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सीमा, साजिश और सलाखें

-आवेश तिवारी

सीमा आजाद और उनके पति विश्वविजय को आजीवन कारावास की सजा हो गयी. इस सजा के विरोध में अलग-अलग मंचों से उठ रही आवाजों में जोर आ गया है,  कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं,  प्रदर्शन की तैयारियां हो रही है,  यूँ लगता है जैसे सीमा की सजा देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ हो रही साजिशों के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी जनक्रांति का सूत्रपात करेगी. मगर अफ़सोस इन आवाजों में तमाम आवाजें ऐसी हैं जो उनकी गिरफ्तारी के बाद खामोश थी,  एक तरफ सीमा और उनके पति के हाथ में हथकडियां लगाई जा रही थी तो दूसरी तरफ तमाम जनवादी संगठन. अखबारी समूह और पत्रकारों के हक की लड़ाई का दावा करने वाले कुनबे सत्ता की इस बरजोरी के खिलाफ न सिर्फ सहमे हुए थे बल्कि सामूहिक और व्यक्तिगत तौर पर भी साजिशों का दौर चल रहा था. इन साजिशों में सिर्फ सीमा के दुश्मन ही नहीं दोस्त भी शामिल थे. टीवी पर इन दोनों की गिरफ्तारी के बाबत दिखाई जाने वाली ख़बरों में भी सच्चाई की एक ही सुरंग थी  और वो थी  सत्ता का पक्ष. सत्ता का वर्जन. उनके पास अपनी कोई हूक नहीं कि वो पुलिस की दी गयी सूचना पर सवाल खड़ा कर सके. जनसरोकारों के बाबत जाना  जाने वाला “जनसत्ता” भी उस दिन कलम के एक साहसी सिपाही की इस शर्मनाक गिरफ्तारी के सम्बन्ध में उफ़ तक नहीं कर सका. हालाँकि ये बात दीगर है कि आज वही जनसत्ता,  शोर मचा रहा है. इन सबके बीच सबसे आश्चर्यजनक चुप्पी पीयूसीएल की थी,  पीयूसीएल उनके सजा दिए जाने के बावजूद आज भी  चुप है,  खबर तो यहाँ तक है कि सीमा आजाद की गिरफ्तारी के बाद पीयूसीएल की उत्तर प्रदेश शाखा ने सीमा को संगठन से बाहर का रास्ता दिखा दिया,  हालाँकि इस उत्तर के समर्थन या प्रतिवाद में कोई भी कुछ कहने को तैयार नहीं है.

 

सीमा आजाद की गिरफ्तारी के 24 घंटे भी नहीं हुए थे, जब उनके एक बेहद करीबी दोस्त ने, जो एक नामचीन कवि भी हैं, उनसे कोई नाता होने से इनकार कर दिया था. सीमा की एक और मित्र, जिसे खुद की गिरफ्तारी का भी अंदेशा बना हुआ था, पुलिसवालों से मिलकर अपनी साफगोई बयान कर रही थी. सीमा की गिरफ्तारी के बाद जिन लोगों ने संसद भवन के बाहर धरना दिया था, उनमें से एक ने मुझसे फोन पर बच-बचा कर लिखने को कहा और बोला कि इस तरह से उसके पक्ष में लिखोगे तो पुलिस तुम्हे नहीं छोड़ेगी. उन्होंने ये भी कहा कि “यार मैं नहीं जानती थी, पूरे एक ट्रक नक्सली सामग्री बरामद हुई है. मुझसे एसटीएफ का एसपी कह रहा था, सीमा हार्डकोर नक्सली है और हमें ये सच मानना ही होगा.. मैंने तो अरुंधती और सब लोगों को ये सच बता दिया है.” जिसने मुझे फोन किया था वो वही था जिसके लिए जनसत्ता के शूरवीर लड़ाई लड़ते रहे हैं. सिर्फ जनसत्ता ही नहीं एक साहसिक पत्रकार की मनमाने ढंग से की गयी गिरफ्तारी पर उत्तरप्रदेश सरकार के सामने अपना अधोवस्त्र खोल कर बैठे अखबारों के पास कहने को कुछ भी नहीं था. अन्याय और शोषण के विरुद्ध शुरू किये गये अपने एकल युद्ध में अकेले खड़ी थी सीमा.इस बात का पूरा इमकान है कि सीमा की गिरफ्तारी से पहले ही इलाहाबाद के तमाम अखबारों,  पीयूसीएल के कुछ सदस्यों और सीमा के कुछ साथियों को इस बात की जानकारी हो चुकी थी कि किसी भी वक्त सीमा को सलाखों के पीछे कसा जा सकता है.

सीमा की गिरफ्तारी के पहले और बाद में मीडिया मैनेजमेंट के लिए पुलिस ने क्या क्या किया और किस किस पत्रकार ने क्या क्या पाया, ये अपने आप में बड़ी रोमांचक कहानी है. इलाहाबाद के डीआईजी के घर में सीमा की गिरफ्तारी से महज कुछ घंटे पहले बैठकर चाय पीने और एसटीएफ के एसपी नवीन अरोरा को सीमा के खिलाफ हल्ला बोलने का आश्वासन देने वालों के चेहरे उतने ही काले हैं, जितनी कि उनकी कलम की रोशनाई. सीमा की गिरफ्तारी और उसके बाद मीडिया के एक वर्ग द्वारा पुलिस की भाषा में की गयी क्राइम रिपोर्टिंग ने ये साबित कर दिया कि उत्तर प्रदेश में पुलिस अपनी सफलताओं का तानाबाना दल्ले पत्रकारों और टायलेट पेपर सरीखे अखबारों के मालिकानों की मिलीभगत से तैयार कर रही थी. होड़ इस बात की लगी हुई थी  कि कौन सा समूह और कौन सा पत्रकार सरकार और सरकार के नुमाइंदों के सबसे नजदीक है.इस बात को कहने में गुरेज नहीं होना चाहिए कि इस होड  में जनसत्ता भी किसी से पीछे नहीं था.

अगले ही दिन प्रदेश के एक बेहद चर्चित और जनसत्ता के एक पत्रकार ने  लखनऊ में एसटीएफ मुख्यालय से मुझे फोन करके कहा कि आवेश भाई आप नहीं जानते, मैंने आज माओवादियों का वो रजिस्टर देखा जिसमें सीमा के दस्तखत थे. वो और उसका पति तो बकायदा माओवादियों की साजिशों के सूत्रधार की भूमिका में थे. आप एक बार आकर यहां अधिकारियों से मिल लीजिए. आपकी सीमा को लेकर धारणा बदल जाएगी. मेरी धारणा बदली या नहीं बदली, उस दिन जो पत्रकार एसटीएफ मुख्यालय में मौजूद थे, उन लोगों ने बारी बारी से सीमा के खिलाफ खबरें निकालने का सिलसिला शुरू कर दिया और उन पत्रकार महोदय को जिन्होंने मुझे फोन पर सच्चाई का ज्ञान कराया था, नक्सल प्रभावित इलाकों में पंफलेट और पोस्टर छपवाने एवं उत्तर प्रदेश पुलिस के नक्सली उन्मूलन को लेकर की जा रही कवायद को लेकर एक बुकलेट छपवाने का ठेका मिल गया. वो ये काम पहले भी करते आये हैं और इस काम में वे इलाहाबाद के एक प्रिंटिंग प्रेस की मदद से लाखों की कमाई पहले भी करते आये हैं.सीमा की सजा,  एक्टिविज्म और जनर्लिज्म के उस चेहरे को बेपर्दा करती है जिस चेहरे पर पुती कालिख लगातार सुर्ख होती जा रही है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.