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केंद्र सरकार वित्तीय वर्ष 2023-24 के लिए बजट बनाने की तैयारियों में जुट गई है। अगले साल आम चुनाव होने हैं और सत्ता हासिल करने के लिए फिर से जनता के बीच जाना होगा, तो भाजपा उसे ध्यान में रखकर ही बजट की नीतियां बनाएगी, ऐसी उम्मीद है। हालांकि इस बीच अर्थशास्त्रियों से मुलाकात की कवायद हो रही है और उद्योग जगत से सुझाव भी लिए जाएंगे कि बजट में किस तरह के प्रावधान हों जिससे उनके लिए मुनाफा कमाने की संभावनाएं बढ़ जाएं।

बताया जा रहा है कि इस बार निजीकरण पर सरकार का जोर कम रहेगा, इसके पीछे की वजह भी चुनाव हो सकती है, जिसमें विपक्ष निजीकरण को एक बड़ा मुद्दा बना सकता है। हर साल जनवरी के आखिरी दिन राष्ट्रीय खाते के आंकड़ों को जारी किया जाता था। जिसमें सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय राष्ट्रीय आय, उपभोग व्यय, बचत और पिछले वित्तीय वर्ष के पूंजी निर्माण के आंकड़े जारी करता था। लेकिन अब यह बजट के पहले पेश न होकर फरवरी के आखिरी में पेश किया जाएगा। इससे पहले 2017 में मोदी सरकार ने बजट पेश करने की तारीख भी बदल दी थी। बताया जा रहा है कि यह कदम बजट में किसी तरह के भ्रम से बचने के लिए उठाया गया है।

हालांकि इसका असली कारण सरकार ही बतला सकती है। वैसे भी आम जनता को इन आंकड़ों से अधिक दिलचस्पी इस बात में रहती है कि बजट उसके लिए क्या राहत लेकर आता है। उसके रोजमर्रा के इस्तेमाल की वस्तुओं, खाद्य पदार्थों आदि की कीमतें बजट से किस तरह प्रभावित होती हैं। करों की दरें उसकी जेब पर क्या असर डालती है। जनता इन सवालों के जवाब चाहती है।

सरकार के पेश किए आंकड़ों से परे ये तथ्य है कि देश में पिछले दो-तीन सालों में महंगाई बेतहाशा बढ़ी है। दुग्ध पदार्थ, अंडे, मांस-मछली, तेल, अनाज, इन सबकी कीमतें एक बार बढ़ जाती हैं, जो फिर महंगाई दर कुछ भी रहे, ये कीमतें कम नहीं होती हैं। बाकी उपभोक्ता सामग्रियों का भी यही हाल है। लोगों की सीमित जरूरतें भी अब खर्चीली लगने लगी हैं और रोजगार उपलब्ध न होने की वजह से इन खर्चों को पूरा करने में आम आदमी की कमर टूट रही है।

लेकिन इस महंगाई को रोकने की कोई कोशिश सरकारी स्तर पर नहीं हो रही है। क्योंकि सरकार तो ये मान ही नहीं रही कि महंगाई बढ़ी है। आंकड़ों की बाजीगरी से नोटबंदी, जीएसटी और लॉकडाउन जैसे घातक फैसलों को सही साबित कर दिया जाता है। लेकिन इस सही का सच अब सामने आ रहा है, जब यह पता चल रहा है कि देश में अमीरों की संपत्ति बढ़ रही है, जबकि गरीबों के लिए केवल कठिनाइयां बढ़ रही हैं।

ऑक्सफैम इंटरनेशनल की रिपोर्ट ‘सर्वाइवल ऑफ द रिचेस्ट : द इंडिया स्टोरी’ ने खुलासा किया है कि देश में फिर से आर्थिक गैरबराबरी बुरी तरह बढ़ी है। बजट से पहले ऑक्सफैम ने भी केन्द्रीय मंत्री से अपील की है कि संपत्ति टैक्स जैसे समतावादी कदम बजट में उठाएं ताकि इस विषमता को खत्म किया जा सके। गौरतलब है कि कारपोरेट टैक्स में 2019 में कमी की गई थी और छूट तथा प्रोत्साहन के रूप में वर्ष 2021 में 1,03,285 करोड़ रुपए का लाभ कार्पोरेट घरानों को मिला। भारत में अरबपतियों की संख्या भी बढ़ी है। दो साल पहले 2020 में 102 अरबपति देश में थे जो 2022 में 166 हो गए। रिपोर्ट के मुताबिक देश के एक प्रतिशत सबसे अमीर लोगों के पास देश की कुल संपत्ति का 40 प्रतिशत से अधिक हिस्सा है, जबकि आबादी के निचले हिस्से के पास सिर्फ 3 प्रतिशत संपत्ति है।

ऑक्सफेम की यह रिपोर्ट वर्ल्ड इकानॉमिक फोरम की बैठक से पहले आई है। इस विश्व आर्थिक मंच पर तमाम देश वैश्विक आर्थिक हालात पर बात करते हैं। कहा तो यह जाता है कि यहां लोगों का जीवनस्तर ऊंचा उठाने पर मंथन होता है। लेकिन ऑक्सफैम की रिपोर्ट यह जाहिर करती है कि इस तरह की कवायदें पूंजीपतियों के हितों के लिए ही होती हैं, आम आदमी वहां केवल एक औजार की तरह इस्तेमाल होता है।

‘सर्वाइवल ऑफ द रिचेस्ट : द इंडिया स्टोरी’ ने जानकारी दी है कि भारत के सबसे धनी व्यक्ति की संपत्ति साल 2022 में 46 प्रतिशत बढ़ी है। इस के मुताबिक अगर ऐसे अप्रत्याशित मुनाफे पर पिछले पांच सालों के हिसाब से एकबारगी 20 प्रतिशत टैक्स लगाया जाए, तो इससे सरकार को 1.8 लाख करोड़ रुपए मिलेंगे, जिससे एक वर्ष के दौरान प्राथमिक विद्यालयों में 50 लाख अध्यापकों को रोजगार दिया जा सकता है।

रिपोर्ट के हिसाब से भारत के 100 सबसे धनी लोगों की कुल संपत्ति 54 लाख करोड़ रुपए पहुंच गई, जिससे 18 महीने का केन्द्रीय बजट बन सकता है। सबसे धनी 10 भारतीयों की कुल संपत्ति 27 लाख करोड़ रुपए है। पिछले वर्ष से इसमें 33 प्रतिशत की वृद्धि हुई। यह संपत्ति स्वास्थ्य और आयुष मंत्रालयों के 30 वर्ष के बजट, शिक्षा मंत्रालय के 26 वर्ष के बजट और मनरेगा के 38 वर्ष के बजट के बराबर है।

रिपोर्ट का शीर्षक सर्वाइवल ऑफ द रिचेस्ट काफी सूझ-बूझ के साथ रखा गया है और लोकतंत्र में पूंजीवाद के हावी होने का कड़वा सच बयां करता है। डार्विन का भी सिद्धांत है कि जो सर्वश्रेष्ठ, स्वस्थतम होगा, वही बचेगा। संस्कृत में भी उक्ति है कि ‘दैवो दुर्बलघातक:’ यानी भगवान भी दुर्बल को ही मारते हैं। लेकिन लोकतंत्र न प्रकृति के नियमों से संचालित है, न दैवीय नियमों से। लोकतंत्र में निर्वाचित सरकार को वही नीतियां बनानी चाहिए, जिनसे आम जनता का जीवन स्तर ऊंचा उठे।

मगर देश को अच्छे दिनों का ख्वाब दिखाने वाली मोदी सरकार के कार्यकाल में आम लोगों का जीवन स्तर इस कदर नीचे गिर गया है कि 80 करोड़ लोग पिछले दो साल से मुफ्त अनाज के मोहताज बना दिए गए हैं। जबकि अमीरों की संपत्ति में इजाफा इस बात को साबित कर रहा है कि देश में अमीरों के लिए ही तरक्की के अवसर हैं। सरकार के पास अभी एक साल का वक्त और है, कम से कम इस एक साल का बजट ऐसा बने जिससे वाकई गरीबों के दिन फिरें।

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