गुजरात चुनाव : कुछ तथ्य

Gujarat Elections: Some Facts

लंबे इंतजार के बाद आखिरकार केन्द्रीय निर्वाचन आयोग ने गुजरात विधानसभा चुनावों की तारीखों का ऐलान कर दिया। पिछली बार की तरह इस बार भी आयोग ने गुजरात चुनाव को दो चरणों में करवाने का फैसला लिया है। जिसमें पहले चरण के लिए एक दिसंबर और दूसरे चरण के लिए पांच दिसंबर को मतदान होंगे और चुनावों का नतीजा 8 दिसंबर को आएगा।

वहीं हिमाचल प्रदेश के चुनाव 12 नवंबर को हैं और इसके नतीजे भी 8 तारीख को ही आएंगे। जब 15 अक्टूबर को आयोग ने हिमाचल प्रदेश चुनावों की घोषणा की थी, तब भी यह सवाल उठा था कि इसके साथ ही गुजरात चुनाव का ऐलान क्यों नहीं हुआ। जब एक देश एक चुनाव के मंसूबे बांधे जाते हैं, तो दो राज्यों के चुनाव एक साथ कराने में क्या अड़चन है, यह विचारणीय है।

यह ध्यान देने वाली बात है कि इस बार दोनों राज्यों के चुनावों में मुद्दों और परिस्थितियों में कई समानताएं हैं। दोनों राज्यों में भाजपा की सत्ता है और मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस है, जो इस बार भाजपा को कड़ी चुनौती दे रही है, जबकि मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने के लिए आम आदमी पार्टी भी मैदान में है। आप को भाजपा की बी टीम कहा जा रहा है। यानी उसे चुनाव में इतना बढ़ावा इसलिए मिल रहा है ताकि वह कांग्रेस के वोट काट सके और इससे भाजपा की जीत का रास्ता तैयार हो जाए।

लेकिन इस बार एंटी इन्कमबेंसी यानी सत्ता विरोधी लहर दोनों राज्यों में महसूस की जा सकती है। तो इससे ऐसा भी हो सकता है कि आप और भाजपा दोनों की उम्मीदों के विरुद्ध कांग्रेस को ही जीत मिल जाए। हिमाचल प्रदेश में तो वैसे भी हर पांच साल में सत्ता बदलने का रिवाज है और भाजपा इस बार रिवाज बदलने का आग्रह लोगों से कर रही है।

लेकिन जनता महंगाई और बेरोजगारी की समस्याओं से इतनी तंग हो चुकी है कि शायद वह भाजपा के आग्रह को ठुकरा दे और कांग्रेस को सत्ता सौंप दे। कहने का आशय यह कि इस बार हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की जीत की संभावनाएं अधिक हैं और यहां के नतीजे गुजरात चुनाव को प्रभावित कर सकते हैं। मगर अब दोनों नतीजे एक साथ आएंगे तो भाजपा की यह बाधा दूर हो जाएगी।

वैसे गुजरात भाजपा का गढ़ है। पिछले 27 सालों से यहां भाजपा की सरकार है, जिसमें से 12 साल मुख्यमंत्री रहने का रिकार्ड नरेन्द्र मोदी के नाम है। एक तरह से गुजरात और मोदी एक-दूसरे के पर्याय बन चुके हैं। ऐसे में मोदीजी यह कतई नहीं चाहेंगे कि गुजरात में उनकी हार की जरा सी भी आशंका हो। चुनावों की घोषणा के एक दिन पहले तक वे गुजरात में ही थे। और इस दौरान ट्रेन को हरी झंडी दिखाने से लेकर सरदार पटेल की जयंती मनाने और आदिवासियों को संबोधित करने जैसे सारे काम उन्होंने किए। लेकिन इस बीच ही मोरबी में झूलते पुल के गिरने का हादसा भी हो गया। जिसमें तीन दिन बाद गुजरात सरकार ने राज्यव्यापी शोक रखा था। निर्वाचन आयोग चुनाव की घोषणा में देरी के पीछे यह तर्क दे रहा है कि मोरबी हादसे की वजह से ऐसा हुआ। मगर मोरबी कांड तो 30 अक्टूबर को हुआ था, और आयोग से 15 अक्टूबर से सवाल हो रहे थे कि गुजरात चुनाव के ऐलान में देर क्यों हो रही है। आयोग अपनी सौ प्रतिशत निष्पक्षता और ईमानदारी का दावा कर रहा है, लेकिन एक सवाल ये भी है कि आयोग के सामने ऐसे दावे करने की नौबत ही क्यों आई।

बहरहाल, अब चुनाव का ऐलान हो गया है और उन मुद्दों की चर्चा शुरु हो गई है, जिनके इर्द-गिर्द चुनाव होंगे। मोरबी कांड के बाद भाजपा के प्रशासन और उसके नेताओं के रवैये पर कई सवाल उठे। जनता इस हादसे पर नाराजगी दिखा रही है, मगर क्या यह नाराजगी भाजपा के वोट कम करेगी, इस बारे में यकीन से कुछ नहीं कहा जा सकता। उत्तरप्रदेश में भी लखीमपुर खीरी में किसानों को कुचलने की दर्दनाक घटना हुई थी, जिसमें आरोप केन्द्रीय मंत्री के बेटे पर ही लगे हैं, लेकिन फिर भी लखीमपुर खीरी में विधानसभा चुनावों में भाजपा को जीत ही मिली। अब ये देखना होगा कि गुजरात और उत्तरप्रदेश के मतदाताओं के मिज़ाज में कितना फर्क है। गुजरात में इस ताजातरीन हादसे के अलावा महंगाई और बेरोजगारी के मुद्दे हैं और इनके साथ बंदरगाहों पर भारी संख्या में मादक द्रव्यों का पकड़ाना भी सरकार के खिलाफ असर दिखा सकता है।

इस चुनाव में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भाजपा की ओर से नरेन्द्र मोदी ही मुख्य चेहरा हैं और भाजपा की कोशिश यही थी कि इस बार भी चुनाव नरेन्द्र मोदी बनाम राहुल गांधी हो। लेकिन ये कोशिश कामयाब नहीं हो रही, क्योंकि राहुल गांधी अभी भारत जोड़ो यात्रा में व्यस्त हैं और गुजरात प्रचार के लिए संभवत: नहीं आएंगे। प्रियंका गांधी हिमाचल प्रदेश में जुटी हैं और वे गुजरात आ सकती हैं। कांग्रेस के नवनिर्वाचित अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव अग्निपरीक्षा की तरह होंगे, क्योंकि इनके परिणाम उनके नेतृत्व को मजबूत या कमजोर साबित कर सकते हैं। वहीं भारत जोड़ो यात्रा की कांग्रेस के लिए राजनैतिक उपयोगिता भी चुनाव से सिद्ध हो सकती है।

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