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अमरीका में मुकदमेबाजी की बड़ी दिलचस्प परंपरा है। कुछ बरस पहले एक अधेड़ आदमी ने अपनी बूढ़ी मां पर मुकदमा कर दिया था कि जब वह बहुत छोटा बच्चा था, तब मां ने उसे एक बार सजा देने के लिए एक पिंजरे में बंद कर दिया था, और उसकी वजह से उसका व्यक्तित्व और पूरा जीवन प्रभवित हो गया, इसलिए मां की दौलत में से उसे मुआवजा दिलवाया जाए। अमरीका को वकीलों के सपने का देश कहा जाता है, और वे बात-बात में लोगों को उकसाते रहते हैं कि वे किस पर केस करके मोटी रकम पा सकते हैं। वकीलों का एक तबका वहां एम्बुलेंस-चेजर्स कहा जाता है कि अगर कोई बीमार या जख्मी है, तो किसी से हर्जाना वसूलने की गुंजाइश तो बनती ही है, और माना जाता है कि ऐसे वकील एम्बुलेंस का पीछा करते हुए अस्पताल पहुंचते हैं और बिस्तर पर भर्ती बीमार या जख्मी से वकालतनामे पर दस्तखत करवा लेते हैं।

ऐसे अमरीका में अभी दो कलाकारों ने वहां के एक सबसे बड़े फिल्म स्टूडियो, पैरामाउंट पिक्चर्स, के खिलाफ मुकदमा कर दिया है कि 55 बरस पहले जब वे नाबालिग कलाकार थे तब इस स्टूडियो ने अपनी एक फिल्म, रोमियो एंड जूलियट, में एक नग्न दृश्य करवाने के लिए उन्हें प्रताडि़त करके मजबूर किया था। अभिनेता लियोनार्द वाइटनिंग, और अभिनेत्री ओलिविया हसी उस वक्त 16 और 15 साल के थे, और अभी 70 साल के हैं। उनका कहना है कि डायरेक्टर फ्रैंको जैफ्रिलिन ने उन्हें पहले गारंटी दी थी, कि उनसे ऐसे सीन नहीं करवाए जाएंगे, और बाद में न्यूड सीन करवाया गया। इन दोनों का कहना है कि इससे वे दशकों तक मानसिक परेशानी से गुजरते रहे, और उन्हें काम मिलने में भी दिक्कत हुई। उनके वकील का कहना है कि उनसे किए गए वायदे के खिलाफ जाकर, उन पर दबाव डालकर ऐसे सीन करवाए गए, और गैरकानूनी तरीके से उन्हें फिल्माया गया।

मामला बड़ा दिलचस्प है क्योंकि यह अमरीका के कैलिफोर्निया राज्य, और देश के संघीय कानून दोनों को तोड़ता है। कानूनन नाबालिग की नग्न तस्वीरें लेना गैरकानूनी था। उस वक्त ये बच्चे कमउम्र थे, और वे यह सहमति देने की समझ नहीं रखते थे। फिल्म का डायरेक्टर अब गुजर चुका है, लेकिन इसकी निर्माता कंपनी अभी काम कर रही है, और उसी से 50 करोड़ डॉलर का हर्जाना मांगा गया है।
अब हम अमरीका के इस घरेलू मुकदमे को लेकर कुछ लिखना नहीं चाहते, लेकिन इस बात पर लिखना चाहते हैं कि लोगों की जिंदगी में आधी सदी बाद भी जाकर उनके कत्ल किए हुए लोगों के कंकाल सामने सकते हैं। लोगों को ऐसे दिनों की भी सोच लेना चाहिए कि जब 50 बरस पहले का कोई मुर्दा कब्र फाडक़र निकले, और सामने आकर जवाब या हर्जाना मांगने लगे, तो क्या होगा? लोगों को याद होगा कि शेखर कपूर की बनाई हुई एक फिल्म थी, मासूम। इसमें एक पश्चिमी लेखक एरिक सेगल के लिखे एक उपन्यास, मैन वूमैन एंड चाइल्ड, पर फिल्म बनाई गई थी, और इस पर दूसरे लोग भी फिल्म बना चुके थे जिनमें से एक तो मलयालम में ही बनी थी, इसके बाद जाकर शेखर कपूर ने फिल्म बनाई, पाकिस्तान में इस पर कभी अलविदा न कहना फिल्म बनी, और इंडोनेशिया से लेकर तमिलनाडु तक कुछ और फिल्में भी बनीं। जिन लोगों को यह कहानी याद या मालूम न हो, उनके लिए यह एक ऐसे बच्चे की कहानी है जो कि एक शादीशुदा आदमी के बाहर के एक रिश्ते से पैदा होता है, और एक दिन वह इस परिवार में घर पर आकर खड़े हो जाता है क्योंकि वह अब अनाथ हो गया रहता है। इसके बाद की कहानी में इंसानी सोच के इतने रंग सामने आते हैं कि दर्शक उसमें उतराते रहते हैं।

अमरीका के इस ताजा मुकदमे, और एरिक सेगल की इस कहानी, दोनों को मिलाकर हम सिर्फ यही बात सामने रखना चाहते हैं कि जिंदगी में कुछ भी, रात गई, बात गई, किस्म का नहीं होता। एक रात की कहानियां भी आगे चलकर असल जिंदगी में ऐसे-ऐसे नाटकीय मोड़ लेकर आती हैं, कि हर चीज फिल्मी लगे।

इस पर चर्चा का कुल मकसद यही है कि लोगों को असल जिंदगी के दुस्साहस के खतरों को बाकी तमाम जिंदगी के लिए मानकर चलना चाहिए। आज हर दिन हिन्दुस्तान में सैकड़ों जिंदगियां ऐसी किसी एक फोटो या वीडियो की वजह से तबाह हो रही हैं जिन्हें लोगों ने किसी बहुत ही भरोसे, या मदहोशी के पल में खिंचवा लिया था। और अब वे पूरे परिवार की जिंदगी पर सबसे बड़ा खतरा बनकर खड़े हैं। एक वक्त हर इंसान, हर भावना, हर रिश्ता, और हर पल, मासूम लगते हैं, लेकिन फिर कोई बुरा वक्त आता है तब पता लगता है कि धोखा खाने वाले के अलावा कुछ भी मासूम नहीं था, और अब उसके दाम चुकाना पूरी जिंदगी दे देने पर भी कई बार नहीं हो पाता है। लोगों को गलतियां करने के पहले यह भी समझना चाहिए कि हो सकता है कि आज समाज और कानून की हालत ऐसी न हों कि उनकी किसी गलती या गलत काम के खिलाफ कोई आवाज उठ सके, लेकिन दुनिया में नई जागरूकता के नए दौर आते हैं, मी-टू जैसे आंदोलन खड़े होते हैं, और अपने कपड़ों पर बिल क्लिंटन के दाग लिए हुए मोनिका लेविंस्की अमरीकी संसद में खड़ी हो सकती है। इसलिए लोगों को यह सोचना चाहिए कि आज जो महफूज लग रहा है, वह हमेशा ही वैसा रहे इसकी कोई गारंटी नहीं होती। लोगों के मिजाज और हालात गोदरेज जैसी किसी कंपनी के तिजौरी के दरवाजे की तरह सौ बरस की गारंटी लेकर नहीं आते। लोगों को खतरों को भांपकर, अपने आप पर काबू रखना चाहिए, वरना उस अमरीकी डायरेक्टर की तरह की नौबत आ सकती है कि खुद तो चले जाए, लेकिन अपनी कंपनी को एक मुश्किल मुकदमे में छोड़ जाए। लोगों को आज भी अपने आसपास के लोगोंं से बर्ताव करते हुए यह सोच रखना चाहिए कि अगर वे लोग किसी दिन किसी सबसे काईयां वकील के हाथ लग जाएंगे, और मुकदमा करने को तैयार हो जाएंगे, तो वे क्या-क्या कर पाएंगे।

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