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भारत के कई राज्यों में, जहां भाजपा की सरकारें नहीं हैं, वहां राज्य सरकारों से राज्यपाल के मतभेद या विवाद की खबरें अब आम बात हो गई है। जब तक जगदीप धनखड़ .बंगाल के राज्यपाल थे, तब तक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से उनके टकराव की खबरें आती ही रहती थीं। इसके बाद केरल में राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान और पिनराई विजयन सरकार के बीच टकराव बढ़ा। छत्तीसगढ़ में पिछले दिनों आरक्षण विधेयक पर कांग्रेस सरकार और राज्यपाल अनुसुइया उइके के बीच तनातनी हुई।

महाराष्ट्र में जब तक उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री रहे, राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी और उनके बीच किसी न किसी मुद्दे को लेकर खिंचाव चलता रहा और अब शिवसेना के शिंदे गुट ने भाजपा गठबंधन के साथ सरकार बनाई है, तब भी राज्यपाल को लेकर विवाद हो ही रहा है। श्री कोश्यारी ने छत्रपति शिवाजी को लेकर जो बयान दिया, उसके बाद राज्य भर में उनके खिलाफ नाराजगी देखी गई औऱ उन्हें वापस भेजने की मांग उठने लगी। जिस तरह राष्ट्र के प्रथम नागरिक राष्ट्रपति को अभिभावक की भूमिका में देखा जाता है, राज्यों में वही ओहदा राज्यपाल का बनाया गया है।

यानी राज्यपाल सीधे राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के तौर पर राज्यों में नियुक्त होते हैं और उन्हें बिना किसी पक्षपात के, दलगत मतभेदों से ऊपर उठकर एक अभिभावक की तरह सरकार को कामकाज चलाने में सहयोग देना चाहिए। यह खेद की बात है कि गैरभाजपा शासित राज्यों में राज्यपाल अपनी इस भूमिका के साथ न्याय करते नजर नहीं आ रहे हैं। ताजा उदाहरण तमिलनाडु से सामने आया है, जहां राज्य के नाम पर राज्यपाल और सरकार के बीच एक अनावश्यक विवाद खड़ा हो गया है।

सोमवार को तमिलनाडु विधानसभा में एक अभूतपूर्व घटना घटी जब राज्यपाल आर.एन.रवि सदन से बहिर्गमन कर गए। दरअसल डीएमके सरकार ने राज्यपाल रवि पर विधानसभा में दिए अभिभाषण में कुछ अंशों को छोड़ने का आरोप लगाया। इसके कारण मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने इस बदलाव को खारिज करने के लिए एक प्रस्ताव पेश किया। जिस पर तमतमाए हुए राज्यपाल सदन बीच में छोड़कर निकल गए। उन्होंने राष्ट्रगान के होने का इंतजार भी नहीं किया। स्टालिन सरकार की शिकायत है कि राज्य सरकार द्वारा अनुमोदित भाषण से राज्यपाल रवि ने धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय और महिला सशक्तिकरण के संदर्भों को छोड़ दिया।

राज्यपाल से विरोध इस बात पर भी है कि उन्होंने तमिलनाडु की जगह तमिझगम शब्द के इस्तेमाल की पैरवी की। इसके विरोध में, द्रमुक और सहयोगियों ने विधानसभा में बार-बार ‘तमिलनाडु’ चिल्लाया, राज्य का नाम बदलने पर रवि की टिप्पणी का विरोध किया। जिसके बाद ट्विटर पर हैशटैग गेटआउट रवि भी कुछ देर के लिए ट्रेंड करने लगा था।

श्री रवि का कहना है कि तमिलनाडु की जगह तमिझगम अधिक उपयुक्त नाम है। यह मुद्दा वे चार जनवरी को ‘काशी तमिल संगमम’ के आयोजकों और स्वयंसेवकों के सम्मान में राजभवन में आयोजित एक कार्यक्रम में भी कथित तौर पर उठा चुके हैं। दरअसल नाडु का अर्थ भौगोलिक सीमा है लेकिन तमिलनाडु में इसका अर्थ देश या राष्ट्र राज्य के रूप में लिया जाता है। इसलिए राज्यपाल इसका नाम बदलना चाहते हैं। वैसे तमिझगम का अर्थ भी तमिलों की भूमि ही होता है। लेकिन नाडु शब्द से देश का अहसास होता है, केवल इसलिए नाम बदलने की पैरवी करना, अकारण विवाद खड़ा करने से अधिक कुछ नहीं है।

द्रमुक के आधिकारिक मुखपत्र ‘मुरासोली’ ने श्री रवि की कथित ‘तमिझगम’ टिप्पणी के लिए आलोचना करते हुए सही तर्क दिए हैं कि क्या राजस्थान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, उज्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान की तरह नहीं लगता है? महाराष्ट्र का क्या अर्थ है? क्या इसका मतलब यह नहीं है कि यह मराठा लोगों का देश है। क्या यह स्वर में अलगाववादी है? क्या केरल पर्यटन की टैगलाइन गॉड्स ओन कंट्री का प्रयोग अलग राष्ट्र-राज्य की स्थिति की मांग को दर्शाता है। क्या यह सोचना मूर्खता नहीं है कि तेलुगु देशम पार्टी एक अलगाववादी पार्टी है, क्योंकि देशम नाम का मतलब देश है। अखबार ने अपने एक लेख में राज्यपाल को भारत का इतिहास समझने की नसीहत दी है।

नाम की राजनीति भाजपा के लिए नयी नहीं है। लेकिन सवाल ये है कि क्या राज्यपाल भाजपा के नेता या प्रतिनिधि बन कर तमिलनाडु पहुंचे हैं। क्या उन्हें अपने संवैधानिक दायित्वों के बारे में सचेत होकर कार्य नहीं करना चाहिए। राज्यपाल ने केवल नाम बदलने का विवाद नहीं छेड़ा बल्कि यह भी कहा कि पूरे देश में जो स्वीकार्य होता है उस पर तमिलनाडु में ना हो जाती है और यह एक नियम बन गया है। उनकी इस बात से राज्य के दोनों प्रमुख दल नाराज हो गए हैं। द्रमुक और अन्ना द्रमुक दोनों ने इसका विरोध किया है। फिलहाल इस विवाद के खत्म होने के आसार नहीं दिख रहे हैं, क्योंकि राजभवन में पोंगल त्योहार के लिए जो निमंत्रण तैयार किया गया है, उसमें तमिझगम शब्द का इस्तेमाल किया गया है। इससे नाराज होकर सत्तारुढ़ द्रमुक समेत कई दल राज्यपाल को वापस भेजने की मांग उठा रहे हैं।

तमाम कोशिशों के बावजूद भाजपा का तमिलनाडु में कोई जनाधार नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी तमिल अस्मिता और भाषा की बात छेड़कर यहां भावनात्मक जीत दर्ज करने की कोशिश कर चुके हैं, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। अब जिस तरह से द्रमुक की सरकार मजबूती से डटी है और कांग्रेस की मजबूती के आसार भी दिख रहे हैं, उसके बाद भाजपा के लिए उम्मीदें कम होती जा रही हैं। शायद इसलिए तमिल गौरव के मुद्दे को जाग्रत करने वाला एक ऐसा विवाद खड़ा कर दिया गया है, जिसका कोई औचित्य ही नहीं है।

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