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-सुनील कुमार।।

केन्द्र सरकार की बेबुनियाद नसीहत के बीच राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा कल दिल्ली पहुंची, और लालकिले के पास एक आमसभा में उन्होंने केन्द्र सरकार और देश से जुड़े बहुत से मुद्दों पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार लोगों का ध्यान बुनियादी मुद्दों से भटका रही है। उन्होंने यह भी कहा कि यह मोदी सरकार नहीं बल्कि अडानी-अंबानी की सरकार है। अब तक 2800 किलोमीटर का सफर पूरा करके दिल्ली पहुंचे राहुल गांधी तीन जनवरी से आगे रवाना होकर श्रीनगर तक जाएंगे। हिन्दुस्तान के राजनीतिक इतिहास में किसी ने ऐसी पदयात्रा नहीं की थी, और सर्द उत्तर भारत में साथ चलते हुए मोटे गर्म कपड़ों से लदे लोगों के बीच पैदल चलते राहुल जिस तरह एक टी-शर्ट में दिख रहे हैं, वह भी एक उत्साह की गर्मी का सुबूत है जो कि अभूतपूर्व और अप्रत्याशित जनसमर्थन से उपजा हुआ है।

अब तक यह पदयात्रा सौ-सवा सौ दिन चल चुकी है, और दस राज्यों के लोगों से मिल चुकी है। बिना किसी चुनावी एजेंडा के राहुल गांधी जिस तरह देश को जोडऩे की जरूरत बताते हुए, उसकी कोशिश करते हुए चल रहे हैं, और जिस तरह आम लोग उनके गले लगकर खुशी और गम बांट रहे हैं, वैसा हिन्दुस्तानी राजनीति में किसी ने देखा नहीं था। इस देश की बड़ी-बड़ी ताकतों ने सैकड़ों या हजारों करोड़ रूपये खर्च करके, दस बरस की मेहनत से राहुल गांधी को बेवकूफ साबित करने की एक कोशिश की थी, और खरीदे हुए मीडिया या सोशल मीडिया की मेहरबानी से राहुल पर पप्पू नाम चिपका दिया था, वह सब कुछ इस पदयात्रा से धुल गया है। आज देश में नफरत की जो जहरीली हवा भर गई है, जिस तरह अलग-अलग तबकों को एक-दूसरे के खिलाफ साम्प्रदायिक हिंसा के लिए खड़ा कर दिया गया है, जिस तरह तथाकथित हिन्दू समाज के भीतर ही दलितों को कुचला जा रहा है, आदिवासियों से उनकी जिंदगी की बसाहट छीनी जा रही है, जिस तरह देश की संवैधानिक संस्थाओं का भगवाकरण किया जा चुका है, और जिस तरह हिन्दुस्तानी लोकतंत्र की आधी-पौन सदी की शोहरत को खत्म कर दिया गया है, उस बीच राहुल से परे भी अनगिनत अमन-पसंद लोगों को देश को जोडऩे की जरूरत लग रही थी। और हिन्दुस्तानी लोकतंत्र की त्रासदी यह है कि देश के समाज के टुकड़े-टुकड़े करने में कामयाब हो चुके लोग दूसरों को टुकड़े-टुकड़े गैंग कहते नहीं थकते हैं। देश को इस हद तक साम्प्रदायिकता में झोंक दिया गया है कि अब सरकार, अदालत, और दीगर संवैधानिक संस्थाओं में बैठे लोग खुलकर साम्प्रदायिक बातें करते हैं, और किसी किस्म की शर्म का भी कोई सवाल नहीं उठता। ऐसे कतरा-कतरा बांटे गए भारतीय समाज में आज राहुल गांधी अगर नफरत छोड़ो, भारत जोड़ो का नारा लगाकर बिना कुछ मांगते हुए इस तरह की एक पदयात्रा कर रहे हैं, तो यह ताजा लोकतांत्रिक इतिहास की एक बड़ी घटना है। खासकर इसलिए भी कि अपनी दादी और पिता को उन्होंने जैसे आतंकी हमलों में खोया है, वैसे किसी हमले का खतरा राहुल पर कम नहीं हैं, लेकिन वे बिना किसी परवाह के जिस तरह देश के एक सिरे से दूसरे सिरे तक पैदल चल रहे हैं, वह एक बहुत बड़े हौसले की बात भी है। हर दिन सैकड़ों-हजारों लोगों से गले मिलते हुए, हाथ में हाथ डाले हुए वे जिस तरह चलते चले जा रहे हैं, भीड़ के सैलाब के बीच बिना किसी मुमकिन हिफाजत के भी उनका हौसला देखने लायक है। सच तो यह है कि इन सवा सौ से कम दिनों में राहुल गांधी ने जो एक नई इज्जत कमाई है, एक नई साख पाई है, वे अपने पूरे राजनीतिक जीवन में भी इतना कुछ हासिल नहीं कर पाए थे। और यह बिल्कुल ही अटपटी, अनोखी, और अजीब बात यह साबित करती है कि लोकतंत्र में जनता से संपर्क से बड़ा कुछ भी नहीं होता है। गांधी पूरी जिंदगी जनता के बीच ही जीते और मरते रहे, लोगों के बीच खाते रहे, पखाने धोते रहे, अनशन करते रहे, और जान देने में भी वे पीछे नहीं रहे। उनके बाद की आधी सदी में किसी ने जनता से जुडऩे की ऐसी ताकत का इस्तेमाल शायद इस हद तक नहीं किया था जिस हद तक राहुल गांधी कर रहे हैं। शायद उन्हें खुद भी इस बात का अहसास नहीं रहा होगा कि उन्हें इतना जनसमर्थन मिलेगा, और हिन्दुस्तानी मीडिया में अघोषित ब्लैकआउट सरीखी नौबत के रहते भी वे सोशल मीडिया के सैलाब से लोगों के दिलों तक पहुंचेंगे, और लोग उन तक पहुंचेंगे। इस पदयात्रा की खूबी यही रही कि इस दौरान हुए चुनावों में राहुल गांधी ने न पार्टी को हार से बचाने की कोशिश की, और न ही पार्टी की जीत का सेहरा खुद बंधवाने की कोशिश की। वे मोटेतौर पर इस पदयात्रा को गैरचुनावी बनाकर चले, और यही वजह है कि अब तक दर्जन भर पार्टियों के नेता, और अनगिनत लेखक, पत्रकार, कलाकार उनके साथ अपनी एकजुटता दिखाते हुए चले हैं।

पदयात्रा की इस हकीकत के साथ अब दो मिनटों में वह भी देख लेने की जरूरत है जो कि राहुल ने दिल्ली पहुंचकर सभा में कहा है। उन्होंने मीडिया पर चौबीसों घंटे नफरत की खबर दिखाने के लिए कहा है कि लोगों का ध्यान भटकाकर पैसा मीडिया-मालिकों की जेब में जाता है। उन्होंने आज के हिन्दुत्व के हमलावर तेवरों को लेकर भी हिन्दू धर्म की बुनियादी सोच याद दिलाई है, और पूछा है कि हिन्दू धर्म में कहां लिखा है कि गरीबों को कुचलना चाहिए, कमजोरों को मारना चाहिए? उन्होंने चीन के मोर्चे पर सरकार की नाकामयाबी की बात की है, और देश के अडानीकरण और अंबानीकरण पर भी हमला किया है। राहुल की कही बातों को देश के मीडिया में चाहे कुछ भी जगह न मिले, सोशल मीडिया और मीडिया के एक छोटे तबके की मेहरबानी से उनकी बातें लोगों तक पहुंच रही हैं, और नफरत के खिलाफ एक उम्मीद जगा रही हैं।

कांग्रेस पार्टी का समर्थन करने, या मोदी सरकार का विरोध करने की किसी नीयत के बिना आज हम देश को जोडऩे की जरूरत को बहुत तल्खी से महसूस कर रहे हैं, और इसीलिए अब तक की 108 दिनों की इस पदयात्रा पर दो-चार बार इसी जगह पर लिख चुके हैं। नफरत से उबरने की अहमियत को कम नहीं आंकना चाहिए। लोकतंत्र में आने वाली पीढ़ी के लिए नफरती हिंसा की विरासत छोड़ जाने का मतलब लोकतंत्र को कभी सभ्य और विकसित न होने देना भी होगा, इसलिए राहुल की पदयात्रा को आज राजनीतिक सहमति और असहमति से परे भी समझने की जरूरत है कि आज देश को जोडऩे की कितनी जरूरत है।

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