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सत्ता की वफादार पुलिस और बलि का बकरा आम जनता.. दम तोड़ती अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता.. गरीब अडाणी का तो सत्यानाश हो गया.. प्रदूषण से दुनिया के शतरंज खिलाड़ियों के खेल पर खतरा.. महिला सशक्तिकरण से अधिक महिलाओं के नेतृत्व की ज़रूरत.. अडानी बना सरकार के गले की हड्डी.. अडाणी या धूमकेतु.? एक लाड़ले बच्चे से परे स्कूल शिक्षा में कुछ नहीं

-सुनील कुमार।।

हिन्दुस्तान, और शायद बाकी जगहों पर भी, किसी महिला के साथ हुई ज्यादती की चर्चा का रूख मोडऩा हो, तो बड़ा आसान तरीका रहता है कि उस महिला के चाल-चलन को गड़बड़ साबित कर दिया जाए। और चाल-चलन की गड़बड़ी अलग-अलग समाजों में अलग-अलग पैमानों पर तय होती है। हिन्दुस्तान में अगर कोई लडक़ी या महिला देर रात अकेले है, दोस्तों के बीच या किसी दावत में शराब पी चुकी है, तो उसके साथ बलात्कार होने पर भी लोगों की हमदर्दी तकरीबन खत्म हो जाती है। महानगरों को छोड़ दें तो बाकी हिन्दुस्तानी शहरों में सिगरेट पीने वाली लडक़ी का भी चाल-चलन गड़बड़ मान लिया जाता है। अधिक समय नहीं हुआ अभी एक-दो दशक पहले तक कस्बाई हिन्दुस्तान में स्लीवलेस ब्लाऊज पहनने वाली महिला के चाल-चलन को भी गड़बड़ मान लिया जाता था कि ऐसे कपड़े पहनी है, तो उसे साथ चलने के लिए कहा जा सकता है। लेकिन आज भी हिन्दुस्तान के महानगरों में किसी लडक़ी के नशे में रहने पर उसके साथ होने वाले बलात्कार के लिए बड़ी आसानी से उसे ही जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है।

अब दिल्ली में अभी मोपेड सवार जिस लडक़ी को नशे में घूमते नौजवानों की कार ने कुचल दिया, और उसकी लाश को दस-बीस किलोमीटर घसीटते हुए ले गए, उसके बारे में दिल्ली पुलिस की मेहरबानी से अब बहुत से टीवी चैनलों को यह चारा मिल गया है कि वह नशे में थी। और इसके बाद खबरों का रूख उस लडक़ी के नशे की तरफ मुड़ गया, नशे में गाड़ी चलाते कुचलने वाले नौजवान मानो अब कम कुसूरवार हो गए। एक महिला वकील ने ट्विटर पर लिखा- ‘जो लड़कियां ओयो जैसे होटलों में शराब पीकर अनजान लडक़ों के साथ रात-रात अपने घर से गायब रहती हैं, और उनके साथ अगर कोई घटना हो जाए तो मुझे ऐसी लड़कियों से कोई हमदर्दी नहीं है।’ वकील साहिबा की यह सोच कोई अनोखी नहीं है, और हिन्दुस्तान के अधिकतर लोग इसी तरह सोच रहे होंगे।

यह देश और इसके लोग औरत के खिलाफ हजारों बरस से चले रहे अपने पूर्वाग्रह से शायद और हजारों बरस तक घिरे रहेंगे। और मानो अपनी सोच के इस जुर्म को छुपाने के लिए इस देश के लोग कुछ देवियों की पूजा करने की एक परंपरा निभाते हैं, और जब कभी इन लोगों पर महिलाविरोधी पूर्वाग्रहों की तोहमत लगती है, तो वे तुरंत लक्ष्मी, दुर्गा, सरस्वती, काली की पूजा गिनाने लगते हैं कि यह संस्कृति तो महिलाओं की पूजा करने की है। यह बात सिर्फ इस हद तक सही है कि यह उन महिलाओं की पूजा करने वाली संस्कृति है जिनका आत्मविश्वास इस पूजा से बढ़ न जाए। जिंदा महिलाओं की पूजा अगर होने लगे तो अधिक आत्मविश्वास के साथ उनमें मर्दों से बराबरी करने की बददिमागी आने का खतरा रहता है, इसलिए मिट्टी-पत्थर की मूर्तियां बनाकर उनकी पूजा करना आसान है क्योंकि वे पूजा के दिनों के बाद मर्दों की राह में आकर खड़ी नहीं होतीं, उनके लिए चुनौती नहीं बनतीं।

कोई लडक़ी नशे में है, देर रात तक बाहर है, उसने अपनी मर्जी के तंग या छोटे कपड़े पहन रखे हैं, तो उसके साथ बलात्कार समाज का मानो हक ही बन जाता है। इस देश के मुख्यमंत्रियों से लेकर केन्द्रीय मंत्रियों तक, और कई दूसरे नेताओं तक यह बात बहुत आम है कि बलात्कार के मामले में लड़कियों और महिलाओं की ऊपर लिखी इन बातों को सार्वजनिक रूप से जिम्मेदार ठहरा दिया जाए। यह सिलसिला इतना आम है कि हर बलात्कार के बाद बलात्कारी के आसपास के, या उस इलाके के जिम्मेदार नेताओं के बीच से तुरंत ही यह बात आने लगती है कि किस तरह उस लडक़ी या महिला ने ही बलात्कार को न्यौता दिया है। ऐसे मर्दों को शायद तब अफसोस होता है जब बलात्कार की शिकार बच्ची तीन-चार साल की होती है, और ऊपर की कोई भी बातें तोहमत की तरह उस पर नहीं लगाई जा सकती, और बलात्कार की जिम्मेदारी मर्द पर ही आकर टिकती है।

यह सिलसिला तब तक चलते रहेगा जब तक कानून की किताबों से परे महिलाओं को बराबरी का हक नहीं मिलता। पूरी की पूरी बराबरी तो पश्चिम के सबसे विकसित देशों में भी कई जगह नहीं मिलती, और आज की दुनिया तो ईरान और अफगानिस्तान की शक्ल में ऐसी सरकारों को देख रहा है जो महिलाओं को इंसान भी नहीं मानते, और उन्हें तरह-तरह से कुचलने में लगे हुए हैं। इनमें आधुनिक विज्ञान समझने वाली ईरानी सरकार भी है, और निपट-गंवार आतंकियों की तालिबानी सरकार भी है। हिन्दुस्तान में भी वैसे तो अलग-अलग कई धर्मों के लोगों की सोच में काफी फर्क दिखाई पड़ता है, लेकिन औरत को कुचलने के लिए तमाम धर्मों के मर्दों की सोच एक सरीखी ‘धर्मनिरपेक्ष’ हो जाती है। इस नौबत से छुटकारा पाना आसान नहीं है, खासकर तब जबकि लोकतंत्र में चौथा स्तंभ होने का दावा करने वाले मीडिया के लोग हर लडक़ी या औरत की इज्जत को हवा में उछालकर उसे अपने टीआरपी में बदलने की ताक में रहते हैं। दिल्ली में इस लडक़ी के साथ यही हो रहा है, अगर वह देर रात बाहर थी, या उसने शराब पी थी, तो उसे कुचलकर दस-बीस किलोमीटर घसीटने वाले लोग तकरीबन बेगुनाह हो गए हैं।

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