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बच्चों को अनाथ कर, मौत की छलांग लगाने में शादी-शुदा पुरुष महिलाओं से आगे Suicide: Part-3

By   /  May 8, 2012  /  3 Comments

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“सात समुंदर पार से, गुड़ियों के बाज़ार से, अच्छी सी गुड़िया लाना, गुड़िया चाहे ना लाना, पप्पा जल्दी आ जाना”
आत्म-हत्या की दौड़ में भारत में शिक्षित व्यक्तियों ने अशिक्षितों को रौंदा, 
शादीशुदा पुरुष मौत की छलांग लगाने में महिलाओं से आगे…..

-शिवनाथ झा ||

फ़िल्म ‘तक़दीर’ में गोपाल (भारत भूषण) और शारदा (शालिनी) अपने दो बेटियों और एक बेटे के साथ रहते हैं. आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी ना होने की वजह से गोपाल के मन में विदेश जाकर नौकरी करने का ख़याल आता है. जिस नाव में वो सफ़र कर रहे होते हैं वो तूफ़ानी समुंदर में डूब जाती है और वो कभी घर नहीं लौटता. इसी सिचुयशन पर वो तीन छोटे बच्चे अपने पिता के इंतेज़ार में यह गीत गाते हैं – “सात समुंदर पार से, गुड़ियों के बाज़ार से, अच्छी सी गुड़िया लाना, गुड़िया चाहे ना लाना, पप्पा जल्दी आ जाना”. यह बच्चों का अपने पिता के नाम संदेश है, जहाँ एक तरफ़ मासूमियत और अपने पिता के जल्दी घर लौट आने की आस है, वहीं बच्चों की परिपक्वता भी दर्शाता है. आप चाहे कुछ भी ना लाओ हमारे लिए, लेकिन बस आप जल्दी से आ जाओ.
कितने मार्मिक हैं यह शब्द. लेकिन आज के माता-पिता कहाँ बच्चों की इस मार्मिक व्यथा को सुनने को तैयार है. भारत में आत्म-हत्या करने वालों की कतार में अशिक्षित व्यक्तियों की तुलना में शिक्षित व्यक्ति ज्यादा आत्म-हत्याएं कर रहे हैं. “गोपाल” तो समय के चक्र में फंस गया और मौत का शिकार हों गया, यहाँ तो, परिस्थितियों को देखकर ही, सामना करने की बात छोड़ दें, लोग, चाहे उनके बच्चे सड़कों पर कटोरा लेकर भीख मांगे या फिर अपने जिस्म को बेच कर अपने छोटे भाई-बहनों को पाले, आत्म-हत्या कर भारत में होने वाले आत्म-हत्याओं की श्रृंखला में अपना नाम दर्ज कराने को ज्यादा तबज्जो देते हैं. धिक्कार है, ऐसी मानसिकता पर, ऐसे माता-पिता को.
पिछले तीन वर्षों में जहाँ अशिक्षित व्यक्तियों द्वारा आत्म-हत्या करने का प्रतिशत बीस फीसदी है, पढ़े-लिखे लोग, चाहे वह प्राईमरी या स्नातकोत्तर की डिग्री लिए हों, आत्म-हत्या करने का प्रतिशत अस्सी फीसदी है. जिसमे प्राईमरी से हायर सेकेंडरी स्तर तक का प्रतिशत साठ फीसदी के करीब है. क्या फायदा पढने से? जब सोच नहीं बदले या समस्याओं से जूझने की ताकत नहीं हों? कभी सोचते हैं ये माता-पिता या अभिभावक की उनके जाने के बाद उनके मासूम बच्चों का क्या होगा?
यदि भारत सरकार के आंकड़ों पर ही विश्वास किया जाये तो पिछले पांच वर्षों में कम से कम छः लाख से अधिक बच्चे “अनाथ” हुए, सिर्फ माता-पिता की एक भूल के कारण. और वह थी उनके द्वारा आत्म-हत्या करना. औसतन साठ हज़ार शादी-शुदा पुरुष और तीस हज़ार से अधिक शादी-शुदा महिलाएं, जिनके कम-से-कम दो बच्चे थे, आत्म-हत्या कर अपने जीवन का अंत किया. क्यों नहीं कभी सोचते ये माता-पिता की उनके मरने बाद उस “अनाथ” बच्चे का क्या होगा? कौन देखेगा? क्यों नहीं महसूस करते कि उनके जाने के बाद उनकी बेटी को आने वाले दिनों में समाज के लोग उसे नोच-नोच कर खा जायेंगे.
वैसे भारत में समाज के लोगों से लड़कियों की रक्षा की अपेक्षा करना जीवन का सबसे बड़ी भूल होगी, क्योकि यहाँ तो माँ के कोख में ही ये सभी भ्रूण-हत्या (लड़की के मामले में) पर आमादा हैं, जन्म के बाद और बढती उम्र में ऐसे अनाथ बच्चो के ऊपर तो गिद्ध की तरह चोंच मारना लाजिमी हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो फिर भारत में 123 करोड़ अवाम की मानसिकता बदलने आमिर खान जैसे कलाकार को “सत्यमेव जयते” नहीं बनाना पड़ता.
“गरीबी” एक बीमारी हों सकती है, जो “ना-इलाज” नहीं होती है. लेकिन “गरीबी” से त्रस्त होकर आत्म-हत्या को गले लगायें, यह कायरता है.
पिछले २००८ से उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2008 में निरक्षर या अनपढ़ व्यक्तियों द्वारा आत्म-हत्याओं का प्रतिशत 20.7 प्रतिशत था जो 2009 में बढ़कर 21.4 प्रतिशत हुआ, लेकिन अगले वर्ष 2010 में 19.8 और 2011 में 19.4 प्रतिशत रहा. वहीँ, दूसरी ओर, 2008 में 79.3 प्रतिशत शिक्षित व्यक्तियों ने आत्म-हत्याएं की, जो 2009 में 87.6 प्रतिशत हुआ और 2010 तथा 2011 में क्रमशः 80.2 प्रतिशत तथा 80.6 प्रतिशत बरक़रार रहा.
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, “शिक्षित और अशिक्षित लोगों की सोच में, जहाँ तक आत्म-हत्या का सवाल है, एक मूलभूत अंतर होता हैं. अशिक्षित व्यक्ति प्रायः ऐसी स्थिति होने पर अपने गुस्से को अपनी पत्नी, अपने बच्चों पर उतरता है. लेकिन इसकी भी समय सीमा बहुत कम होती है. ज्यादा से ज्यादा वह सबों को छोड़कर घर से भाग जाता है और वर्षों भागा रहता है, अपनी पत्नी, परिवार या बच्चों को छोड़कर. लेकिन जब भी वापस आता है, जीवित आता है. लेकिन, शिक्षित व्यक्तियों में ऐसी प्रवृति का बहुत अभाव होता है.”
मनोवैज्ञानिक फिर कहते हैं: “आप प्रायः झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोगों की पत्नियों को प्रायः प्रत्येक रात मार खाने की चीख सुनेंगे. लेकिन उसकी पत्नियाँ कभी भी उसे छोड़कर जाती नहीं, पिटती रहती है, शरीर पर असंख्य मार खाने की निशानों को अपने आँचल से ढंकती रहती है, लेकिन रहती है अपने पति और बाल-बच्चों से चिपककर. ऐसे भावनात्मक संबंधों का अभाव है, आज के शिक्षित वर्गों में, नहीं तो आत्म-हत्या करने के आंकड़े कभी अस्सी फीसदी नहीं होते.” यदि देखा जाये, तो मनोवैज्ञानिक के इस कथन में बहुत दम है.
भारत में शादी-शुदा लोग तो आत्म-हत्या करते ही हैं, आज-कल विधुर और विधवाएं भी  आत्म-हत्या करने लगे हैं. प्राप्त आंकड़ों के अनुसार पिछले 2010 में जहाँ 61,453 शादी-शुदा पुरुषों ने आत्म-हत्या कर अपना जीवन समाप्त किया, वहीँ 31,754 महिलाओं ने आत्म-हत्या कर प्राण त्यागे. अविवाहित पुरुषों की संख्या 19,702 है जबकि 11,108 अविवाहित महिलाओं ने आत्म-हत्याएं की. विधुर और विधवाएं क्रमशः 2777 तथा 2371 आत्म-हत्याएं की. इतना ही नहीं, विवाहित सम्बन्ध विच्छेदित 2513  पुरुषो ने प्राणांत किया, जबकि महिलाओं की संख्या 1404 है. आकंड़ों के अनुसार, उसी वर्ष, 735 परित्यक्त (पुरुष) और 782 परित्यक्ता (महिलाएं) ने भी आत्म-हत्या को सर्वोपरि स्थान दिया.
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  • Published: 6 years ago on May 8, 2012
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  • Last Modified: May 9, 2012 @ 10:30 am
  • Filed Under: बहस
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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

3 Comments

  1. Meraj Alam says:

    MOHABBAT KARNE KE LIYE JINDAGI CHAOTI PARTI HAEN MARNE KE LIYE TIME KESSE MILTA HAEN INKO.

  2. Shivnath Jha says:

    Yes sir, it is 'expectation from their children' without knowing the fact whether he/she is able to cope-up or not.

  3. Vipin Mehrotra says:

    Many educated people are those pushed for higher education by parents but unsuccessful causing depression which is main reason for suicides.

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