/भारतीय खुफिया विभाग की ” पैनी नजर ” है ” स्वयंभू गुरु ” रविशंकर पर

भारतीय खुफिया विभाग की ” पैनी नजर ” है ” स्वयंभू गुरु ” रविशंकर पर

-शिवनाथ झा।।

कहते हैं “लाख छुपाओ छुप न सकेगा राज़ हो कितना गहरा, दिल की बात बता देता है असली नकली चेहरा”। स्वयं-भू आध्यात्म गुरु और ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ के संस्थापक के मुख से कुछ ऐसा ही निकला और भारतीय खुफिया एजेंसी जागरूक हो गईं उस कड़ी को जोड़ने में जहाँ पांच साल पूर्व पश्चिम बंगाल के तामलुक क्षेत्र के नंदीग्राम इलाके के एक लगभग जंगल में बसे एक स्कूल में गए थे आध्यात्म गुरु नंदीग्राम नर-संहार के बाद।

अपने बयान की सफाई में रविशंकर भले ही यह कहें: “मैंने यह नहीं कहा था कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले सभी बच्चे नक्सली बनते हैं। कई महान योग्य लोग सरकारी स्कूलों से पढ़ कर निकले हैं। मैंने खासतौर पर ऐसे बीमार सरकारी स्कूलों की ओर इशारा किया था जो नक्सल प्रभावित इलाकों में चल रहे हैं। नक्सलवाद का दामन थामने वाले कई लोग इन्हीं स्कूलों से पढ़े हैं।”

कहीं अनचाहे में उन्होंने पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम क्षेत्र में स्थित उस स्कूल के बारे में तो नहीं कह दिया जहाँ वो नंदीग्राम हत्या-कांड के पश्चायत उस स्कूल के “मास्टर” से मिलने कलकता से करीब 220 किलोमीटर यात्रा करके पहुंचे थे। चाहे जो भी हों, रविशंकर तो “लपेटे” में आते दिख रहे हैं।

केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बतल ने तो यहाँ तक कह दिया कि “श्री श्री रविशंकर मानसिक संतुलन खो चुके हैं। मैंने सरकारी स्कूलल में पढ़ाई की है, मैं नक्सूली नहीं हूँ। बीजेपी एक वरिष्ट नेता ने भी रवि शंकर को आड़े लिया । सैयद शाहनवाज हुसैन कहते हैं: “गरीब बच्चेक सरकारी स्कूलों में ही पढ़ते हैं। सरकारी स्कूल देश की नींव हैं। ”

भारत में “बाबाओं की दुकान” चल रही है। कोई भभूत से चला रहा है, कोई पेट घुमा रहा है, तो कोई जीवन का रहस्य बता रहा है। दुर्भाग्य तो इस देश के 121 करोड़ आवाम का है जिसे अपने माता-पिता को पैर छूकर प्रणाम करने में कमर की हड्डी झुकती नहीं, बाबाओं को “पैर से सर तक छूने” में कोई कसर नहीं, कोई कोताही नहीं। जय हो।

अगर सूचनाएं गलत नहीं है तो आने वाले दिनों में एक बार फिर से दिल्ली का न्यायिक व्यवस्था, कचहरी इन “बाबाओं” की गतिविधियों से जगमगाने वाली है और ये बाबा लोग समाचारपत्र और टीवी चैनलों पर “सुर्खियों” में आनेवाले हैं। लोगों की जीवन जीने का पाठ बढ़ाने वाले आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थाीपक और आध्यावत्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर वैसे अपने ही बयान से विवादों में घिर गए हैं। उन्होंने कहा था कि सरकारी स्कूीलों में पढ़ने वाले बच्चेक ही नक्स ली बनते हैं।

जानकर सूत्रों के अनुसार “आर्ट ऑफ़ लिविंग” के संस्थापक और “स्वयंभू गुरु” रविशंकर के क्रिया-कलाप पर भारतीय खुफिया एजेंसी की निगाह टिकी है। खुफिया एजेंसी पिछले पांच वर्षों से इस बात की तहकीकात कर रही है की पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम क्षेत्र में हुए नरसंहार के बाद रविशंकर तामलुक इलाके से करीब 25 किलोमीटर दूर अन्दर गाँव में किस विद्यालय में गए थे?

सूत्रों के मुताबिक लोगों को जीवन जीने की पाठ पढ़ाने वाले “तथाकथित” आध्यात्म गुरु का सम्बन्ध कही पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा और मध्य प्रदेश के कार्यरत भूमिगत सेना, नक्शल या राष्ट्र की शांति-व्यवस्था को भंग करने के लगे अन्य लोगों और संगठनों से तो नहीं है? जानकर सूत्रों को कहना है कि नंदीग्राम कांड के बाद इस विषय से सम्बंधित आंतरिक जांच में पश्चिम बंगाल के तत्कालीन सरकार, मुख्य मंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य, स्थानीय प्रशाशन से कोई मदद नहीं मिली थी, लेकिन “सभी टूटे तारों को जोड़ने की कोशिश जारी है।”

जानकर सूत्रों के अनुसार , भारत के “तथाकथित आध्यात्म गुरु एक संदेहास्पद स्थिति में नंदी ग्राम हत्या काण्ड के पश्चात नंदीग्राम के अधिकारी पाड़ा स्थित एक निजी विद्यालय में गए थे। वहां के स्थानीय शिक्षक और कुछ ऐसे व्यक्तियों से मिले थे जिसका सम्बन्ध संभवतः उनलोगों से रहा था जो उस हत्या कांड में कथितरूप से लिप्त थे।”

तामलुक के स्थानीय लोगों का कहना है कि हत्या कांड के पश्च्यात भयभीत हजारों ग्रामीण, महिला, पुरुष, बच्चे, बृद्ध, गर्भवती महिलाएं, बीमार महिलाएं सभी शहर के बीचों-बीच स्थित एक स्कूल में शरण लिए थे। स्थानीय लोगों और स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद से, साथ ही स्थानीय प्रशाशन के सहयोग से लोगों को खाना-पीना मिलता था। एक दिन आध्यात्म गुरु भी अपने काफिले के साथ वह आये थे और लोगों से बातचीत किये थे। इनके अतिरिक्त कई अन्य स्वयंसेवी संस्थाओं के लोग, नेतागण भी आये थे।

अधिकारीपाड़ा गाँव के एक निवासी का कहना है कि “वैसे यह कोई अधिकारिक तौर पर स्कूल नहीं था लेकिन गाँव के युवा लोग यहाँ आते रहते थे। उनके साथ कुछ अपरिचित लोग भी आते रहते थे जिन्हें समय समय पर स्कूल के मास्टर मदद भी करते थे। यह नहीं मालूम की मास्टर साहेब या आने-जाने वाले लोगों का क्या सम्बन्ध था। घटना के बाद गुरूजी (रविशंकर) भी यहाँ आये थे, लेकिन कोई उनसे मिला नहीं, जो जनता था वह था नहीं, और इलाके के लोग उन्हें जानते नहीं थे।”

ग़ौरतलब है कि 2007 के उत्तरार्ध पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से करीब 220 किलोमीटर दूर तामलुक क्षेत्र के नंदीग्राम में ममता बनर्जी और तत्कालीन सीपीएम सरकार के भूमिगत सेनाओं की दबंगई के सामने 14 लोगों की हत्या कर दी गई थी और 150 से अधिक लोगों को जख्न्मी किया गया था। गाँव का गाँव आग में स्वाहा हो गया था। कितनी महिलाओं को, गर्भवती सहित, खुलेआम बलात्कार किया गया था, जवान लड़कियों को उनकी माता-दादी के सामने नग्न कर उसकी आबरू लूटी गई थी।

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.