मोरबी में भाजपा का छल-कपट

बड़े-बुजुर्गों की सीख है कि अगर गलती हो जाए, तो उसे स्वीकार करने में कोई बुराई नहीं है। क्योंकि इसके बाद सुधार की गुंजाइश और माफी की उम्मीद दोनों ही बनी रहती है। रविवार को हुए मोरबी कांड के बाद भाजपा भी अगर इसी सीख पर चलती तो आज जिस तरह वह घिरी दिख रही है, वैसा नहीं होता। लेकिन जिम्मेदारी लेने और गलती सुधारने की जगह फिलहाल इस पर लीपापोती की कोशिशें चल रही हैं, जो भाजपा के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती हैं। प्राकृतिक आपदाओं को रोका नहीं जा सकता, केवल उसके नुकसान को कम किया जा सकता है। मगर मोरबी जैसी दुर्घटनाओं में दोष प्रकृति पर नहीं डाला जा सकता, न ही इस वक्त विरोधी दल पर ठीकरा फोड़ा जा सकता है। इसलिए शुरुआती कोशिश जनता को ही कसूरवार ठहराने की हुई, जिसके बाद अब जनता की नाराजगी और अधिक बढ़ती दिख रही है।

जब घायलों से मुलाकात के लिए प्रधानमंत्री मोदी का मोरबी दौरा तय हुआ तो उससे पहले सिविल अस्पताल का कायापलट करने की जो कोशिशें हुईं, उससे भी जनता के बीच सही संदेश नहीं गया। सोशल मीडिया पर एक पत्रकार ने खबर दिखाई कि कैसे प्रधानमंत्री के आगमन से पहले हड़बड़ी में नया वॉटर कूलर यानी ठंडे पानी की मशीन लगाई गई, मगर उस मशीन को न नल से जोड़ा गया, न बिजली की व्यवस्था की गई। इससे समझ आता है कि जो भी इंतजाम किए गए, वे दिखावे के मकसद से हुए, न कि आम जनता की सुविधा के लिए। वैसे हिंदुस्तान की आम जनता सरकारी अस्पतालों या इस तरह के सार्वजनिक स्थलों की असलियत से खूब परिचित है। गंदगी, संसाधनों की अनुपलब्धता और अस्त-व्यस्त इंतजाम, इन सब को जनता रोजाना झेलती है। मगर ये बात समझ से परे है कि हिंदुस्तान के नेता इस हकीकत से अनजान क्यों बने रहते हैं।

बहरहाल, प्रधानमंत्री ने रविवार को हुए हादसे के दो दिन बाद मंगलवार को मोरबी के अस्पताल में पीड़ितों के हाल-चाल लिए। अभी ये पता नहीं है कि उन्होंने उन लोगों से मुलाकात की या नहीं, जिन्होंने अपनी जान पर खेल कर डूबते लोगों की जिंदगियां बचाईं। जैसे तौफीक भाई, चायवाला राजू, हुसैन पठान इन लोगों ने अपूर्व साहस का परिचय देते हुए नदी में फंसे लोगों को तैर-तैर कर बाहर निकाला। नईम शेख नाम का युवक भी हादसे का शिकार हुआ, उसके एक दोस्त की इसमें मौत हो गई, लेकिन उसने अपने साथ-साथ कई लोगों को डूबने से बचाया और घायल अवस्था में उन्हें बाहर निकलने में मदद की। असल जिंदगी के इन नायकों से भी प्रधानमंत्री मुलाकात करते तो फिर कपड़ों से किसी की पहचान बताने की जरूरत नहीं पड़ती। इसी गुजरात ने सांप्रदायिक दंगों के गहरे जख्म खाएं हैं। इंसानियत को बचाने वाले तब भी जिंदा थे और आज भी हैं, ये बात फिर साबित हो गई।

मोरबी कांड में तीन दिन बाद बुधवार को गुजरात सरकार ने राज्यव्यापी शोक का ऐलान किया, जिसमें सरकारी झंडे आधे झुकते हैं और कोई सरकारी आयोजन या कार्यक्रम नहीं होता। राज्यव्यापी शोक की ये टाइमिंग भी संयोग है या प्रयोग, ये देखना होगा। क्योंकि रविवार से लेकर मंगलवार तक प्रधानमंत्री गुजरात में मौजूद थे और इस दौरान कई कार्यक्रम हुए। अगर शोक पहले घोषित होता, तो कोई भी कार्यक्रम नहीं होता और उनका दौरा या तो छोटा करना पड़ता या दो दिन व्यर्थ चले जाते। इसलिए शायद बेहतर यही समझा गया होगा कि जब प्रधानमंत्री दिल्ली लौट जाएंगे, तो शोक मना लिया जाएगा।

सरकार एक दिन के सांकेतिक शोक की औपचारिकता निभा सकती है। जबकि कड़वी हकीकत तो ये है कि जिनके सगे-संबंधी असमय चले गए, या जो इस हादसे में बच गए, उनके जीवन में शोक कभी खत्म नहीं होगा। अगर समय पर इंसाफ मिले तो दुख थोड़ा कम जरूर हो सकता है। मगर यहां भी चालबाजियां की जा रही हैं। इस मामले में पुलिस ने जो बयान स्थानीय अदालत में दर्ज कराया है, उसमें पता चलता है कि हादसा पुल की मरम्मत में लापरवाही की वजह से हुआ।

पुल जिन तारों के सहारे लटका हुआ था, उनमें से कई टूटे और जंग खाए हुए थे, उन्हें तेल या ग्रीस लगाकर सुधारा नहीं गया था। जांच में ये भी पता चला है कि पुल पर जो एल्युनमीनियम के तख्ते लगे हुए थे, वो काफी वजनदार थे, जिससे पुल पर बोझ बढ़ रहा था। इसके साथ ही बिना अनुमति के पुल खोला गया और बेहिसाब तरीके से लोगों को इस पर चढ़ने दिया गया। इस तरह ये सारा मामला साफ-साफ लापरवाही का दिख रहा है। लेकिन पुल की ठेकेदार कंपनी ओरेवा के मैनेजर ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट और अतिरिक्त वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश एमजे खान के सामने बयान दिया कि यह भगवान की इच्छा थी कि ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना हुई।

इस कंपनी से यह पूछा जाना चाहिए कि जब सब कुछ भगवान भरोसे ही है, तो फिर रख-रखाव के लिए जो करोड़ों की राशि सरकार से ली, वह भी मंदिर में ही क्यों नहीं दी गई। अपनी गलती को भगवान की मर्जी बतलाना विशुद्ध धूर्तता है और इसके सिवा कुछ नहीं है। गरीब जनता अपनी पूरी जिंदगी भाग्य को कोसते और भगवान की मर्जी समझ कर कष्टों में काट लेती है, जबकि उसकी इस हालत के लिए जिम्मेदार लोग उसके हिस्से की सुविधाओं को हड़प कर मजे से रहते हैं। मोरबी के दुख के बाद ही सही लेकिन अब लोगों को इस चालाकी और कपटपूर्ण रवैये को समझ लेना चाहिए, जो फिलहाल राजकीय शोक और रंग-रोगन के नीचे दबाए जा रहे हैं।

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