स्मृति-शेष:‘प्रवक्ता’ की इति-कथा

-सुधेंदु पटेल।।

स्मृतियाँ आवारा बादलों सी हुआ करती है । दिमाग में यूँ ही बिना मौसम सहसा आ धमकती है और मन आँगन में फिरकी की तरह फिरकने लगती है। जो ‘आछे दिन पाछे गए’ वे पुनरवलोकन को भी प्रेरित करती हैं । सो ज़िन्दगी के अंतिम सोपान पर पहुँच कर यही पाया कि हमारे साथ जो कुछ बेहतर होता है वह अचानक ही होता है, उसके पीछे कोई योजना नहीं होती है । औरों का तो पता नहीं लेकिन मेरे साथ सदा यही होता रहा है। एक खुले दिल-दिमाग के साथ हमेशा जोखिम, चुनौती और बदलाव से मुकाबिल रहा हूँ। यह भी की तमाम झंझावातों के बीच विकल्प कभी भी सरल नहीं हुआ करते हैं ।

ऐसी ही एक मानसिक ऊहापोह की स्थिति में ‘प्रवक्ता’ प्रकाशन की योजना औचक ही बनी थी। स्मृति शेष श्रीप्रकाश शर्मा मेरे साथ थे। विजया की तरंग में मूलतः ‘मुद्रा संकट’ को हल करने के ही निमित्त ‘प्रवक्ता’ की योजना बनी थी । लघु पत्रिका’ कराल’ निकालकर कर्जदारों की ‘चक्षु घुड़की’ से पीड़ित होने का अनुभव मुझे था इसलिए ‘प्रवक्ता’ के लिए धन का जुगाड़ श्रीप्रकाश के ही जिम्मे था। दिक्कत सिर्फ इतनी सी थी कि पत्रिका भी निकालनी थी, अपना-अपना धन संकट भी हल करना था । ऐसे में साधन- शुचिता का मेरा आग्रह श्री ने सिरे से ख़ारिज कर दिया था । अंततः लम्बी ‘सचल – बहस’ के बाद यह तय पाया गया कि हम धन देने वालों का नाम भी पत्रिका में छापेंगे भले ही देने वाला तस्कर हो या थानेदार । ऐसा किया भी गया था। यह आर्थिक पारदर्शिता की बेमिसाल पहल रही थी, जिसे सभी ने सराहा था ।

श्रीप्रकाश जब प्रयोगधर्मी दैनिक ‘शांतिमार्ग’ में था, तब मैं ‘अनाड़ी’ संकटमोचन के महंत अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त जल मर्मज्ञ डॉ. वीरभद्र मिश्र के आदेश पर दैनिक ‘सन्मार्ग’ का सर्वेसर्वा बना हुआ था। घर जाने पर अक्सर श्रीप्रकाश की माताजी उसकी अराजक नौकरी को कोसती रहती थी। उम्र में बड़े होने के कारण मुझे जिम्मेदार मानती थी अतंत: लगभग धकियाते हुए श्रीप्रकाश को मैं सन्मार्ग में ला पाया था । वह मेरा लौकिक अखबारी गुरु जो था । मेरे मीसा में बंद होने तक साथ था मेरी गिरफ्तारी सन्मार्ग दफ्तर पर ही औचक हुई थी । सन्मार्ग से ही वह हिंदुस्तान समाचार में गया था ।

दरअसल पत्रकारिता को हम उस दौर में हथियार की तरह
इस्तेमाल कर रहे थे। आपातकाल का काला दौर बीत चुका था ।समाज परिवर्तन की अपनी प्रतिबद्धता अपनी जगह थी। ‘घर केजोगी जोगड़े’ हम सब आर्थिक संकट में भी एलानिया एलानकरते-फिरते थे कि ‘हम न आएंगे बाजार में रिसालों की तरह ‘ वे दिन पत्रकारिता से साहित्य की ओर कदम रखते हुए थे । हमें नहींपता था कि इस बारादरी से गुजर पाएंगे भी या नहीं, लेकिन यह जरूर पता था कि साहित्य जब तक कैश न किया जाए, तब तक भोजन नहीं देता। पत्रकारिता के साथ ऐसी कोई बंदिश नहीं है ।

आपातकाल की समाप्ति के बाद मीसा की लम्बी जेल यात्रा से बाहर आकर दूसरी आज़ादी को मैं मन से पचा नहीं पा रहा था क्योंकि जेल में भी ‘कोफेपोसा में बंद तस्करों’, जेल में खाने का कच्चा माल सप्लाई करने वाले ठेकेदारों से धन उगाते नेताओं को नजदीक से देखकर काफी आहत था। जेल में जनसंघी समाजवादी – चरणसिंहवादी और बाहर इंदिरा गांधी की दलाली में लगे कम्युनिस्टों (नक्सली अपवाद) की करतूतों में बुनियादी फर्क नहीं था । यह भी आकस्मिक नहीं था कि मधु लिमये और उनकी जेल – संगत में रहे शरद यादव ने ही संसद सदस्यों को मिलने वाली मासिक राशि का इकठ्ठा भुगतान नहीं लिया था। शेष सभी कमाई वाले क्रांतिवीर थे ।

यह पाखण्ड की चरमवास्था थी । ऐसे ही तमाम – तमाम नेता दूसरी आज़ादी की सरकार बनाने में जुटे थे । उनमे से कई दलाल नेता बाद के दिनों में मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री तक बने और अब भी पाला बदलकर प्रभावी हैं और मैं किशन पटनायक के नेतृत्व में विधानसभा का टिकट लौटाकर शादी – सरीखा जोखिम ले बैठा था। वह भी जयप्रकाश नारायण की चेली से ! लिहाजा भारी ‘धन- संकट’ सामने था । श्रीप्रकाश हमेशा की तरह खाली जेब मौज में था उसकी पत्रकारिता का प्रारम्भिक दौर ‘संस्कृत’ के वजीफाओं पर अवलम्बित था ।

‘प्रवक्ता’ के संपादक सुधेन्दु पटेल और संयुक्त संपादक श्रीप्रकाश शर्मा ने ऐसा कौन सा इतिहास रचा था साहब ! पूछ सकते हैं। दरअसल ‘प्रवक्ता’ ही पहली पत्रिका थी जिसमें लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने जनता पार्टी की सत्ता लोलुपता पर अपनी व्यथा व्यक्त की थी । जे पी का वह पूरा भाषण साथी अशोक मिश्र ने अपनी टिप्पणी ‘खादी ग्राम मुंगेर में छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के अखिल भारतीय शिविर में भाग लेकर लौटते शिविरार्थियों को जब हिंदी साहित्य सम्मेलन पटना में जे पी सम्बोधित कर रहे थे तब उन्हें उनके स्वास्थ्य का हवाला देकर चार बार टोका गया। टोकने पर जे पी ने कहा इतने दूर-दूर से आये मेरे युवा मित्रों से बातचीत अब अवसर ही कहाँ मिलता है, ‘मुझे बोलने दो’। और जे पी ने अपनी बात जारी रखी।’ के साथ अविकल प्रवक्ता को उपलब्ध करवाई थी, शीर्षक था ‘वर्ग संघर्ष टालना उचित नहीं : जयप्रकाश नारायण’। ‘दिनमान’ के कवि संपादक रघुवीर सहाय ने एक लम्बी बात भी की थी। इसके लिए सहाय जी ने हमें सराहा भी था । इसी अंक में डॉ. विद्यानिवास मिश्र ने सतत पीछा करने से तंग आकर अन्ततः ट्रेन की प्रतीक्षा करते हुए काशी स्टेशन पर ‘होल्डाल’ पर बैठे-बैठे भाषा पर अपने भाषा विज्ञान के शोधार्थी छात्र योगेंद्र नारायण शर्मा को ‘भाषा का सवाल नाजुक नहीं’ शीर्षक अपना लेख बोलकर लिखवाया था, जो चर्चित भी हुआ। उन दिनों वे आगरा के भाषा संस्थान के निदेशक थे। इसी अंक में प्रख्यात सर्वोदयी साहित्यकार नेता नारायण देसाई का हिंदी संस्मरण ‘भंसाली काका’ छपा था, वे मूलतः गुजराती लेखक जाने जाते रहे हैं। प्रवक्ता में ही सिद्ध पत्रकार श्यामा प्रसाद ‘प्रदीप’ को पढ़कर ‘आजतक’ वाले सुरेंद्र प्रताप सिंह ने ‘रविवार’ में प्रदीपजी का ‘आरामकुर्सी से’ कॉलम प्रारम्भ किया था। प्रदीपजी के लिखे का शीर्षक था ‘पय: पान भुजंगानां केवल विष वर्धनम’ । प्रवक्ता ने ही काशी विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के प्रोफेसर डॉ. बलदेवराज गुप्त का बहु प्रशंसित आलोड़ित करने वाला लेख ‘कम्युनिकेशन इम्पीरियलिज्म बनाम जानकारी का साम्राज्यवाद’ प्रकाशित किया था l

इस अंक में दलितों, आदिवासियों और औरतों के सवाल नए सिरे से उठाये गए थे। बानगी के तौर पर और सहयोगी लेखक थे : विदेशी पूंजी का हस्तक्षेप : आशा भार्गव, पत्रकारों का पशुयोग : आनंद बहादुर सिंह, राज्यपाल की सेवा में : जे पी कृपलानी, हिंदी बाल साहित्य : डॉ. श्रीप्रसाद, जाति और योनि के कटघरे : डॉ. राममनोहर लोहिया, जेल : आदिवासियों के शोषण का हथियार : सुधेंदु पटेल, नेपाली राजनीतिक साथियों की मदद करें : विश्वेशवर प्रसाद कोइराला, असली कातिल को सजा दो : पी मुत्याल राव, जिजीविष कॉलम में एक ही बैठक में लिखी गयी प्रो. मंजीत चतुर्वेदी की कहानी ‘क़स्बा’, सुकान्त भट्टाचार्य की कविता ‘दुर्वार उम्र’ ।

‘मानस बदलना होगा’ शीर्षक सम्पादकीय में कहा गया, ‘जिस पेड़ में सड़न की प्रक्रिया प्रारम्भ हो चुकी हो उस पेड़ को छांटकर पेड़ को सुरक्षित बचाया नहीं जा सकता। वैसे ही उस समाज को जिसके मर्म स्थल में क्षय रोग के कीटाणु घर बसा चुके हों, मात्र सत्ता परिवर्तन से स्वस्थ नहीं बनाया जा सकता। … और इसलिए हिंदुस्तान की बुनियादी समस्याएं ‘वोट की क्रांति’ के बाद भी ज्यूँ की त्यों बनी हुई है। एक किस्म की स्थिरता में पूरा देश उकडू बैठा ऊंघ रहा है। इसलिए दस प्रतिशत सुविधा परस्त वर्ग के चिंतन के झूठन से नहीं, अपनी जरुरत और हक के बराबर वजन पर मानस बनाने की आवश्यकता है। निजी ढंग से सोचने की आज़ादी और समान अवसर की सुविधा से ही नया हिंदुस्तान और नया हिंदुस्तानी तैयार हो सकता है। इसे समय रहते समझ लेने की जरुरत है। ‘प्रवक्ता’ वर्ग और वर्ण रहित नया हिंदुस्तान बनाने की हर संभव कोशिश करेगा -सुधेन्दु पटेल । ‘

‘प्रवक्ता’ को हम दोनों ने यूँ ही निकलकर ‘इतिहास’ रचा था। अंदाज़ लगा सकते हैं की प्रवक्ता के पहले अंक पर प्रतिक्रिया भेजते हुए धर्मयुग के यशस्वी संपादक साहित्यकार धर्मवीर भारती ने लिखा था, ‘प्रिय भाई, प्रवक्ता का अंक मिला। कुछ छपाई सज्जा इतनी आकर्षक थी की पहले तो ध्यान नहीं गया फिर आपका नाम परिचित दिखा तो अंक पढ़ गया। बधाई सामग्री बहुत अच्छी है और पूरे अंक का एक तेवर है, दिशा दृष्टि भी । थोड़ा इसका स्वरूप और छपी सामग्री के स्तर के अनुरूप बनायें, शुभकामना – सस्नेह, भारती उनके पत्र से उत्साहित होकर जब फोन किया तो उन्होंने कहा था की अगले अंकों में लिखना चाहूंगा। हमने भी साफगोई से प्रति उत्तर दिया कि की यदि अगला अंक निकलने का ‘जुगाड़’ हो पाया तो आपको छापकर ज़रूर गौरवान्वित होंगे। और अन्ततः ऐसा कुछ हो पाता इससे पहले काशी से हम दोनों का दाना-पानी ख़त्म हो चुका था ।

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