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-सौमित्र रॉय॥

दिल्ली में हो रही बीजेपी कार्यकारिणी की बैठक में इस साल 9 राज्यों के चुनाव में हिंदुत्व, 5 किलो राशन और लाभार्थी कार्ड की रेवड़ी पर जीत की रणनीति बनी है।

नरेंद्र मोदी सरकार के 8 साल के राज में यही 3 उपलब्धियां बची हैं। इसके सिवा आम जनता के लिए ऐसा कोई काम नहीं हुआ, जो चुनाव जितवा सके।

उल्टे मध्यमवर्ग की जेब से निकलकर बैंकों में जमा हुए 12 से 14 लाख करोड़ उन कंपनियों पर लुटा दिए, जिन्होंने चंदे से मोदी सरकार को टिका रखा है।

बदले में मोदी सरकार ने इन्हीं कंपनियों के लोन माफ किए, यानी फायदा पहुंचाया। यह नहीं होता तो साढ़े 66 लाख करोड़ के एनपीए यानी बट्टे खाते के बोझ तले आज सारे बैंक जोशीमठ बन जाते।

शायद ही किसी बैंक का जीएम, ईडी या सीएमडी ऐसा मिलेगा, जिसने राजनीतिक दबाव में किसी कारोबारी को कर्ज बांटा हो और वह भी सारे नियमों को टेबल के नीचे रखकर।

दुनिया के किसी भी देश में लोन का 1–2% ही एनपीए होता है, लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार ने पूरी बेशर्मी से इसे 8% से ज्यादा बढ़ाया। रूस में एनपीए का अनुपात 8.3% है।

मोदी को 2014 में जब कॉर्पोरेट्स ने पीएम की कुर्सी पर बिठाया, तब बैंकों का एनपीए 4.1% था, जो मार्च 2018 में 11.46% हो गया।

मोदी सरकार के 7 साल में एनपीए 12.17% तक गया। 91 करोड़ भूखे लोगों के देश में लोन खाकर अरबपति हुए लोगों की संख्या बेतहाशा बढ़ी और मोदी 2019 में पैसे के दम पर दोबारा कुर्सी पर बैठे।

लेकिन 2022 तक आते–आते बैंकों का एनपीए 5.9% हो जाता है और बीजेपी आईटी सेल के इशारे पर गोदी मीडिया मोदीनॉमिक्स का डंका पीटने लगता है।

29 दिसंबर 2022 को आरबीआई की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट को देश की पालतू भांड मीडिया भूल जाती है, जिसमें एनपीए के बढ़कर 9.4% होने की आशंका जताई गई है।

फिर क्या, नरेंद्र मोदी सरकार आदतन एक और बड़ा तमाशा करेगी और 25 करोड़ मध्य वर्ग की बचत से 12–14 लाख करोड़ लोन खाने वालों पर लुटा देगी।

भारत के इतिहास में सबसे कमजोर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन कल 4 आर की बात तो कर गईं, लेकिन जोशीमठ की तरह देश के बैंकिंग सिस्टम में आ चुकी दरारों को छिपा गईं।

यूपीए 2 के कार्यकाल में भारत की बैंक सालाना 35–50 हजार करोड़ का मुनाफा कमा लेती थीं। लेकिन मोदी राज में 2015 से 2020 तक सालाना 2 लाख करोड़ के घाटे में हैं।

अदाणी सेठ भले गला फाड़कर अपनी बुलंदी में मोदी को हिस्सेदार न माने, लेकिन मोदी ने अपनी नीतियों में कॉर्पोरेट्स से दोस्ती कभी नहीं छिपाई।

यूपीए 2 में देश के जीडीपी का 3.34% हिस्सा कॉरपोरेट टैक्स से आता था, जो चायवाले के राज में 2.3% हो गया है।

वित्त मंत्री को भी शायद यह सच बताने में इस बार शर्म आ रही है, तभी बजट से पहले जारी होने वाली जीडीपी फरवरी अंत में बताई जाएगी।

साफ तौर पर यह देश की आजादी के बाद का सबसे बड़ा घोटाला है। 12 लाख करोड़ कई राज्यों के बजट या फिर 2019–20 के औसत जीएसटी संग्रह के बराबर रकम है।

यह भारत को कमजोर करने की एक आपराधिक कोशिश है। लेकिन देश की न्याय व्यवस्था और लोकतंत्र का कोई भी खंभा इस सच को हज़म नहीं कर पाएगा।

लिहाज़ा, दरारों की तरफ़ मत देखिए। मत बताइए। मत बोलिए। बस, जोशीमठ बनकर धंस जाइए।

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