जयकारों पर भारी पड़ता मौन प्रतिरोध

नरेंद्र मोदी

-सर्वमित्रा सुरजन॥
धार्मिक सख्ती के विरोध में उठी लहर अब तक थमी नहीं, बल्कि बढ़ते हुए फीफा के मंच तक जा पहुंची। ईरानी कैप्टन एहसान हजसाफी ने मैच के पहले ही स्पष्ट संदेश दिया था कि हमारी टीम मजहबी तानाशाही वाली सत्ता के खिलाफ संघर्ष कर रहे लोगों के साथ है। उन्होंने कहा था, ‘हमें यह स्वीकार करना होगा कि हमारे देश में हालात ठीक नहीं हैं और हमारे देश के लोग खुश नहीं हैं।

देश में इस समय कितना शोर मचा हुआ है। विधानसभा चुनाव एक राज्य में हो रहा है, लेकिन वहां जो चीख-चिल्लाहट मची है, उसे पूरे देश में सुनाया जा रहा है। मानो एक राज्य में सत्ता का फैसला पूरे देश का भविष्य निर्धारित करेगा। लाउड स्पीकर पर भी नेता चिल्ला-चिल्ला कर अपनी बात रख रहे हैं। चिल्लाने के साथ-साथ हाथ-सिर सब हिला रहे हैं, ताकि बात में वजन पड़े। भाव-भंगिमा, वेश-भूषा बदल-बदल कर अपनी बात कहने वाले तथाकथित सेवकों को पता है कि उनकी बातें कितनी खोखली हैं, इसलिए उनमें असर पैदा करने के लिए बाहरी जोर डाला जा रहा है। जो बात धीर-गंभीर होती, तो उसका असर अपने आप जनता पर पड़ ही जाता है।

लेकिन अभी तो सत्ता के साढ़े आठ साल होने के बाद जनता को समझाना पड़ रहा है कि मैं आपका सेवक हूं। खुद को दीन-हीन बताकर सहानुभूति हासिल कर जीतने की रणनीति कब तक, कहां तक कामयाब होगी, ये जनता ही तय करेगी। विधानसभा चुनावों के साथ अब नगर निगम के चुनावों को भी राष्ट्रीय महत्व का बना दिया गया है। लोगों के मुद्दे गौण हो गए हैं, दलों के गठबंधन, उनकी तोड़-फोड़, घोषणापत्र, स्टिंग आपरेशन प्रधान मुद्दे बन गए हैं। चुनावों का शोर काफी नहीं लगता तो भारत जोड़ने के विचार से निकाली जा रही यात्रा को लेकर बिला वजह हल्ला मचाया जा रहा है।

अगर कुछ लोगों के पैदल चलने से और प्रेम, भाईचारे का संदेश देने से देश में एकता बढ़ती है, तो इससे किसी भी राष्ट्रवादी को कोई तकलीफ क्यों होनी चाहिए। बल्कि ऐसी यात्राओं का स्वागत होना चाहिए। मगर प्रधानमंत्री का कहना है कि सत्ता से बेदखल लोग सत्ता में लौटने के लिए यात्रा निकाल रहे हैं। अगर ऐसा है भी तो इसमें उन्हें क्या आपत्ति है।

लोकतंत्र में राजनीति करने वाले हर नेता को ये अधिकार है कि वह सत्ता प्राप्त करने की कोशिश करे। जब प्रधानमंत्री खुद अपने दल की सत्ता बनाए रखने के लिए दिन-रात कई-कई दिन प्रचार कर सकते हैं, तो कोई दूसरा ऐसा क्यों नहीं कर सकता।

अनावश्यक विवाद खड़े कर सियासत में शोर पैदा किया जा रहा है। इस शोर में उन सारे मुद्दों को खामोशी की चादर ओढ़ा दी गई है, जिन पर सच में खुल कर बात करने की जरूरत है। हर साल दो करोड़ रोजगार देने की बात कर कुछ हजार नियुक्ति पत्र बांटे जा रहे हैं। महंगाई कम करने के दावे कर हर दूसरे-तीसरे महीने अनाज, तेल, मांस, डेयरी उत्पाद, घरेलू गैस, बिजली, पानी, शिक्षा, इलाज सब महंगे किए जा रहे हैं।

सपने दिखाए गए थे भ्रष्टाचार खत्म करने के, लेकिन अब नोटबंदी जैसे बड़े फैसलों के पीछे की कहानियां सामने आ रही हैं। आश्वासन दिया गया था बेटियों की सुरक्षा का, लेकिन उत्तराखंड की अंकिता से लेकर महाराष्ट्र की श्रद्धा और दिल्ली की आयुषी तक हर मोड़ पर बेटियां कत्ल हो रही हैं, कभी बलात्कारियों के हाथों, कभी प्रेमी तो कभी मां-बाप के हाथों। जो बची हुई हैं, वो कब तक सुरक्षित रहेंगी, क्या बेटियों को उनके अधिकार मिलेंगे, क्या लड़का-लड़की का भेदभाव कभी खत्म हो पाएगा, इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। लोग जब अपनी रोजमर्रा की जरूरत, बुनियादी सुविधाओं के लिए मुंह खोलने की हिम्मत नहीं दिखा रहे हैं, तो लड़कियों के अधिकारों, उनके सम्मान के लिए कभी आवाज़ उठाएंगे, ऐसी कोई उम्मीद ही नहीं रखी जा सकती।

नाउम्मीदी की खामोशी और खोखलेपन के शोर के बीच मौन की ताकत का एक नायाब उदाहरण कतर से ईरान की फुटबॉल टीम ने पेश किया है। कतर में इस वक्त दुनिया में फुटबॉल प्रतियोगिता का सबसे बड़ा मंच सजा हुआ है। फीफा के मेजबान देश कतर के खलीफा इंटरनेशनल स्टेडियम में सोमवार को एक अनूठा नजारा दुनिया ने देखा। ईरान और इंग्लैंड के मुकाबले के पहले स्टेडियम में जब ईरान का राष्ट्रगान बजाया जा रहा था तो उसके 11 खिलाड़ी मैदान में हाथ बांधे खड़े हुए थे, लेकिन उनके लब सिले हुए थे। यह किसी जबरदस्ती से नहीं, बल्कि धार्मिक कट्टरता के खिलाफ उनके विरोध का तरीका था।

गौरतलब है कि ईरान में दो महीने पहले महसा अमीनी नाम की युवती को पुलिस ने केवल इसलिए गिरफ्तार किया था, क्योंकि हिजाब पहनने के बावजूद उसके बाल दिखाई दे रहे थे। ईरान की नैतिक पुलिस ने इसे धर्म के खिलाफ माना और महसा को ऐसी प्रताड़ना दी कि वह कोमा में चली गई और 16 सितंबर को उसकी मौत हो गई। इस घटना के बाद ईरान में हिजाब विरोधी आंदोलन खड़ा हो गया है। पहले आम महिलाएं महसा अमीनी के समर्थन में सड़क पर उतरीं। उन्होंने सरेआम अपने हिजाब उतार कर धार्मिक तानाशाहों को चुनौती दी।

80 बरस से ऊपर की एक वृद्धा ने भी ये कहते हुए अपना हिजाब उतार दिया कि मंै ताउम्र धार्मिक रही, नियमों को मानती रही, लेकिन जो निर्दोष की जान ले, मैं ऐसी पाबंदियों को नहीं मानूंगी। आम महिलाओं के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों की बड़ी हस्तियां भी हिजाब के विरोध में उठ खड़ी हुईं। ईरान की सरकार इस आंदोलन को कुचलने की कोशिश कर रही है। मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि सुरक्षा बलों के साथ हुई झड़पों में 4 सौ के करीब लोग मारे जा चुके हैं और लगभग 17 हजार लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं। मगर धार्मिक सख्ती के विरोध में उठी लहर अब तक थमी नहीं, बल्कि बढ़ते हुए फीफा के मंच तक जा पहुंची।

ईरानी कैप्टन एहसान हजसाफी ने मैच के पहले ही स्पष्ट संदेश दिया था कि हमारी टीम मजहबी तानाशाही वाली सत्ता के खिलाफ संघर्ष कर रहे लोगों के साथ है। उन्होंने कहा था, ‘हमें यह स्वीकार करना होगा कि हमारे देश में हालात ठीक नहीं हैं और हमारे देश के लोग खुश नहीं हैं। उन्हें पता होना चाहिए कि हम उनके साथ हैं और उनका समर्थन करते हैं।’ इसके बाद जब वे अपने खिलाड़ियों के साथ मैदान में खड़े थे तो राष्ट्रगान न गाकर खुलेतौर पर धार्मिक कट्टरता को चुनौती दे दी। खेल नियमों से बंधा होता है, लेकिन जकड़नों से आजाद होता है और यही संदेश ईरान की टीम ने दुनिया को दिया। उनके इस कदम से स्टेडियम में मौजूद कई ईरानी महिलाओं की आंखों में आंसू आ गए।

लोगों ने तालियों की गड़गड़ाहट से उनके जज्बे को सलाम किया। हालांकि अब इन खिलाड़ियों का भविष्य क्या होगा, इस पर चिंता जतलाई जा रही है। मुमकिन है, इन खिलाड़ियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हो या फिर इन्हें ईरान लौटने पर नजरबंद किया जाए या फिर इनके अंतरराष्ट्रीय मैचों में खेलने पर ही प्रतिबंध लग जाए। इन खिलाड़ियों के साथ इनके परिजनों पर भी सरकार सख्ती दिखला सकती है। यानी आने वाला समय हर तरह से तकलीफेदह हो सकता है, इस खतरे को भांपते हुए भी ईरान के खिलाड़ियों ने गलत के खिलाफ खड़े होने का जो हौसला दिखाया है, वो दुनिया भर की उन नामचीन हस्तियों के लिए एक मिसाल है, जो अपने नाम, शोहरत और धन को बचाए रखने के लिए चाटुकारिता से परहेज नहीं करती हैं। अभी भारत में ही हमने इसके उदाहरण देख लिए हैं, जब भारत जोड़ो यात्रा का साथ देने के लिए गिने-चुने कलाकार सामने आए, मगर महानायक और भगवान कहलाने वाले लोग नायकत्व का कतरा भी पेश नहीं कर सके। ईरान के खिलाड़ियों का मौन प्रतिरोध, समर्थन के जयकारों पर भारी पड़ गया।

कवि कुंवर नारायण की एक कविता सन्नाटा या शोर की शुरुआती पंक्तियां हैं-
सन्नाटा या शोर
कितना अजीब है
अपने ही सिरहाने बैठकर
अपने को गहरी नींद में सोते हुए देखना।
यह रोशनी नहीं
मेरा घर जल रहा है।

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