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महंगाई का दर्द और बेरोजगारी का बोझ देकर साल 2022 विदा हो गया। अभी केंद्र पर सत्तारुढ़ मोदी सरकार का शासन डेढ़ सालों तक और चलेगा। सब कुछ ठीक चलता रहा तो अगले आम चुनाव 2024 के पूर्वार्द्ध में होंगे। यानी अगले डेढ़ सालों तक जनता को उन समस्याओं से जूझना ही होगा, जिनसे पिछले आठ बरसों से वह परेशान हो रही है। दूध, अनाज, तेल, गैस जैसी रोजमर्रा की चीजों के दामों में किसी कमी के आसार नहीं दिख रहे, नयी नौकरियों की कोई संभावना नहीं बन रही, और सरकार की ओर से ऐसा कोई उपाय किया जा रहा है कि रुपया डॉलर के मुकाबले मजबूत हो। दरअसल जनता की जो मुश्किलें हैं, सरकार उन्हें स्वीकार ही नहीं कर रही है। सरकार यह मान कर चल रही है कि देश विकास कर रहा है, पांच किलो मुफ्त के अनाज से लोगों को राहत मिल रही है, और रोजमर्रा के जीवन में आम लोगों को किसी बात की तकलीफ नहीं है।

2022 तक मोदी सरकार ने देश में बहुत से बड़े बदलाव लाने का दावा और वादा किया था। जैसे सितंबर 2015 में प्रधानमंत्री मोदी ने स्कूली छात्रों से बातचीत करते हुए कहा था कि 2022 में जब भारत आजादी के 75 साल मनाएगा, हर घर में 24×7 बिजली होनी चाहिए। दिसंबर 2016 में ‘प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना’ की शुरुआत करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा था कि साल 2022 तक प्रत्येक भारतीय के पास अपना घर होगा।

11 फरवरी 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ओमान में प्रवासी भारतीयों को संबोधित करते हुए कहा था कि बुलेट ट्रेन परियोजना 2022 तक भारत में एक वास्तविकता होगी। जून 2018 में श्री मोदी ने दावा किया था कि 2022 तक किसानों की आय दोगुनी हो जाएगी। 20 सितंबर 2018 को श्री मोदी ने कहा था कि देश को 2022 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बना देंगे। इन सबके अलावा एक बड़ा लक्ष्य 2022 तक अंतरिक्ष में यात्रियों को भेजने का भी मोदी सरकार ने रखा था। लेकिन इनमें से एक भी बात धरातल पर सच नजर नहीं आई। और नए साल में भी किसी बड़े बदलाव के कोई लक्षण नजर नहीं आ रहे।

2023 का साल भी पिछले साल की तरह चुनौतियों से भरा और संभावनाओं से शून्य रहता, अगर भारत जोड़ो यात्रा शुरु न हुई होती। राहुल गांधी के समर्थक हों या विरोधी। उनकी राजनीति को पसंद करने वाले हों या नापसंद करने वाले। राहुल गांधी और उनके नेतृत्व में निकल रही इस यात्रा के प्रभाव को कोई नजरंदाज नहीं कर पा रहा है।

रोजाना सोशल मीडिया पर एक हैशटैग इस यात्रा या राहुल गांधी से संबंधित ही चलता है। सितंबर में जब यात्रा निकली थी, तो कई लोगों ने दावा किया था कि जो भीड़ है, वो केवल दक्षिण के राज्यों में ही दिखेगी, यात्रा का प्रभाव दक्षिण भारत तक ही सीमित रहेगा। लेकिन दक्षिण से निकल कर पश्चिम को छूते हुए, मध्यभारत से गुजरते हुए अब यात्रा उत्तर भारत तक पहुंच गई है और इसका प्रभाव भी बढ़ता ही जा रहा है। राहुल गांधी का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है। दिल्ली में लोग राहुल को सुनने के लिए, उनके साथ कुछ किलोमीटर चलने के लिए खुशी-खुशी आगे आए। राहुल जो मोहब्बत का पैगाम देने निकले थे, वो अब दूर तक फैलता जा रहा है। आम लोगों के साथ-साथ महबूबा मुफ्ती और नीतीश कुमार जैसे नेता भी अब राहुल गांधी में उम्मीद तलाशने लगे हैं, यह सियासत में बड़े बदलाव का संकेत है।

यह बदलाव शायद इसलिए संभव है, क्योंकि राहुल गांधी भी अब एक परिपक्व नेता के तौर पर बात करने लगे हैं। बीते साल के आखिरी दिन उन्होंने तीन महीनों में 9वीं प्रेस कांफ्रेंस की। इस प्रेस कांफ्रेंस में भी उन्होंने लगभग वही सारी बातें दोहराईं, जो वे पिछले कुछ महीनों से हर मंच पर कहते आ रहे हैं। जैसे भाजपा और संघ को धन्यवाद दिया कि वे उन पर आक्रमण करते हैं। इन दोनों को वह अपना गुरु मानते हैं क्योंकि वह उन्हें रास्ता दिखा रहे हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं। अपने खिलाफ चलाए जाने वाले अभियान का जिक्र भी राहुल गांधी ने किया।

पत्रकारों ने उनसे विपक्ष की एकता, 2024 में प्रधानमंत्री पद की दावेदारी जैसे सवाल भी पूछे और इस बार श्री गांधी पहले से अधिक परिपक्वता के साथ जवाब देते नजर आए। उन्होंने स्पष्ट किया कि भाजपा और कांग्रेस एक जैसे नहीं हैं, जैसा दावा अखिलेश यादव ने किया है। क्योंकि अगर ये दोनों दल एक होते तो भाजपा कांग्रेस मुक्त भारत की बात नहीं करती। राहुल गांधी ने सुश्री मायावती और अखिलेश यादव के लिए बड़ी बात कही कि कोई नेता नफरत का हिंदुस्तान नहीं चाहता है। इस वक्तव्य से राहुल गांधी ने बड़ी पार्टी का बड़प्पन दिखाया है और ये बताया है कि न्यस्त स्वार्थों के कारण भले ये दल अभी कांग्रेस के साथ नहीं आ रहे हैं, लेकिन भाजपा से मुकाबले के लिए सबको एक होना ही होगा। राहुल गांधी ने यह भी साफ-साफ कहा कि भाजपा को हराने के लिए जिस केन्द्रीय विचारधारा की जरूरत है, वह कांग्रेस ही दे सकती है। यानी आगामी चुनावों में कांग्रेस की भूमिका उन्होंने स्पष्ट कर दी है।

अपनी पिछली प्रेस कांफ्रेंस में चीन से तनाव पर दिए गए बयान की वजह से राहुल गांधी को भाजपा ने फिर कटघरे में खड़ा किया था। इस बार भी राहुल गांधी ने आलोचनात्मक रुख अपनाते हुए कहा कि मोदी सरकार ने चीन के मसले को ठीक तरीके से नहीं संभाला। उन्होंने साफ कहा कि सेना का राजनैतिक इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। खुद के परिवार की शहादत का जिक्र करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि जब कोई जवान शहीद होता है तो उसके परिवार वालों पर क्या गुजरती है, वह इसे समझ सकते हैं जबकि भाजपा के लोग इसे नहीं समझ सकते। अपनी इन बातों से राहुल गांधी ने सेना के साथ खुद को खड़ा दिखा दिया है। भाजपा के लिए अब उन्हें इस मुद्दे पर चुनाव के दौरान घेरना मुश्किल होगा।

राहुल गांधी की बातें, उनके भाषण और प्रेस कांफ्रेंस में दिए गए उनके जवाब अब रोज सुर्खियां बन रहे हैं। संजय राउत के शब्दों में कहें तो बीते साल 2022 ने कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के नेतृत्व को एक नई आभा दी है। अगर ये रुझान 2023 में भी जारी रहता है तो आगामी लोकसभा चुनाव में देश में बड़ा राजनीतिक बदलाव देखने को मिल सकता है।

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