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-सुनील कुमार।।

नए साल के मौके पर दिल्ली में सुबह के अंधेरे में एक कार में सवार पांच लोगों ने एक स्कूटी सवार युवती को टक्कर मार दी, और उसकी लाश कार में फंसे हुए चार किलोमीटर तक घिसटती चली गई। सुबह तीन बजे की इस वारदात को देखने वाले एक दूध वाले ने पुलिस वैन को खबर करने की कोशिश की, लेकिन उसे पुलिस वाले नशे में मिले। फिर किसी और ने इस महिला या उसकी लाश को घसीटती जा रही कार के बारे में पुलिस को खबर की, और तब जाकर पांच लोगों सहित इस गाड़ी को पकड़ा गया। यह मामला देश की राजधानी दिल्ली में 31 दिसंबर की आधी रात के बाद हुआ जिसमें कि ऐसे हादसों की बड़ी आशंका थी, और पुलिस को खास चौकन्ना रहने की हिदायत तो इस रात देश भर में दी ही जाती है।

हम छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में बसे हुए इस शहर में रोजाना ही सडक़ों पर तरह-तरह से नियमों के खिलाफ चलने वाली गाडिय़ों को देखते हैं, और उन गाडिय़ों को देखती चुपचाप खड़ी पुलिस को भी देखते हैं। हो सकता है कि देश के कुछ प्रदेश ट्रैफिक को लेकर अधिक चौकन्ने हों, लेकिन छत्तीसगढ़ जैसे बर्बाद प्रदेश भी कम नहीं होंगे। हमारा यह भी देखा हुआ है कि जो लोग सडक़ों पर नियम तोड़ते हैं, वे वहीं पर नहीं थमते हैं, वे और सौ किस्म की गुंडागर्दी करते हैं, और सडक़ों पर अराजकता का माहौल बनाते हैं। साइलेंसर फाड़ी हुई जो मोटरसाइकिलें लाखों रूपये की आती हैं, जिनकी आवाज एक किलोमीटर दूर से सुनाई देती है, वे सडक़ों पर रात-दिन चौराहे पार करते हुए दौड़ती हैं, और ऐसी हर फटफटी दिन भर में दर्जनों पुलिसवालों के सामने से निकलती होगी, लेकिन पुलिस ने इन्हें छूना भी बंद कर दिया है। हेलमेट लगाना छत्तीसगढ़ के एक छोटे से इलाके, दुर्ग-भिलाई में पुलिस बार-बार लागू करती है, लेकिन मानो सडक़ की यह जीवनरक्षक सावधानी राजधानी की शान के खिलाफ है, यहां पुलिस का हौसला लोगों को हेलमेट पहनाने का भी नहीं होता, बल्कि कुछ बरस पहले राजधानी में पुलिस ने जनसहयोग से हेलमेट खरीदकर लोगों को मुफ्त पहनाए थे, और उस वक्त भी हमने इसे नियम तोडऩे वालों को पुरस्कार देना करार दिया था। हालत यह है कि 25-50 लाख की गाडिय़ों पर आड़े-तिरछे नंबर लिखे रहते हैं, गैरकानूनी सायरन और लाईटें उन पर तनी रहती हैं, लेकिन पुलिस इनका कुछ नहीं करतीं। आम जनता की जिंदगी में सडक़ पर हिफाजत रखने में पुलिस का कोई योगदान नहीं दिखता। हम इसी शहर को एक नमूना मानकर यह बात लिख रहे हैं कि दर्जनभर पुलिस अफसर आए और चले गए, और किसी ने भी ऑटोरिक्शा की संगठित अराजकता पर काबू की कोशिश नहीं की। न आरटीओ, और न ट्रैफिक पुलिस, किसी की कोई नीयत भी संगठित कारोबारी गाडिय़ों पर कार्रवाई की नहीं दिखती है, और इसकी वजह समझना कोई पहेली सुलझाना भी नहीं है।

हर कुछ हफ्तों में देश के तमाम शहरों से ऐसे वीडियो सामने आते हैं कि बददिमाग पैसे वाले किस तरह दारू और पैसों के मिलेजुले नशे के साथ सडक़ों पर गुंडागर्दी करते हैं, और जब ऐसे सुबूत सामने रख ही दिए जाते हैं, तब पुलिस के पास कार्रवाई करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं रहता। वरना आम जिंदगी में जितने किस्म की गुंडागर्दी वीडियो पर आए बिना सडक़ों पर होती है, पुलिस उसकी अनदेखी करते हुए कारोबारी गाडिय़ों में अपनी दिलचस्पी पूरी करने में लगी रहती है। यह सिलसिला किसी अफसर के आने और जाने से जब नहीं बदलता है, तो यह बात समझ में आती है कि सत्ता की मंजूरी ऐसे अफसरों को रहती है, और छांटकर कुछ चुनिंदा अफसर सबसे बड़ी उगाही की जगह पर बार-बार तैनात होते हैं।

अब सरकार की हर नाकामी पर अदालत जाने का तो कोई मतलब भी नहीं रह गया है क्योंकि जब अदालतें लाउडस्पीकरों के शोर पर सीधे कलेक्टर और एसपी को जवाबदेह ठहराते हुए चेतावनी जारी करती है, और उसके बाद भी उस पर जब कोई कार्रवाई नहीं होती, तो यह साफ रहता है कि अदालतें बेअसर हो गई हैं। छत्तीसगढ़ में तो हमने हाईकोर्ट के साफ फैसलों और कड़ी चेतावनियों को सिर्फ कूड़े के ढेर में जाते देखा है, और जजों को भी इसकी कोई परवाह होती हो, ऐसा कोई सुबूत सामने नहीं आया है। इसलिए सरकारी अफसरों की गैरजिम्मेदारी और नाकामी की किन-किन बातों को लेकर लोग अदालत जा सकते हैं? और क्यों जाएं, जबकि अदालत का कोई असर ही सरकार पर नहीं बच गया है। शहरी जिंदगी की अराजकता अंधाधुंध है, और अपने-अपने शहर में जाने-माने, या थोड़ा-बहुत असर रखने वाले लोग भी जब अफसरों से की गई शिकायत को सिर्फ अनसुनी पाते हैं, तो वे किस मुंह से अदालत तक जाएं, और अदालत से क्या उम्मीद करें?

ऐसा लगता है कि छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश में शहरी जिंदगी को नियम-कायदे से चलाने का जिम्मा जिन अफसरों पर है, उनके ऐसे रूख से या तो सरकार सहमत है, या सरकार खुद ही उन्हें ऐसा ही रूख रखने के लिए कहती है ताकि सत्ता के पसंदीदा अराजक गुंडों को कोई असुविधा न हो। किसी देश-प्रदेश में लोकतंत्र का विकास इन बातों से भी आंका जाता है कि वहां जनजीवन में आम लोगों के अधिकारों का कितना सम्मान होता है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में ऐसे अधिकार मिट्टी में मिले हुए हैं, और किसी को इसकी कोई फिक्र भी नहीं है कि आम जनता की कोई विपरीत प्रतिक्रिया किसी चुनाव में सामने आ सकती है। एक के बाद दूसरी सरकार के राज में माहौल ऐसा ही रहने से यह साफ है कि किसी पार्टी की सरकार को सार्वजनिक जीवन में आम लोगों के अधिकार कायम करने की फिक्र नहीं है। इसके साथ-साथ स्थानीय स्तर पर निर्वाचित नेताओं को भी नियम-कायदे पसंद नहीं रहते, क्योंकि वे भी अपने-अपने अराजक लोगों की गुंडागर्दी को बढ़ावा देना चाहते हैं, और छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में बाजार का एक फेरा लगाकर इस बात को अच्छी तरह समझा जा सकता है कि किस तरह नियमों को मार-मारकर उनमें भूसा भर देने का काम चल रहा है। ऐसी ही नौबत आगे जाकर सडक़ों पर मौत लाती है, और देश के बहुत से प्रदेशों के अधिकतर इलाके जुर्म का यह दर्जा देखते आ रहे हैं। यह हर शहर के बाशिंदों को खुद ही तय करना है कि वे अपनी अगली पीढ़ी को कितना खतरनाक शहर देकर जाना चाहते हैं, या वे आज कोई नागरिक-पहल करके चीजों को सुधार भी सकते हैं?

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