वजनिक क्षेत्र के बड़े उद्योग स्थापित किए गए, ताकि देश में उत्पादन बढ़े और रोजगार भी मुहैया हो। मगर कांग्रेस को गलत बताने के फेर में इतिहास के इन तथ्यों की सुविधाजनक अनदेखी श्री मोदी करते रहे हैं। अब उनके प्रधानमंत्रित्व काल में जब अर्थव्यवस्था काफी कमजोर हो गई है, तब भी इसी सुविधा से उनकी सरकार तथ्यों की अनदेखी कर रही है। और सवालों के जवाब में कुतर्कों का सहारा लिया जा रहा है।

कांग्रेस सांसद श्री रेड्डी ने संसद में कहा कि आज सरकार को अपनी कुर्सी बचाने की चिंता है। रुपए गिरने की कोई चिंता नहीं है, कोई एक्शन प्लान नहीं है। जब डॉलर की कीमत 66 रुपए थी, तब इन्होंने कहा था कि रुपया आईसीयू में है, अब रुपये की कीमत 83.20 है।

आईसीयू से दो रास्ते जाते हैं- एक ठीक होकर घर वापस आना और दूसरा मुर्दाघर जाने का। तो अब अगर रुपया 83.20 है तो मतलब हम सीधा मुर्दाघर में जा रहे हैं। रुपए को मुर्दाघर से वापस लाने का क्या कोई एक्शन प्लान है? यह काफी तल्ख लेकिन जरूरी सवाल है। जिस पर सरकार को अगर तुरंत जवाब न देते बने, तो इसके लिए वक़्त मांग लेना चाहिए। मगर इसकी जगह वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने फिर से एक अटपटा बयान दिया।

उन्होंने कहा कि ‘महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध के बावजूद, आज भारत की तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है। लेकिन कुछ लोगों को इससे जलन हो रही है। दुख की बात है कि इस पर जलने वाले लोग हमारे सदन में हैं।

जब देश आगे बढ़ रहा है, तो उसपर गर्व होना चाहिए, न कि मजाक उड़ाना चाहिए। सुश्री सीतारमण ने लगे हाथ ये भी कह दिया कि जिस तरह उनके उस बयान पर सोशल मीडिया में मीम्स बनाए गए थे, उसी तरह आज देश की अर्थव्यवस्था को लेकर मजाक उड़ाया जा रहा है। पाठकों को याद होगा कि 2019 में महंगाई पर ही पूछे गए एक सवाल के जवाब में निर्मला सीतारमण ने कहा था कि वह जिस परिवार से आती हैं, वहां प्याज बहुत मायने नहीं रखता।

उनके इस बयान पर सोशल मीडिया में जमकर मीम्स बने थे। जब लोग किसी और तरह से अपनी तकलीफ कम नहीं कर पाते, तो इसी तरह व्यंग्योक्तियों से दर्द का अहसास कम करते हैं। मगर वित्त मंत्री इस बात से भी विचलित नजर आईं कि उनके ऊपर तंज कसे गए। अब उन्हें इस बात से तकलीफ है कि रुपए की गिरती कीमत पर कड़े सवाल पूछे जा रहे हैं।

कुछ वक्त पहले अमेरिका में उन्होंने ऐसे ही एक सवाल के जवाब में कहा था कि रुपया कमजोर नहीं हुआ, डॉलर मजबूत हो गया। और इस धारणा पर वे अब भी कायम हैं, क्योंकि संसद में उन्होंने कहा कि भारतीय रुपया हर करेंसी के मुकाबले मजबूत हुआ है और डॉलर यूएस फेड द्वारा अपनाई गई नीतियों की वजह से मजबूत होता जा रहा है।

अगर बात केवल इस तरह के तर्कों तक ही सीमित रहती तो इसे दो सांसदों, सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच मतभेद की तरह देखा जा सकता था। मगर सुश्री सीतारमण ने ये भी कहा कि देश की बढ़ती अर्थव्यवस्था से कुछ लोगों को जलन है और ये भी कि सदन में जलने वाले लोग हैं। ये किस तरह का राजनैतिक विद्वेष है। ये बयान एक भारतीय नागरिक और निर्वाचित सांसद की देश के लिए निष्ठा पर सवाल उठाने की तरह है।

देश की मजबूत अर्थव्यवस्था से इस देश के किसी भी नागरिक को क्यों जलन होगी। क्या देश की तरक्की में उनकी तरक्की नहीं होगी। क्या सरकार से तार्किक सवाल करने का चलन संसद में खत्म हो गया है।

भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी बार-बार ये आरोप लगा रहे हैं कि हमें संसद में बोलने नहीं दिया जाता। हमारी आवाज़ लोगों तक पहुंचने नहीं दी जाती, इसलिए हम सड़कों पर उतरे हैं। शीतकालीन सत्र में निर्मला सीतारमण के जवाब सुनकर ये लगता है कि राहुल गांधी के आरोप सही हैं।

कांग्रेस सांसद रेड्डी ने ये भी बताया कि 1947 से लेकर 65 सालों में रही सरकारों ने 55,87,149 करोड़ का लोन लिया था। लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार ने अपनी सरकार में अब तक 18,00,744 करोड़ का कर्ज लिया। हर साल 10 हजार करोड़ उधार मांगकर जी रहे हैं।

सरकार क्या इन तथ्यों को खारिज कर सकती है और क्या बता सकती है कि कर्ज लेकर क्या देश में मजबूत अर्थव्यवस्था बनाई जा रही है। एक आरोप के बदले दूसरे आरोप लगाने का सिलसिला बंद होना चाहिए और लगातार दूसरा कार्यकाल संभाल रही सरकार को देश के सामने परिणाम देना चाहिए।

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