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7 सितम्बर, 2022 को कन्याकुमारी से पैदल चलते हुए 29 जनवरी, 2023 को श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराकर कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने एक असंभव लगने वाले काम को संभव कर दिखाया। इसके अगले दिन 30 जनवरी को श्रीनगर में ही कांग्रेस कार्यालय में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने तिरंगा फहराया और इसके साथ ही 5 महीनों से चली आ रही ‘भारत जोड़ो यात्रा’ का पहला चरण समाप्त हो गया।

बताया जा रहा है कि जल्द ही पश्चिम से पूरब तक एक और यात्रा इसी तरह निकाली जाएगी। तब यह भारत जोड़ने का दूसरा चरण कहलाएगा। राहुल गांधी यह असंभव काम भी हकीकत में बदल देते हैं, तो वे देश के एकमात्र ऐसे जननेता होंगे, जो देश की चारों दिशाओं को पैदल नापने का कारनामा करेंगे। बहरहाल, अब भी जो काम उन्होंने किया है, वह किसी करिश्मे से कम नहीं है। हालांकि उनमें विनम्रता इतनी है कि वे इस अद्भुत काम को ऐसी तपस्या बताते हैं, जो इस देश के लाखों मजदूर-किसान रोजाना करते हैं।

भारत जोड़ो यात्रा में राहुल गांधी की हकीकत को लोगों ने पहचाना है। गांधी परिवार से नफरत करने वाले लोगों ने उनकी छवि खराब करने में हजारों-करोड़ खर्च कर दिए। इस यात्रा के दौरान भी न जाने कितनी बार उन पर अशोभनीय टिप्पणियां की गईं। उनकी टी शर्ट के नीचे झांकने की निर्लज्ज राजनीति भी आखिरी दिनों तक चलती रही। मगर सोशल मीडिया के जरिए की गई इन तमाम कोशिशों पर सड़क पर नजर आ रही हकीकत ने पानी फेर दिया।

जिस इंसान को शहजादा, पप्पू, विरासत में मिली सत्ता का लाभ उठाने वाला बाबा राहुल कहा गया, उस राहुल गांधी को इस देश के लोगों ने बरसते पानी, तपती धूप, ठिठुराती ठंड और बर्फबारी के बीच चेहरे पर मुस्कुराहट लिए पैदल चलते लोगों ने देखा। सहजता के साथ इस देश के आम लोगों से मिलते देखा। उनकी दुख-तकलीफों पर बात करते, उनकी मुश्किलों को सुनते-समझते देखा। और सबसे बड़ी बात ये कि यह सब चुनावी रणनीति का हिस्सा नहीं था, क्योंकि पूरी यात्रा में राहुल गांधी कांग्रेस से ऊपर उठकर लोगों की बात करते रहे।

मन की बात हर महीने सुनने वाले लोगों ने जन की बात करने वाले नेता को देखा। अगर यह चुनावी फायदे के लिए किए जा रहे प्रचार का हिस्सा होता, तो दो-चार दिन में इस की पोल खुल जाती और लोग इस यात्रा से छिटकने लगते। मगर पूरे 4080 किमी की यात्रा में जिन 14 राज्यों से राहुल गांधी का कारवां गुजरा, हर जगह एक जैसी भीड़, एक जैसा जोश नजर आया। इससे पता चलता है कि इस यात्रा का सबसे बड़ा हासिल देश में एक जननेता का उभरना है, जो लोगों को अपना सा लगता है, जिसे लोग अपना मानते हैं।

भारत जोड़ो यात्रा कांग्रेस की चुनावी यात्रा नहीं थी, यह बात यात्रा के हर पड़ाव पर कांग्रेस और राहुल गांधी ने बताई है। अगर चुनावी फायदे का मकसद होता तो राहुल गांधी गुजरात में अपना अधिक वक्त देते। यात्रा का मकसद भारत तो नए सिरे से जोड़ना, नफरत, बेरोजगारी और महंगाई के खिलाफ आवाज उठाना है। भाजपा के कई नेताओं समेत बहुत से लोगों ने सवाल उठाया कि भारत टूटा ही कब है, जो उसे जोड़ने की जरूरत है।

जब राहुल गांधी ने एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि उन्हें देश में कहीं नफरत नहीं दिखाई दी, तो इस पर तंज कसे गए कि वो अपनी बात खुद ही काट रहे हैं। जब नफरत दिखाई नहीं दे रही, तो किसके खिलाफ यात्रा निकाल रहे हैं। ऐसे सवाल यात्रा को मकसद से भटकाने के लिए हैं। यह सही बात है कि देश अभी टूटा नहीं है, क्योंकि इसकी बुनियाद प्रेम, भाईचारे, धर्मनिरपेक्षता पर रखी गई।

लेकिन इस भाईचारे और सद्भाव को खत्म करने की कोशिशें लगातार हो रही हैं। राहुल गांधी को नफरत नहीं दिखाई दी, क्योंकि आम जनता के बीच अब भी एक दूसरे के लिए प्यार और सम्मान है। मगर नफरत के बीज बोए जा रहे हैं, तो यह खतरा बना ही रहेगा कि ये बीज जब पेड़ बन जाएंगे और उनकी जड़ें मजबूत हो जाएंगी, तब देश में बिखराव का खतरा और बढ़ जाएगा। इसलिए यात्रा का मकसद महत्वपूर्ण था।

यात्रा के समापन पर श्रीनगर से राहुल गांधी ने अपने भाषण में इसी नफरत और हिंसा को मिटाने की बात कही। यूं तो वे हर बार संघ और भाजपा की विचारधारा के विरोध की बात कहते हैं। मगर 30 तारीख के अपने भाषण में उन्होंने अपने परिवार की कुर्बानियों का जिक्र करते हुए, कश्मीर, सेना और सीआरपीएफ के लोगों से कहा कि वो उनका दर्द समझते हैं। जब फोन से किसी अपने के अचानक जाने की खबर आती है, तो कैसा महसूस होता है, इस गहरे दर्द को बड़ी शिद्दत से राहुल गांधी ने कम शब्दों में बयां कर दिया। उन्होंने खुलकर प्रधानमंत्री मोदी, अमित शाह और अजीत डोभाल के लिए कहा कि वे इस दर्द को नहीं समझ सकते। भाजपा की पहली सरकार में प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने कश्मीरियत, जम्हूरियत और इंसानियत का नारा कश्मीर में दिया था। लेकिन राहुल गांधी ने कश्मीरियत की एक नयी पहचान बताई। उन्होंने इसे असम, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, गुजरात के संत कवियों की सोच की तरह बताया, जिसमें मानवता सबसे पहले आती है। दूसरों के दर्द को समझना और अपनी बनाए सोच के किले को भेदकर आत्ममंथन करने की आध्यात्मिकता राहुल गांधी ने समझाई। कश्मीर को इस नजर से शायद ही किसी नेता ने अब तक देखा और समझा है।

जम्मू से आगे बढ़ते हुए राहुल गांधी की सुरक्षा का मसला बार-बार उठा। इस पर भी राहुल गांधी ने कहा कि मैं अपने घर आया था और मुझसे नफरत करने वाले मेरी टी शर्ट के रंग को सफेद से लाल करना चाहते, तो यह मौका मैंने उन्हें दिया। क्योंकि डर कर यात्रा रोकना उन्हें मंजूर नहीं था। राहुल ने कहा कि उनकी सोच के मुताबिक कश्मीर के लोगों ने उन्हें हथगोला नहीं दिल खोलकर मोहब्बत दी, आंसुओं से उनका स्वागत किया। कश्मीर के लोगों के लिए ये शब्द काफी मायने रखते हैं। क्योंकि पिछले कुछ सालों में पत्थरबाजी को कश्मीर की पहचान बना दिया गया था। अमन के पैगाम के साथ उन पर विश्वास की बात करना एक बड़ा राजनैतिक कदम है। यही आज कश्मीर की जरूरत भी है।

कई तरह की विघ्नबाधाओं के साथ भारत जोड़ो यात्रा के महायज्ञ के पहले चरण का समापन 30 जनवरी को हो गया। लेकिन इसकी पूर्णाहूति तभी होगी, जब देश से नफरत का नामोनिशान मिट जाएगा। जब गांधी के हत्यारे गोडसे की पूजा बंद होगी। तब तक ऐसी यात्राओं के निकलने की जरूरत बनी रहेगी।

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