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-सुनील कुमार॥

हिन्दुस्तान में कुछ लोगों को यह लग रहा है कि मणिपुर का महत्व संसद में एक हवाई चुम्बन के आरोप से कम है, उनकी लोकतांत्रिक और संसदीय समझ पर लानत है। हम किसी महिला के आरोप को कम नहीं आंकते, लेकिन एक सवाल फिर भी खड़ा होता है कि मणिपुर में महिलाओं से बलात्कार, बेकसूरों के कत्ल, और आधा लाख से अधिक लोगों की बेदखली पर भी देश की जिन महिला सांसदों का मुंह नहीं खुला था, जब तक मणिपुर से बाहर निकले, महिलाओं से सेक्स-हिंसा के वीडियो पर प्रधानमंत्री का मुंह नहीं खुला, तब तक जिन महिला सांसदों को मणिपुर की महिलाएं इंसान नहीं दिखीं, वे आज एक कथित हवाई चुम्बन से ऐसी जख्मी हो गई हैं कि उन्होंने मानो अपने लहू से शिकायत लिखी हो। ऐसे कथित चुम्बन की जांच के बाद उसके लिए राहुल गांधी को संसद अगर फांसी देना तय करे, तो वह संसद का अधिकार होगा, लेकिन मणिपुर में नस्लीय सफाया, धार्मिक कत्ल, आदिवासी समुदाय के खात्मे पर भी जिन लोगों के मुंह नहीं खुले थे, उनकी चुप्पी के लिए फिर इसी संसद को उन्हें हर हफ्ते की चुप्पी पर एक-एक बार फांसी देनी होगी। देश की इस सबसे बड़ी पंचायत में लोग नाहक ही जगह नहीं पाते हैं, और मुफ्त में विशेषाधिकार नहीं पाते हैं, लोकतंत्र का तकाजा होता है कि वे देश और दुनिया को देखें, और उस पर बात करें। कोई यूपी या एमपी, राजस्थान से सांसद या महिला सांसद हो, तो क्या मणिपुर के किसी दौरे पर उनसे कोई बदसलूकी होने पर वे विशेषाधिकार भंग होने का दावा नहीं करेंगे, या करेंगी? जब संसद किसी को देश के किसी भी हिस्से के मुद्दे को उठाने का हक देती है, तो देश के हर हिस्से के मुद्दे को उठाने की जिम्मेदारी भी देती है। हिन्दुस्तानी लोकतंत्र संसद के बाहर भी सांसदों को सांसद की हैसियत से जीने और बोलने का हक देता है, और किसी भी सभ्य समाज में, लोकतंत्र में, कोई भी हक बिना जिम्मेदारी के नहीं मिलता। इसलिए जब प्रधानमंत्री ने मणिपुर का वीडियो फैलने के बाद हिन्दुस्तान के 140 करोड़ लोगों का सर अपने हाथों से पकडक़र शर्म से झुका दिया था, तो इसका मतलब है कि देश के हर आम नागरिक, यहां तक कि बच्चों पर भी मणिपुर को लेकर शर्मिंदगी की जिम्मेदारी थी। और वह जिम्मेदारी उन लोगों पर कितनी अधिक होनी चाहिए जो कि देश में हजार से भी कम सांसद हैं, और जिनमें से एक-एक दसियों लाख लोगों के प्रतिनिधि हैं। ऐसे में इन सांसदों के सिर अपने इलाके के हर नागरिक की तरफ से एक-एक बार, यानी इन महीनों में दसियों लाख बार शर्म से झुक जाने थे, लेकिन ये सिर एक ऐसे गर्व और उन्माद से तने हुए दिखते रहे कि मानो मणिपुर म्यांमार का हिस्सा है।

यह बात महज कल ही संसद में सामने आई हो, ऐसा भी नहीं, हम तीन मई से लगातार प्रधानमंत्री से लेकर नीचे तक, तमाम लोगों से मणिपुर पर मुंह खोलने की अपील करते रहे, और इसी जगह पर हमारे नियमित पाठक हो सकता है कि उसे पढ़-पढक़र थक भी गए हों, क्योंकि सत्तारूढ़ सांसदों से परे भी बहुत से लोग मणिपुर को अपना हिस्सा नहीं मानते। इस दौरान देश के सैकड़ों सांसद हजार दूसरी बातों पर फख्र करते रहे, और उन्हें पहली बार तब पता लगा कि मणिपुर शर्मिंदगी की वजह है, जब 79 दिनों के बाद मोदी ने स्कूल के पाठ्यक्रम में मणिपुर का म शामिल किया। इस दौरान प्रधानमंत्री की चुप्पी लोकतंत्र के इतिहास के सबसे बड़े लाउडस्पीकरों पर चीखती रही, लेकिन देश की दर्जनों महिला सांसदों को प्रायमरी स्कूल की अपनी बाल भारती में मणिपुर का म न दिखा। ऐसे में कल देश की संसद में जब मणिपुर पर एक गंभीर चर्चा चल रही थी, तो एक हवाई चुम्बन के आरोप ने मणिपुर को पीछे धकेल दिया, मानो सडक़ किनारे किसी बार डांसर के लिए जुटी भीड़ वहां से जख्मियों को ले जा रही एम्बुलेंस को पीछे धकेल दे।

हमारी पूरी हमदर्दी उन महिलाओं के साथ हैं जिन्हें संसद में राहुल गांधी के एक हुए, या न हुए, इशारे या भावभंगिमा से चोट पहुंची है। हम उनकी शिकायत को कम नहीं आंक रहे हैं, लेकिन जब हरियाणा जल रहा हो, उस वक्त सडक़ किनारे पानठेले पर पान में चूना ज्यादा लग जाने की एफआईआर दर्ज कराने थाने पर बवाल कर रहा हो, तो उसकी बात आसानी से गले नहीं उतरती। जाहिर तौर पर चूना अधिक लगाने वाले पानठेले वाले को मुल्क के कानून के मुताबिक जो सजा हो सकती हो, वह होनी चाहिए, लेकिन क्या जलते हुए प्रदेश के बीच ग्राहक की यह शिकायत पुलिस को दंगाईयों की तरफ से मोडक़र पानठेले पर ले जाए?

हमने कल भी इस अखबार के यूट्यूब चैनल पर साफ-साफ यह बात कही थी कि लोकसभा अध्यक्ष को इस मामले की जांच कैमरों की रिकॉर्डिंग से तुरंत करवानी चाहिए, और सदन के नियमों के मुताबिक कार्रवाई करनी चाहिए। लेकिन जो लोकसभा अध्यक्ष एक तना हुआ चेहरा लेकर, लोकसभा चैनल के टीवी प्रसारण में राहुल के भाषण के वक्त भी उसे दिखाते रहते हैं, उन्हें देश के लोकतंत्र और मणिपुर के साथ इंसाफ के लिए संसद की बहस को मणिपुर पर केन्द्रित रखना चाहिए, या अविश्वास प्रस्ताव के दूसरे गंभीर मुद्दों पर। जिस मामले में लोकसभा के कैमरों की रिकॉर्डिंग अध्यक्ष के अपने कब्जे में हैं, उसे लेकर आज की संसद का आज का वक्त चुम्बन-चर्चा पर खर्च नहीं करना चाहिए, क्योंकि उस पर सुनवाई और सजा तो संसद का विशेषाधिकार है ही। राहुल गांधी ने अगर कोई अशोभनीय काम किया है, तो वे उसके लिए संसद के प्रति जवाबदेह हैं, और संसद उस पर सजा सुनाने के लिए जरूरत से अधिक हक रखती है। फिलहाल इस देश के लोकतंत्र को मणिपुर जैसे मुद्दे पर बहुत देर से टूटी अपनी नींद के बाद अब बात करनी चाहिए। मणिपुर में सामूहिक बलात्कार की शिकार आदिवासी महिलाओं को कल विश्व आदिवासी दिवस पर भारतीय संसद में उन पर होती हुई चर्चा के बीच एक हवाई चुम्बन के शक से जख्मी और लहूलुहान हो गई महिलाओं को देखकर हैरानी हो रही होगी। एक कथित हवाई चुम्बन का आरोप अगर मणिपुर की बलात्कार-पीडि़त महिलाओं को पीछे धकेलकर संसद में सामने की सीट पर कब्जा कर सकता है, तो फिर ऐसी महिला सांसदों के लिए ही किसी शायर ने बहुत पहले लिक्खा था- हाकिम को इक खत लिक्खो, और उसमें लिक्खो लानत है।

और इस खत को भेजने का पता तो बड़ा आसान है, संसद भवन, नई दिल्ली।

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