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कांग्रेस ‘कमल छाप नस्ल’ से निज़ात पाए.. मोदी की महाविजय, महिला मतदाता नायिका ? जरा आंकड़े देखें कि किन तबकों के बड़े जज कितने मोदी को बेनकाब करता सोनिया गांधी का लेख.. सुप्रीम कोर्ट के शिकंजे में रामदेव नेहरू परिवार भी अब ओछी जुबान वाले पनौती और चुनौती 4 दिन के युद्धविराम से कोई राहत मिलेगी?

– सर्वमित्रा सुरजन।।

देश की एकता और बेहतर भविष्य के लिए उनकी यह उम्मीद उन लाखों-करोड़ों लोगों के लिए रौशन दरवाजे खोलती है, जो देश के मौजूदा हाल से निराश हो चुके हैं। विरोधियों से नफरत और एक अजीब किस्म का हिंसक भाव देश के लोकतंत्र के लिए चिंता बढ़ाता है। मगर राहुल गांधी अपनी उपस्थिति से मानो आश्वस्त कर रहे हैं कि भारत की अनेकता में एकता वाली अनूठी पहचान फिर से मजबूत हो ही जाएगी।

10 नवंबर 2016 को देश के कई बड़े अखबारों में पहले पन्ने पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मुस्कुराती हुई तस्वीर के साथ पूरे पन्ने का विज्ञापन छपा था। यह सरकारी विज्ञापन नहीं बल्कि पेटीएम कंपनी का विज्ञापन था, जिसमें अंग्रेजी में प्रधानमंत्री को बधाई दी गई थी, जिसका हिंदी अनुवाद इस तरह है- ‘आजाद भारत के वित्तीय इतिहास में सबसे बड़ा कदम उठाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शुक्रिया।’ आपदा में अवसर का यह पहला बड़ा उदाहरण देश ने देखा था। 8 नवंबर की आधी रात से मोदीजी के फरमान के अनुसार अचानक नोटबंदी और नोट बदली देश में लागू हो गई थी। तब प्रचलित 5 सौ और हजार रुपए के नोट एक झटके में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने आदेश से अमान्य कर दिए थे। देश की अर्थव्यवस्था में भूचाल लाने वाले इस फैसले के पीछे कालेधन की रोक, भ्रष्टाचार पर लगाम, आतंकवाद का खात्मा जैसे तर्क दिए गए थे। 8 नवंबर की रात से एटीएम और बैंकों के बाहर लोगों की लाइन लगनी शुरु हो गई थी। कई दिनों तक कतारबद्ध खड़े होकर अपने ही धन को निकालने के लिए लोग घंटों परेशान होते रहे।

बेबसी, हताशा, दुख, गुस्से और आंसुओं से भरी कई तस्वीरें सामने तो आईं, लेकिन उन्हें बहुत जल्द लोगों के जेहन से मिटाने के लिए दूसरे भरम पैदा कर लिए गए। प्रधानमंत्री मोदी ने कैशलेस इकॉनामी यानी नकदीविहीन अर्थव्यवस्था का सपना देश को दिखा दिया। डिमोनिटाइजेशन और डिजीटल इंडिया जैसे शब्द लोगों को दिन-रात सुनाकर उनकी जुबान पर चढ़ाए गए। प्रचारक मीडिया ने सरकार का पूरा साथ दिया और दो हजार के नोट में चिप लगी रहेगी, जिससे आयकर विभाग को पता चल जाएगा कि काला धन कहां छुपा है, ऐसा ज्ञान टीवी के दर्शकों को दिया गया। जिस तरह टीवी धारावाहिक देखकर दर्शकों का यकीन चमत्कारों पर बढ़ जाता, वे अकल्पनीय बातों को सच मानने लगते हैं, कुछ वही प्रयोग समाचार चैनल के एंकरों ने किया। लोगों की तकलीफ का भाजपा नेता कैसा मजाक उड़ा रहे हैं, इसका एक वीडियो भी वायरल हुआ, जिसमें भाजपा सांसद मनोज तिवारी अपने साथी नेताओं को हंसते हुए बता रहे हैं कि कैसे बैंकों के बाहर लाइन में खड़े लोगों की तकलीफ को उन्होंने राष्ट्रवाद का नाम दे दिया। बहरहाल, पेटीएम के पूरे पन्ने के विज्ञापन में मोदीजी को शुक्रिया कहने के बाद यह भी लिखा था कि अब एटीएम नहीं पेटीएम करो। यह सब देखकर लगता है मानो सब कुछ पहले से लिखी पटकथा के हिसाब से चल रहा था।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी लोकप्रियता को मापने का एक प्रयोग किया था कि अगर वे लोगों को उनकी ही नकदी से वंचित कर देते हैं, तब उनकी छवि और भाजपा के वोटबैंक पर क्या असर होता है। एक ओर लोग बिलख रहे थे, दूसरी ओर प्रधानमंत्री की हंसती-मुस्कुराती तस्वीर के साथ विज्ञापन छपा हुआ था। हालांकि एक साल बाद पेटीएम ने बिना इजाजत विज्ञापनों में प्रधानमंत्री की तस्वीर इस्तेमाल करने को लेकर माफी मांग ली थी। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने लाखों-करोड़ों लोगों की दुनिया में एकदम से तहलका मचाने पर कभी माफी नहीं मांगी, बल्कि नोटबंदी के फैसले के कुछ दिन बाद उन्होंने सरेआम ऐलान किया कि ‘अगर 30 दिसंबर यानी 50 दिन पूरा होने के बाद कोई कमी रह जाए, कोई मेरी गलती निकल जाए, कोई मेरा गलत इरादा निकल जाए। आप जिस चौराहे पर मुझे खड़ा करेंगे, मैं खड़ा होकर… देश जो सजा देगा वो भुगतने को तैयार हूं।’ लेकिन वो 50 दिन कैलेंडर के पन्नों से गायब ही रहे। नोटबंदी एक भयावहकारी कदम साबित हुआ, क्योंकि न भ्रष्टाचार कम हुआ, न काला धन रुक पाया, बल्कि अब नकदी का चलन और बढ़ गया है। हालांकि नोटबंदी के फैसले के बाद उत्तरप्रदेश समेत कई विधानसभा चुनावों में भाजपा को जीत मिली, और 2019 का लोकसभा चुनाव भी भाजपा ने मोदीजी के चेहरे पर फिर से बहुमत से जीत लिया। इसे ब्रांड मोदी की सफलता करार दिया गया। वो ब्रांड जिसे 21वीं सदी के शुरुआती बरसों से ही बनाने की कोशिश चल रही थी और 2002 से होते हुए 2012 तक ब्रांड मोदी और गुजरात मॉडल जैसे शब्द भारतीय लोकतंत्र की पहचान बना दिए गए। वो अनमोल लोकतंत्र जिसे लाखों लोगों के बलिदान और दशकों की तपस्या के बाद देश ने हासिल किया था, बड़ी आसानी से राष्ट्रवाद के बाजार में मिट्टी के भाव बोली पर लगा दिया गया। खून-पसीने से हासिल आजादी और लोकतंत्र को चंद लोगों के रहमोकरम पर छोड़ दिया गया।

नोटबंदी के बाद जीएसटी, सीएए, अनुच्छेद-370 का खात्मा, जम्मू-कश्मीर का दो हिस्सों में बंटना, राम मंदिर का शिलान्यास, कृषि कानून थोपना, ऐसे कई और प्रयोग भाजपा ने ब्रांड मोदी को भुनाते हुए किए और इसमें उसकी सफलता का प्रतिशत अधिक ही रहा। इन्हीं आठ-दस बरसों में कांग्रेस की असफलता का प्रतिशत भी बढ़ता रहा। पहले कांग्रेस की हर हार पर भाजपा के किसी न किसी नेता का बयान आ ही जाता था कि कांग्रेस मुक्त भारत की ओर एक और कदम। मगर बाद में उन्हें इसकी जरूरत भी महसूस नहीं हुई। क्योंकि भाजपा और उसके साथ मिलकर मीडिया ने ये माहौल बना ही दिया कि देश कांग्रेस मुक्त हो चुकी है। सोनिया गांधी को बीमार और राहुल गांधी को नाकाम नेता मानकर बहुत से कांग्रेसी भी भाजपा के पाले में चले गए। लेकिन रात के बाद सुबह, अमावस के बाद पूर्णिमा के प्राकृतिक सिद्धांत पर चलते हुए अब कांग्रेस भी नयी सुबह की ओर बढ़ रही है।

राहुल गांधी पिछले 64 दिनों से अथक भारत जोड़ो यात्रा पर निकले हुए हैं। उनकी यात्रा ने 13 सौ किमी से अधिक की दूरी तय कर ली है। इस वक्त वे तमिलनाडु, केरल, आंध्रप्रदेश और तेलंगाना होते हुए पांचवें राज्य महाराष्ट्र में अपनी सहज, मोहक मुस्कान लिए हजारों-हजार लोगों के साथ पैदल चल रहे हैं। पिछले सभी राज्यों की तरह महाराष्ट्र में भी उनकी यात्रा से जुड़ने के लिए लोग उमड़ रहे हैं। महाराष्ट्र में हाथों में मशाल लेकर राहुल गांधी ने प्रवेश किया, मानो वे लोकतंत्र में छाए अंधेरे को मशाल की रोशनी से चीरने निकले हैं। राहुल गांधी ने ट्वीट किया कि छत्रपति शिवाजी महाराज के साहस की प्रतीक, देश की एकता की ये मशालें, आने वाले भविष्य के लिए एक मिसाल बन जाएंगी। देश की एकता और बेहतर भविष्य के लिए उनकी यह उम्मीद उन लाखों-करोड़ों लोगों के लिए रौशन दरवाजे खोलती है, जो देश के मौजूदा हाल से निराश हो चुके हैं। विरोधियों से नफरत और एक अजीब किस्म का हिंसक भाव देश के लोकतंत्र के लिए चिंता बढ़ाता है। मगर राहुल गांधी अपनी उपस्थिति से मानो आश्वस्त कर रहे हैं कि भारत की अनेकता में एकता वाली अनूठी पहचान फिर से मजबूत हो ही जाएगी।

कांग्रेस के विरोधी बार-बार भारत जोड़ो यात्रा पर सवाल उठा रहे हैं। हिमाचल प्रदेश और गुजरात चुनाव से इसे जोड़ते हुए कह रहे हैं कि राहुल गांधी हार के डर से इन राज्यों में नहीं आ रहे हैं। कैसी विडंबना है कि चुनाव के पहले ही नतीजों की घोषणा करने का दुस्साहस किया जा रहा है, मानो क्या होना है, ये सबको पहले से पता है। मीडिया ब्रांड मोदी को शर्तिया सफलता की तरह पेश करता है। भारत जोड़ो यात्रा की सफलता की कहानियों के लिए मीडिया के पास स्थान औऱ समय नहीं है। डर है कि अगर कहीं रोज की सफलता दर्ज की जाए तो राहुल गांधी की चमक अधिक न साबित हो जाए। लेकिन कुएं के बाहर निकलकर देखा जाएगा तो पता चलेगा कि राहुल गांधी तो रोज एक जैसे टी शर्ट, पतलून, जूतों और खिचड़ी दाढ़ी के साथ उगते सूरज जैसे लग रहे हैं, जिसमें रोशनी है और तपिश भी इतनी ही है जो लोगों को सुकून दे, झुलसाए नहीं। इसलिए पूरे पन्नों के विज्ञापनों और दिन-रात के कवरेज के बिना भी लोग उनसे अपने आप जुड़ रहे हैं। राजनीति में ब्रांड राहुल भी मजबूत हो रहा है, क्योंकि इस ब्रांड को लोग बना रहे हैं।

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