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-सुनील कुमार॥

सरकारी नौकरियां हिन्दुस्तान में लोगों के लिए जिंदगी की सबसे अधिक अहमियत वाली एक चीज रहती हैं। गरीब और मध्यम वर्ग के लोग बरस-दर-बरस कोई न कोई इम्तिहान देकर सरकारी नौकरियों की कोशिश करते हैं, और तभी हार मानते हैं जब उनकी उम्र निकल जाती है। ऐसे में बहुत से प्रदेशों में बड़ा-बड़ा भर्ती घोटाला होता है। मध्यप्रदेश में तो व्यापमं घोटाला इतना बड़ा था कि उसमें मंत्री भी गिरफ्तार हुए थे, एक राज्यपाल का नाम भी आया था, और कार्यकाल खत्म होने के बाद राज्यपाल कटघरे में लाए जा सकते, उसके पहले वे पंचतत्व में विलीन हो गए। लेकिन यह घोटाला इतना बड़ा था कि इसमें दर्जनों लोग जेल पहुंचे, और इसके दर्जनों गवाहों को रहस्यमय तरीके से हादसा-मौत हासिल हुई, जिसे कि आसानी से समझा जा सकता है। इन दिनों छत्तीसगढ़ भर्ती घोटाले की खबरों से पटा हुआ है, और हाल के महीनों में सत्तारूढ़ कांग्रेस के खिलाफ भाजपा के हाथ यह सबसे बड़ा मुद्दा लगा है।

अभी मध्यप्रदेश की ताजा खबरें बताती हैं कि वहां पटवारी भर्ती परीक्षा में ग्वालियर के एक कॉलेज में जो लोग बैठे, उनमें से अधिकांश पास हो गए, और प्रदेश के टॉप-10 में से 7 इसी कॉलेज के हैं। अब मुरैना के 16 ऐसे चुने गए उम्मीदवार सामने आए हैं जो एक ही जाति के हैं, सबके सब दिव्यांग हैं, और इनमें से अधिकतर कानों से दिव्यांग हैं, यानी न सुन पाने वाले। यह लिस्ट अपने आपमें बताती है कि त्यागी सरनेम वाले ये सोलह के सोलह लोग किस तरह पटवारी बनने जा रहे हैं। नतीजा यह होता है कि जब ये पटवारी कहीं तैनात होते हैं तो वे तेजी से करोड़पति बनकर अपने पूंजीनिवेश की भरपाई करते हैं, और आगे की एक जमींदार सरीखी जिंदगी बना लेते हैं। जमीनों की अफरा-तफरी, जमीनों के रिकॉर्ड में हेराफेरी, इस किस्म के अनगिनत कामों की गुंजाइश पटवारी के काम में रहती है, और वे अपने से कई दर्जा ऊपर के अफसरों के मुकाबले भी अधिक ताकतवर माने जाते हैं।

जब सरकारी नौकरी में कोई उम्मीदवार भ्रष्टाचार से आते हैं, तो उनके भ्रष्टाचार से परे भी एक दूसरी बात का नुकसान सरकार और जनता को होता है। चूंकि वे रिश्वत देकर नौकरी पाते हैं, इसलिए यह जाहिर है कि उनके मुकाबले बेहतर उम्मीदवार किनारे बैठे रह जाते हैं क्योंकि उनके पास इतनी रिश्वत का पैसा नहीं होता। मतलब यह कि सरकार को काबिल और अच्छे कर्मचारी नहीं मिल पाते, बिना काबिलीयत वाले लोग नौकरियों पर काबिज हो जाते हैं, और उन पर जल्द से जल्द अधिक से अधिक भ्रष्टाचार करके कमाई करने का एक दबाव रहता ही है। फिर उनके पास भ्रष्टाचार करने के लिए यह नैतिक अधिकार भी रहता है कि उन्हें यह नौकरी कौन सी मुफ्त में मिली हुई है, और वे तो खुद ही लाखों रूपए देकर कुर्सी पर आए हैं।

दूसरी तरफ जो बेरोजगार इन तमाम किस्सों को देखते रहते हैं कि किस तरह उनसे कम काबिल लोग रिश्वत के दम पर नौकरी पा लेते हैं, और उनकी उम्र ही सरकारी नौकरी की कोशिश में निकल जाती है, वे फिर लोकतंत्र और इंसानियत दोनों के लिए सम्मान खो देते हैं। उनके मन में एक हिकारत भर जाती है, और फिर उन्हें आगे किसी भी तरह की टैक्स चोरी, सार्वजनिक सम्पत्ति को किसी भी तरह से नुकसान पहुंचाना खराब नहीं लगता। उनके तेवर उसी तरह बागी हो जाते हैं, जिस तरह बलात्कार की शिकार फूलनदेवी बागी हो गई थी, और डकैत बन गई थी।

लेकिन सरकारों को अगर देखें तो उनमें नौकरियों को लेकर भ्रष्टाचार का एक बड़ा आकर्षण रहता है। बहुत से लोग इसे मोटी कमाई का जरिया बना लेते हैं, कुछ लोग इसे अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के परिवारों को चलाने का एक तरीका बना देते हैं। ऐसा सुनाई पड़ता है कि वामपंथी पार्टियों के राज वाले प्रदेशों में भी पार्टी कार्यकर्ताओं के परिवार के लोगों को प्राथमिकता से नौकरी दिलाने की कोशिश की जाती है। बाकी पार्टियां तो कमाई और कार्यकर्ताओं को खुश करने के लिए यह काम करती ही हैं। दिक्कत यह होती है कि ऐसे मामले बरसों तक अदालतों में चलते रहते हैं, लेकिन वहां कोई फैसले नहीं हो पाते। जिस मध्यप्रदेश व्यापमं घोटाले की चर्चा हमने ऊपर की है वह 2013 में सामने आया था, अभी दस बरस हो चुके हैं, लेकिन दो हजार लोगों की गिरफ्तारी के बाद भी मामले का फैसला नहीं हो पाया है। इस दौरान जांच एजेंसियों के रिकॉर्ड के मुताबिक इस मामले से जुड़े हुए तीन दर्जन से अधिक लोग अस्वाभाविक मौत मरे हैं। 2017 में सुप्रीम कोर्ट का एक लंबा फैसला आया जिसमें 634 डॉक्टरों की डिग्रियां रद्द की गईं जिन्होंने इस व्यापमं घोटाले के रास्ते मेडिकल कॉलेज में दाखिला पाया था। लेकिन उस फैसले से परे मामले के बाकी पहलुओं पर अभी मुकदमा चल ही रहा है। सीबीआई ने अभी साल भर पहले 160 और लोगों के खिलाफ चालान पेश किया है।

लेकिन इस अकेले मामले की चर्चा करना आज का मकसद नहीं है, आज यह देखना है कि सरकारी नौकरियों और सरकारी कॉलेजों में दाखिलों में जो बेईमानी होती है वह किस तरह बहुत बड़े गरीब और काबिल तबके का मनोबल तोडक़र रख देती है। पूरी की पूरी व्यवस्था इतनी बेरहम हो गई है कि वह काबिल छात्र-छात्राओं और बेरोजगारों के हक को कुचलते हुए इसे कमाई का एक जरिया बनाकर चलती है।

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