भारतीय लोकतंत्र, तुम्हारी जय जय..

-सुनील कुमार।।

एक हवाला केस में दिल्ली की सबसे बड़ी तिहाड़ जेल में बंद केजरीवाल सरकार के मंत्री सत्येन्द्र जैन के कुछ वीडियो सामने आए हैं जिनमें वे जेल में मालिश करवा रहे हैं, और चम्पी करवा रहे हैं। भाजपा ने ये वीडियो जारी करते हुए जेल में बंद मंत्री को वीवीआईपी सहूलियतें देने का आरोप लगाया है, और जांच एजेंसी ईडी ने कोर्ट में एक हलफनामा देकर, कई तस्वीरें जमा कराके गिरफ्तार मंत्री के ऐशोआराम की बात कही है। मनीलॉड्रिंग केस में गिरफ्तार, सत्येन्द्र जैन को ईडी ने करोड़ों रूपये की गैरकानूनी अफरा-तफरी में गिरफ्तार किया था, और एजेंसी ने अदालत को बताया है कि सत्येन्द्र जैन उनके खिलाफ मामले के अन्य आरोपियों के साथ अपनी कोठरी में घंटों मीटिंग करते हैं। उल्लेखनीय है कि इस जेल में बंद एक बड़े चर्चित ठग सुकेश चन्द्रशेखर ने दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर को एक चिट्ठी लिखकर कहा है कि उसे जेल में सुरक्षा और सहूलियत देने के नाम पर सत्येन्द्र जैन ने दस करोड़ रूपये वसूले थे। अब जैसे-जैसे गुजरात का चुनाव करीब आ रहा है, दिल्ली की आम आदमी पार्टी की केजरीवाल सरकार के खिलाफ आरोप बढ़ते चल रहे हैं, और कई तरह के सुबूत भी सामने आ रहे हैं।

हिन्दुस्तान में ताकतवर लोगों पर अगर न्याय प्रक्रिया के तहत कोई कार्रवाई होती भी है तो उसका यही हाल होता है। और यह ताकत सिर्फ सत्ता की ताकत नहीं रहती, यह सुकेश चन्द्रशेखर जैसे ठग और जालसाज की ताकत भी रहती है जो कि तिहाड़ जेल में रहते हुए तरह-तरह के बहुत से मोबाइल फोन से अलग-अलग मामलों में फंसे हुए लोगों को फोन पर धमकाकर उनसे उगाही करता था, उनको ठगता था। अब जेल में मोबाइल की सहूलियत एक बड़ा जुर्म है, और मुजरिम के हाथ में वह एक हथियार भी है, लेकिन दिल्ली के तिहाड़ जेल से लेकर छत्तीसगढ़ की जेलों तक का यही हाल है, और जेलों में बंद बड़े मुजरिम और गैंगस्टर वहां से जुर्म का अपना कारोबार चलाते हैं। बाहरी लोगों की नजरों से दूर जेल के भीतर की दुनिया अपने आपमें सरकारी जुर्म का एक बड़ा कारोबार रहती है, और सत्ता या पैसों की ताकत से वहां लोग मनचाही जिंदगी जीते हैं। पंजाब में पिछले महीनों में कत्ल की जो बड़ी वारदात हुई हैं, उनके पीछे हिन्दुस्तानी जेलों में बंद बड़े गैंगस्टरों का हाथ मिला है जो कि जेलों की हिफाजत के हाल का एक बड़ा सुबूत है।

लेकिन जेलों से परे भी हिन्दुस्तान की सारी न्याय व्यवस्था उन लोगों के हाथ बिकी हुई है जिनके बारे में प्रचलित भाषा में कहा जाता है कि वे चांदी का जूता मारकर काम करवा सकते हैं। यानी न्याय व्यवस्था से जुड़े लोग जूता खाकर काम करने के लिए तैयार रहते हैं, अगर वह जूता चांदी का होता है। मुकदमों से जुड़ा सिलसिला पुलिस या दूसरी जांच एजेंसियों से शुरू होता है, और वहीं से भारी भ्रष्टाचार भी शुरू हो जाता है, और रिश्वत से परे राजनीतिक दबाव भी बराबरी का असर रखता है। पूरी जांच को भ्रष्ट कर देना, सुबूतों और गवाहों को तोड़-मरोड़ देना, मामले को पहले तो अदालत तक पहुंचने ही नहीं देना, और अगर पहुंच गया है, तो उसे अंतहीन आगे बढ़ाते चलना, यह सब बहुत ही बुनियादी और आम बातें हैं। ताकतवर मुजरिम इसी दौर में बरसों निकाल देते हैं, हर तरह के जुर्म और जुल्म जारी रखते हैं, लेकिन कटघरे से आंखमिचौली खेलते रहते हैं। फिर अगर किसी तरह अदालत से बचना मुमकिन नहीं रहा तो लोग कामयाब और घाघ वकील रखकर हक के नाम पर इंसाफ को पटरी से उतारने में पूरी ताकत लगा देते हैं। और बरसों बाद अगर कोई फैसला हो भी गया, तो संपन्न मुजरिमों के लिए ऊपर की बड़ी-बड़ी अदालतें हैं, जिनमें भारी असर रखने वाले बड़े-बड़े वकील हैं, और वहां भी न्याय प्रक्रिया या फैसले प्रभावित करने या खरीदने की कई तरकीबें हैं। ऐसे में जब बिना जमानत जेल में रहने की मजबूरी हो, तो वहां पर सहूलियतों का एक पूरा बाजार चलता है, और जेलों के अफसर करोड़ों की कमाई करते हैं, या सत्ता को खुश रखने के लिए बिना भुगतान पाए कुछ कैदियों की मालिश करते हैं। यह सिलसिला सिर्फ दिल्ली की तिहाड़ जेल का नहीं है, देश भर में यही हाल है, और चूंकि हिफाजत के नाम पर जेलों को कई तालों के भीतर रखा जाता है, इसलिए वहां बंद तालों की आड़ में हर तरह के गैरकानूनी काम किए जा सकते हैं। लोगों का यह आम तजुर्बा है कि किसी भी किस्म की ताकत रखने वाले मुजरिम जब जेल पहुंचते हैं, तो बड़ी रफ्तार से उनकी तबियत बिगड़ती है, और वे पहले जेल के अस्पताल ले जाए जाते हैं, और फिर वहां से बाहर के बड़े अस्पतालों में। यह एक अलग बात है कि फादर स्टेन स्वामी जैसे प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता को अपनी बहुत अधिक उम्र और बीमारियों की वजह से कांपते हाथों के बावजूद गिलास से कुछ पीने के लिए एक नली (स्ट्रॉ) देने के खिलाफ भी एनआईए ने विशेष अदालत में जान लगा दी थी, और स्टेन स्वामी मर गए, उन्हें पानी पीने के लिए प्लास्टिक की एक नली भी नहीं लेने दी गई। सरकारें जिन्हें नापसंद करती हैं, और जिन्हें पसंद करती हैं, उनके बीच नर्क और स्वर्ग सरीखा फासला जेल और हिरासत में खड़ा कर दिया जाता है।

हिन्दुस्तान में लोकतंत्र एक बड़ा ढकोसला बन चुका है। गरीब को बाकी बातों के साथ-साथ पांच बरस तक यह कहकर भी धोखा दिया जाता है कि उसके वोट से सरकार बनती है, वह लोकतंत्र में भाग्यविधाता है। जबकि हकीकत यह है कि वह वोट किसी को भी दे, उसके विधायक और सांसद ऊपर जाकर अपनी आत्मा और वोट दोनों की एक जोड़ी बनाकर बेचते हैं, और आम वोटर का यह घमंड बेबुनियाद साबित होता है कि वे सरकार चुनते हैं। एक तरफ नैतिकता से परे महज साजिश से बनी हुई सरकारें, सरकारों के अंधाधुंध भ्रष्टाचार, पैसों की असीमित ताकत, इन सबके सामने इंसाफ भीगी बिल्ली की तरह एक कोने में दुबक जाने को मजबूर हो जाता है। अब सरकारों में यह नैतिकता नहीं रह गई है कि अपने भ्रष्ट और दुष्ट लोगों को बाहर करे, न्याय व्यवस्था में यह ताकत नहीं रह गई है कि ताकतवर और गरीब के कानूनी हक बराबर कर सके। ऐसे में भ्रष्टाचार जेल के भीतर मालिश करवाता है, और वहां गलत मामले में फंसाकर डाले गए ईमानदार शायद भ्रष्टाचार का बदन दबाते हैं। लोकतंत्र, तुम्हारी जय हो!

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