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देश में चुनावों की गहमागहमी लगातार बनी हुई है। हिमाचल प्रदेश के चुनाव खत्म हुए ही हैं कि अब गुजरात की बारी चुकी है। इधर दिल्ली में एमसीडी चुनाव की तैयारी भी चल रही है। इसके बाद मुंबई और महाराष्ट्र के कुछ और शहरों में नगरीय निकाय चुनाव होंगे। इनके खत्म होते न होते कर्नाटक की बारी आ जाएगी और उसके बाद अगले साल मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ चुनाव की कतार में लग जाएंगे।

कहने का अर्थ ये कि देश में लगातार कहीं न कहीं चुनाव की प्रक्रिया चलती ही रहती है। लोकतंत्र की जीवंतता तो इसमें नजर आती है, लेकिन ये सवाल भी अब बड़े पैमाने पर उठने लगा है कि क्या चुनाव वाकई इतने निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से संपन्न हो रहे हैं, जिसका दावा किया जाता है।

निर्वाचन आयोग अपने फैसलों और कई बार समय पर न लिए जाने वाले फैसलों के लिए सवालों के घेरे में लगातार आ रहा है। अभी विधानसभा चुनावों के ऐलान के वक्त भी आयोग पर उंगलियां उठी थीं कि हिमाचल प्रदेश के साथ-साथ ही गुजरात चुनावों का ऐलान क्यों नहीं हुआ, क्यों दोनों राज्यों में चुनाव की तारीखों में लगभग महीने भर का अंतर होने के बावजूद मतगणना की तारीख एक रखी गई। कभी आयोग पर इस बात के आरोप लगते हैं कि वह सत्ताधारियों की मर्जी और मंजूरी के हिसाब से चुनाव की तारीखें घोषित करता है, कभी इस बात पर उंगली उठती है कि आचार संहिता के उल्लंघन पर सत्ता में बैठे लोगों पर सख्ती नहीं बरती जाती।

निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर उठते इन सवालों के बीच सर्वोच्च न्यायालय ने मुख्य चुनाव आयुक्त और उनके साथ दो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर अहम टिप्पणी की है। इन पदों पर अपनी पसंद के सेवारत नौकरशाहों को नियुक्तकरने की केंद्र की वर्तमान प्रणाली पर सवाल उठाते हुए अदालत ने कहा कि किसी श्रेष्ठ गैर-राजनीतिक सुदृढ़ चरित्र वाले व्यक्ति, जो प्रभावित हुए बिना स्वतंत्र निर्णय ले सके, को नियुक्त करने के लिए एक ‘निष्पक्ष और पारदर्शी तंत्र’ अपनाया जाना चाहिए। गौरतलब है कि निर्वाचन आयुक्तों की वर्तमान नियुक्ति प्रक्रिया की संवैधानिकता को चुनौती देते हुए सर्वोच्च अदालत में याचिका लगाई गई थी कि नियुक्तियां कार्यपालिका की मर्जी से की जा रही हैं। और भविष्य में ऐसी नियुक्तियों पर रोक लगाने के लिए स्वतंत्र कॉलेजियम जैसी व्यवस्था या चयन समिति गठित करने की मांग की गई। इस पर सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सुनवाई की।

जस्टिस केएम जोसेफ की अध्यक्षता में जस्टिस अजय रस्तोगी, जस्टिस अनिरुद्ध बोस, जस्टिस ऋ षिकेश रॉय और जस्टिस सीटी रविकुमार की संविधान पीठ ने इस मामले में पिछले 17 नवंबर को सुनवाई की थी, तब केंद्र सरकार ने निर्वाचन आयुक्तों के चयन के लिए कॉलेजियम जैसी प्रणाली की मांग करने वाली दलीलों का जोरदार विरोध करते हुए कहा था कि इस तरह का कोई भी प्रयास संविधान में संशोधन करने के समान होगा। गौरतलब है कि संविधान के अनुच्छेद 324 में निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति के बारे में कहा गया है, लेकिन इसमें कोई प्रक्रिया नहीं बताई गई है। जिस पर इस मंगलवार को संविधान पीठ ने टिप्पणी की कि अनुच्छेद 324 में किसी प्रक्रिया का उल्लेख न होने पर संविधान की चुप्पी का फायदा उठाया जा रहा है।

पीठ ने निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कोई कानून नहीं होने का फायदा उठाए जाने की प्रवृत्ति को तकलीफदेह बताया और अंदेशा भी जतलाया कि राजनीतिक दल नियुक्ति को लेकर एक स्वतंत्र पैनल की स्थापना के लिए कानून पारित करने के लिए कभी भी सहमत नहीं होंगे, क्योंकि यह सरकार की अपनी पसंद के व्यक्तियों को नियुक्त करने की शक्ति को छीन लेगा जो उनके बने रहने के लिए जरूरी हो सकता है।

संविधान पीठ ने एक बड़ी कमी की ओर भी ध्यान दिलाया कि 2004 से किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल 2 वर्ष से अधिक का नहीं रहा है। जबकि कानून के अनुसार, उनका छह साल या 65 वर्ष तक की आयु का कार्यकाल होता है, जो भी पहले हो। लेकिन पहले यूपीए और अब एनडीए सरकारों ने निर्वाचन आयुक्तों को ऐसे समय में नियुक्त किया कि वे छह साल की अवधि पूरी ही नहीं कर पाएं।

हालांकि अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने कहा कि जिस मौजूदा प्रक्रिया के तहत राष्ट्रपति मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति करते हैं, उसे असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता और अदालत उसे खारिज नहीं कर सकतीं। जबकि अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग के लिए आप आदर्श और सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति की तलाश कैसे करते हैं, यह एक बड़ा सवाल है। अदालत ने यह भी कहा कि संविधान ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो निर्वाचन आयुक्तों के ‘नाजुक कंधों’ पर बहुत जिम्मेदारियां सौंपी हैं और वह मुख्य चुनाव आयुक्त के तौर पर टीएन शेषन की तरह के सुदृढ़ चरित्र वाले व्यक्ति को चाहता है।

गौरतलब है कि 1990 में भारत के दसवें मुख्य निर्वाचन आयुक्त बने टी.एन. शेषन कड़े सुधारों के लिए जाने जाते हैं। मतदाता परिचय पत्र से लेकर चुनाव में खर्च पर लगाम जैसे कई महत्वपूर्ण फैसले उन्होंने लिए और किसी के राजनैतिक रसूख के आगे झुकने से इंकार करते हुए, अगर जरूरी हुआ तो चुनाव रद्द कराने के फैसले भी लिए। देश में चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने में उनका महती योगदान है और अब सर्वोच्च अदालत उनकी ही तरह सख्त और राजनैतिक दबावों से मुक्त व्यक्ति को निर्वाचन आयुक्त के तौर पर देखना चाहती है। केंद्र सरकार के तर्क हैं कि सब कुछ संविधान के मुताबिक हो रहा है और कॉलेजियम जैसे प्रयास संविधान संशोधन के समान होंगे।

लेकिन निर्वाचन की व्यवस्था को और मजबूत व पारदर्शी बनाने के लिए अगर संविधान संशोधन जैसे कदम उठाने पड़ें तो उससे परहेज क्यों करना चाहिए। संविधान पीठ ने एक जरूरी मसले को उठाया है और सुदृढ़ चरित्र वाले व्यक्ति को निर्वाचन आयुक्त नियुक्त करने की जो आकांक्षा जाहिर की है, वह दरअसल लोकतंत्र में यकीन रखने वाले नागरिकों के मन की बात है। जिसे सभी राजनैतिक दलों को सुनना और गुनना चाहिए।

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